डुबकियों के तीन साल

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रटीआई से मिला एक जवाब, गंगा की अविरलता और निर्मलता की बहस पर ‘गिलोटिन’ की तरह गिरा। गिलोटिन प्राचीन काल में मृत्युदंड के लिए उपयोग किया जाने वाला फरसे की तरह का एक हथियार होता था। इस शब्द को बाद में संसद ने लोकसभा अध्यक्ष के अधिकारों को पारिभाषित करने के लिए प्रयोग किया। जिसके तहत अध्यक्ष अपने ‘गिलोटिन पावर’ का उपयोग करते हुए किसी भी बहस को खत्म कर सकते हैं।

केंद्रीय प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड ने इस आरटीआई के जवाब में कहा कि हरिद्वार (जहां आस्था की सर्वाधिक डुबकियां लगती हैं।) का पानी आचमन तो दूर नहाने के लायक भी नहीं है। बोर्ड ने माना कि हरिद्वार का पानी तकरीबन हर पैमाने पर असुरक्षित है।

हरिद्वार गंगा का मैदान में प्रवेश द्वार है। हर की पैड़ी में हर रोज तकरीबन एक लाख लोग डुबकी लगाते हैं। जब यहां के हालात यह हैं तो बाकी गंगा पर बहस करने का कोई औचित्य ही नहीं बनता।

मैदान में तो गंगा की स्थिति बदतर है, लेकिन पहाड़ पर जारी इस रिपोर्ट ने गंगोत्री से लेकर हरिद्वार तक के गंगाजल पर ही सवाल उठा दिए हैं। यह दूरी करीब तीन सौ किलोमीटर बैठती है।

गंगा के पानी की गुणवत्ता की जांच के चार प्रमुख सूचक रहे। जिनमें तापमान, पानी में घुली ऑक्सीजन, बायलॉजिकल ऑक्सीजन डिमांड और कॉलिफॉर्म शामिल हैं। हरिद्वार और उसके आसपास के इलाकों में तो इनके अलावा अन्य जहरीले तत्व भी पाए गए हैं।

तीन साल बाद वैसे भी आंकड़ों का नहीं आंखों देखे नतीजों का ही मतलब होता है। लेकिन गंगा की स्थिति तो कागजों में भी बेहतर नहीं है। ‘नमामि गंगे’ योजना में पांच सालों के लिए 20 हजार करोड़ रुपए का बजट रखा गया था। लेकिन अब तक इसका सिर्फ 18 फीसदी, यानी 3633 करोड़ रुपया ही जारी किया गया।

इससे भी खराब स्थिति यह है कि इस पैसे को भी खर्च नहीं किया जा सका। अब तक सिर्फ 1836 करोड़ रुपए ही खर्च किए जा सके हैं। यानी तीन सालों में कुल बजट का सिर्फ 9 फीसदी ही उपयोग या कहें दुरुपयोग हुआ।

इसी दौरान गंगा में बहने वाले सीवेज कम होने की बजाय बढ़ गए। 2013 में जहां गंगा में हर रोज छह हजार मिलियन लीटर सीवेज जाता था। वहां आज 7500 मिलियन लीटर सीवेज गंगा का हिस्सा बन रहा है। यानी सीवेज रोकने के प्रयास पूरी तरह विफल साबित हुए।

सरकारी दावों के हिसाब से हर रोज मात्र एक हजार मिलियन लीटर गंदा पानी उपचारित किया जा रहा है। इस एक हजार मिलियन लीटर के दावे पर भी सवाल है। बानगी देखिए, योजना के तहत गंगा पथ पर बसे 118 शहरों के सीवेज को उपचारित (ट्रीट) किया जाना था, लेकिन अब तक सिर्फ 11 स्थानों के लिए ट्रीटमेंट प्लांट खरीदे गए। उनमें से भी मात्र तीन काम कर रहे हैं, बाकी या तो तैयार नहीं हैं या फीता काटे जाने की बाट जोह रहे हैं।

इसी तरह 296 घाटों (स्नान और श्मशान) को विकसित किया जाना था, लेकिन अब तक एक भी घाट को योजना के हिसाब से तैयार नहीं किया जा सका है।

नमामि गंगे योजना का जितना ढिंढोरा पीटा जा रहा है, सरकारी आंकड़े ही उसकी हवा निकाल रहे हैं। सचाई यह है कि हरिद्वार में ही गंगाजल आचमन क्या, डुबकी लगाने लायक नहीं रही।

इलाहाबाद, वाराणसी और पटना में एक-एक स्कीमर तैनात किया गया। स्कीमर एक बड़ी मशीन होती है जो नदी की धारा में बह रहे कचरे को समेट लेती है। अब समस्या यह है कि इस स्कीमर का साइज बड़ा होता है इसलिए यह किनारे नहीं आकर बीच धारा में ही रहता है और नदी में गंदगी किनारों पर ही होती है। आस्था की फूल पत्तियां हो या कूड़े के ढेर, सब कुछ किनारे पर ही फेंका जाता है।

डुबकियां भी किनारों पर ही लगती हैं और बोतलों में गंगाजल भी किनारे से ही भरा जाता है। ऊपर जो बजटीय आंकड़े बताए गए हैं, उनमें ज्यादातर घाट नवीनीकरण, ई निगरानी और आंकड़ों के अध्ययन आदि के लिए है। लेकिन क्या इन सबसे नदी की मलीनता पर कोई असर पड़ता है? गंगा तटों पर चल रही नमामि गंगे की दो सौ से ज्यादा योजनाएं तकरीबन इसी तरह की है।

सरकार के तीन साल पूरे होने पर एक सरकारी ऐजेंसी की स्वीकारोक्ति के मायने साफ हैं। वह यह कि पूरी नमामि गंगे योजना पर ही नए सिरे से विचार किया जाए, ताकि 2019 में जब जनता की अदालत में मामला आए तो गंगा की अविरलता और निर्मलता पर सार्थक बहस हो सके।

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