पिच तैयार, मैच शुरू

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17 नदी बेसिन अथॉरिटी बनाए जाएंगे। ये राज्यों के बीच नदी जल बंटवारे पर मध्यस्थता करेंगे। कुल
मिलाकर यह जल के बंटवारे की व्यवस्था है यानी नदी के सर्वोच्च दोहन की। बेसिन अथॉरिटी कहीं भी नदी
के जल में नदी के हिस्से की बात नहीं करती। इस कानून को यूं पेश किया जा रहा है मानों यह नदी स्वच्छता
की दिशा में उठाया गया सबसे बड़ा कदम है। कावेरी मुद्दा वर्षों पुराना है जो यह साबित करता है कि पानी को
लेकर फैला सामाजिक तनाव सुप्रीम कोर्ट और सरकारों के हस्तक्षेप से नहीं दूर हो सकता।

पर्यावरणविद् जीडी अग्रवाल की शहादत के बाद यह तय हो गया कि गंगा के मुद्दे को टाला नहीं जा सकता। अब सरकार एक गंगा एक्ट लाने की तैयारी कर रही है। इस एक्ट को लाने के पहले जरूरी है कि देश में पर्यावरण-प्रेमी माहौल तैयार किया जाए ताकि हर सरकारी कोशिश में गंगा साफ होती नजर आए। पिछले दिनों ताबड़तोड़ चार कदम उठाए गए ताकि गंगा पर जीडी अग्रवाल की चार मुख्य मांगों से ध्यान हटाया जा सके। सरकार ने एक नोटिफिकेशन जारी कर न्यूनतम पर्यवारणीय बहाव तय किया। इसमें कहा गया कि बांधों से कम से कम 25 फीसद जल का बहाव सुनिश्चित किया जाएगा। लेकिन यह नियम प्रस्तावित बांधों के लिए है, वर्तमान बांधों को इसके लिए तीन साल का समय दिया गया है। जबकि बांधों को निर्धारित मात्रा में गेट खोलने के लिए एक दिन में ही तैयार किया जा सकता है।

इसके अलावा जिन प्रस्तावित बांधों को यह नियम मानने के लिए कहा गया है, उनके नक्शे में बदलाव की कोई बात नहीं है। पर्यावरणीय बहाव को किस आधार पर तय किया गया है, इस पर भी चुप्पी है क्योंकि सात आईआईटी कंसोर्डियम ने इसे 50 फीसद माना है। दूसरी अहम घोषणा की गई नदी बेसिन अथॉरिटी बनाने की। इसके तहत 17 नदी बेसिन अथॉरिटी बनाए जाएंगे। यह अथॉरिटी राज्यों के बीच नदी जल बंटवारे पर मध्यस्थता करेगी। कुल मिलाकर यह जल के बंटवारे की व्यवस्था है यानी नदी के सर्वोच्च दोहन की। बेसिन अथॉरिटी कहीं भी नदी के जल में नदी के हिस्से की बात नहीं करती। इस कानून को यूं पेश किया जा रहा है मानों यह नदी स्वच्छता की दिशा में उठाया गया सबसे बड़ा कदम है। कावेरी मुद्दा वर्षों पुराना है जो यह साबित करता है कि पानी को लेकर फैला सामाजिक तनाव सुप्रीम कोर्ट और सरकारों के हस्तक्षेप से नहीं दूर हो सकता। अब कावेरी बेसिन अथॉरिटी और कोई भी दूसरी अथॉरिटी किस हद तक इस विवाद को दूर कर पाएंगे जबकि सरकारों के लिए यह समाजिक नहीं, विशुद्ध राजनीतिक मुद्दा है। तीसरा कदम रोचक है।

एनएमसीजी (नेशनल मिशन फॉर क्लीन गंगा) ने विदेशों में मौजूद भारतीय दूतावासों को कहा है कि वे अपने यहां स्थानीय धर्मार्थ कोष का गठन करें ताकि इसमें दान करने वाले अप्रवासी भारतीयों को अंशदान में आयकर छूट मिल सके। एनएमसीजी की कोशिश है कि स्वच्छ गंगा कोष में अप्रवासी भारतीयों का अंशदान बढ़े। यह कोष जनता द्वारा गंगा सफाई के लिए दिए गए धन से बना है। अभी इस कोष में 266 करोड़ रुपये जमा है। एक सच यह भी है कि इस कोष में से पिछले चार साल में एक भी रुपया खर्च नहीं किया गया। वास्तव में गंगा सफाई के लिए धन मुद्दा है ही नहीं। कभी भी नहीं था। गंगा सफाई के लिए मुद्दा है नीयत और इच्छाशक्ति। नमामि गंगे के लिए 20 हजार करोड़ का बजट रखा गया है। इसमें अब तक सरकार ने 5523 करोड़ रुपये जारी किए हंै और गंगा मंत्रालय ने मात्र 3867 करोड़ की राशि खर्च की है। गंगा पहले से ज्यादा मैली है, बजट का बीस फीसद हिस्सा भी खर्च नहीं हो पाया और एनएमसीजी चाहती है कि विदेशों में बसे भारतीय गंगा सफाई के लिए पैसा दें। वास्तव में सरकार को पैसे की जरूरत नहीं है। वह चाहती है कि माहौल बना रहे ताकि जब गंगा एक्ट आए तो उसकी खामियों पर बात न हो। लेकिन बात तो होगी। जीडी अग्रवाल ने जो चिनगारी छेड़ी है वह राख बनकर खाक होने वाली नहीं है।

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