न मृता तेन नर्मदा..

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पिछले कुछ सालों से मीडिया की भूमिका सामाजिक-पर्यावरणीय आंदोलनों में तेजी से बढ़ी है। कैसे ?    कुछ समय पहले तक किसी भी आंदोलन की शुरुआत में सरकार या तो सख्त रुख अपनाती थी या फिर आंदोलनकारियों से बात करती थी, ताकि मीडिया में उसकी किरकिरी ना हो। लेकिन अब सरकार आंदोलन की शुरुआत में ही सबसे पहले मीडिया को मैनेज करती है, इसके बाद आंदोलनकारियों से बात करती है।

आपने मुख्यधारा के अखबारों और टीवी चैनलों में यह नहीं देखा होगा कि मेधा पाटकर नर्मदा विस्थापितों के हक में अनशन पर बैठी हैं और उनकी हालत गंभीर बनी हुई है। लेकिन जिस दिन उनका अनशन शुरू हुआ, उसी दिन देशभर के अखबारों में शिवराज और उनके नर्मदा प्रेम के बारे में पूरे पेज का विज्ञापन छपा हुआ था।

करोड़ों रुपयों के इस विज्ञापन के बाद मीडिया दूसरे जरूरी कामों में व्यस्त हो गया, लेकिन मेधा का अनशन जारी रहा। वे नर्मदा और उसके तटवासियों के लिए अनशन कर रहीं हैं। वे जानती है कि सदानीरा मीडिया में नहीं बह सकती।

मीडिया इन मुद्दों पर शांत है। उसे अपनी भूमिका आंदोलनों के परिप्रेक्ष्य में
बढ़ानी होगी और सही दिशा में बढ़ानी होगी। अन्यथा 
न मृता तेन नर्मदा।

अपनी नर्मदा यात्रा के दौरान शिवराज सिंह चौहान ने 33 करोड़ रुपए के विज्ञापन जारी किए, इसके बाद 2 जुलाई को पौधारोपन विश्व रिकार्ड के दौरान भी करोड़ों बांटकर बताया गया कि स्कंन्ध पुराण में वर्णित ”न मृता तेन नर्मदा” को सरकार ही संभव बना सकती है।

इस दिन पूरे नर्मदा तट पर 6 करोड़ से भी ज्यादा पौधे रोपे जाने का दावा किया गया है। लेकिन मेधा के अनशन की तरह ही किसी के पास यह जानने-देखने का समय नहीं है कि बारिश के भरोसे रोपे गए इन पौधों की हालत क्या है।

एक अनुमान के अनुसार 80 फीसद से ज्यादा पौधों को जानवर चर गए हैं या वे पानी के अभाव में दम तोड़ गए, या फिर हजारों तो ऐसे थे जिनमें जड़ थी ही नहीं सिर्फ टहनी थी। इसके अलावा वे करोड़ों काली पोलिथिन जिनमें भरकर इन पौधों को लाया गया था, अब नर्मदा की लहरों के साथ गलबहियां कर रही हैं।

दो दिन की तेज धूप में ही पौधे झुलसने लगे हैं। पेड़ झुलसने के साथ ही सूखने की शुरुआत हो गई है। मवेशियों से बचाने के लिए प्रशासन कई जगह पौधों की फेसिंग कराने की व्यवस्था कर रहा है। गोया पहले उन्हें पता ही नहीं था कि खुले में लगे पौधों को बकरियां चर जाती हैं।

लेकिन मीडिया में ये सारे पौधे तेजी से वृक्ष बनने की ओर अग्रसर हैं। इधर मेधा पाटकर का आरोप है कि यदि सरदार सरोवर डैम को पूरा भरा गया तो चासीस हजार परिवार ड़ूब जाएगें, क्योंकि अब तक उन्हें वैकल्पिक जगह तैयार करके नहीं दी गई है। मेधा के विरोध के बाद प्रशासन गांव-गांव जाकर दोबारा सर्वे कर रहा है और करीब दो सौ नगरों और गांवों में वचन पत्र भरवाए जा रहे हैं।

सर्वोच्च न्यायालय के आदेशानुसार, गुजरात सरकार को जमीन के साथ पुनर्वास के लिए संघर्षरत परिवारों को 60 लाख रुपए का विशेष पैकेज देना है। वहीं जमीन के बदले नकद मुआवजा लेकर फर्जी रजिस्ट्री कांड में फंसे लोगों को 15 लाख रुपए दिए जाएंगे।

ये राशि जीआरए के माध्यम से मप्र के प्रभावितों को मिलेगी। सरकार का कहना है कि मात्र 681 परिवारों को जमीन के बदले जमीन मिलनी है, लेकिन वास्तव में यह संख्या हजारों में है। इसी तरह डूब क्षेत्र में आने वाले गांवों की संख्या भी सरकारी नोटिफिकेशन में गलत है।

पुनर्वास के लिए बनाए जा रहे घर, स्कूल, अस्पताल आदि के घटिया निर्माण के चलते अब तक चालीस इंजीनियरों को हटाया जा चुका है। इस बात के साफ संकेत हैं कि प्रशासन के लिए विस्थापितों का नया नगर भ्रष्टाचार का एक अदद मौका है।

मीडिया इन मुद्दों पर शांत है। उसे अपनी भूमिका आंदोलनों के परिप्रेक्ष्य में बढ़ानी होगी और सही दिशा में बढ़ानी होगी, अन्यथा ”न मृता तेन नर्मदा” सिर्फ  नर्मदा और उसकी अलौकिकता के लिए लिखा गया है, मीडिया के लिए नहीं। मीडिया का जीवन भरोसे पर टिका है जो लगातार दरक रहा है।

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