चेचर : हर काल समाया है यहां की गंगा में!

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आज 28 गांवों वाला चेचर ग्राम समूह, मूल वैशाली साम्राज्य होने का दावा करता है। रामपुकार सिंह आज
करीब सौ साल के होने वाले हैं। आंखों में रोशनी नहीं है लेकिन चमक बरकरार है। उन्हे याद नहीं कि वे
दसवीं पास हैं या फेल । लेकिन इससे फर्क भी क्या पड़ता है?

त्तर के दशक के शुरुआती सालों की बात है। गंगा में कटान इस बार कुछ ज्यादा ही था। गांव के गांव हर रोज पीछे खिसक रहे थे। पूर्व मुख्यमंत्री दीप नारायण सिंह के साथ रामपुकार सिंह लोगों को मदद पहुंचाने में जुटे थे। कटान के कारण मिट्टी के नीचे नजर आ रही बालू संकेत कर रही थी कि यह नदी का ही घर है। नदी ने रास्ता बदला तो उस छूटी हुई जगह पर गांव बस गए। अब गंगा दोबारा अपनी जमीन की ओर लौटी है तो गांवों में हाहाकार मचा हुआ है। ऐसा ही एक गांव था चेचर। चेचर, पटना के उस पार यानी गंगा के उत्तरी तट पर बसा था। रामपुकार और दीपनारायण सिंह ने तय किया कि एक गाछ (पेड़) काटकर यदि कटान की जगह पर बांध कर लटका दिया जाए तो कटान रुक सकती है। पेड़ काटने की जरूरत नहीं पड़ी क्योंकि बाढ़ अपने साथ पीछे से पेड़ भी बहाकर ला रही थी। गांव वालों ने पेड़ को रस्सी से बांधकर लटकाने की कोशिश की ताकि पेड़ की टहनियां और पत्ते गंगा की धारा के जोर को कुछ कम कर दें । इसी कोशिश में पेड़ के सहारे लटके रामपुकार सिंह का पैर किसी धातु से टकराया।

वे कुछ देर तो उसी का सहारा लिए रहे, फिर एक डाल को मजबूती से पकड़ हाथों से उसे टटोलने लगे। दीपनारायण सिंह ने उन्हें ऊपर से कुछ खंगालते देखा तो इस तनाव के समय भी उनके चेहरे पर मुस्कराहट आ गई। वे जानते थे रामपुकार को पुरानी वस्तुएं ढूढ़ने और उन्हे संभालने का शौक है। वे अब तक कई मोहरों के साथ पॉलिशदार बर्तन के टुकड़े, टेराकोटा मूर्तियां, हेलना की मूर्तियां, हड्डी के औजार, पत्थर के औजार, मनके और ना जाने क्या-क्या जमा कर चुके हैं। रामपुकार सिंह ने अपना हाथ मिट्टी से बाहर खींचा तो उनके हाथ में कोई नुकीली सी धातु आ गई, पहली नजर में उन्हें समझ ही नहीं आया कि यह क्या है? उन्होंने सोचा कि बाढ़ में बहे किसी तांबे के बर्तन का टुकड़ा लगता है फिर आदतानुसार उसे संभाल कर रख लिया। रामपुकार कोई पुरातत्ववेत्ता तो थे नहीं जो किसी धातु की उम्र समझ पाते लेकिन शौक पूरा था। और उनके सहित वहां मौजूद किसी शख्स को यह अंदेशा नहीं था कि उनकी जमीन के नीचे क्या दबा हुआ है? रामपुकार तांबे की बनी उस नुकीली वस्तु को लेकर पटना भारतीय पुरात्तव विभाग पहुंचे।

तब पता लगा कि उन्होंने त्रेता युग का बाण का अगला हिस्सा (एरो हेड) खोज लिया है। पुरानी चीजों को सहेजने का यह जुनून कुछ इस कदर परवान चढ़ा कि देखते ही देखते चेचर संग्राहलय ने आकार ले लिया। रामपुकार की कोशिशों पर सरकार का ध्यान गया और पुरातत्व विभाग द्वारा वहां खुदाई की गई। खुदाई में रामायण काल में महानगर होने के अवशेष मिले। साथ ही फारसी में शेरो शायरी के अंदाज में लिखी रामायण भी मिली। फारसी भाषा में रामायण का अनुवाद करने वाले ईरान के प्रसिद्ध शायर सादिक अली थे और यह 17वीं सदी में लिखी गई थी। वैसे रामायण का अनुवाद तो दुनिया की तकरीबन हर भाषा में किया गया है लेकिन शेरों-शायरी के अंदाज में यह पुस्तक निराली है। रामायण काल से लेकर फारसी अनुवाद तक की सामग्री बताती है कि इस जमीन ने तकरीबन हर कालखंड को जीया है। आज यह इलाका सरकार के संरक्षण में हैं। वह एरो हेड जो अब तक संग्रहालय की एक अलमारी में यूं ही रखा था, अब सरकार के उपलब्ध कराए लॉकर में रखा हुआ है। जब तक यहां मौजूद चीजों की कीमत नहीं पता थी तब तक सब कुछ सामान्य से बिना सुरक्षा वाले कमरे में भी सुरक्षित था लेकिन कीमत पता चलते ही संग्रहालाय की सुरक्षा बढ़ा दी गई। आज 28 गांवों वाला चेचर ग्राम समूह मूल वैशाली साम्राज्य होने का दावा करता है। रामपुकार सिंह आज करीब सौ साल के होने वाले हैं। आंखों में रोशनी नहीं है लेकिन चमक बरकरार है। उन्हे याद नहीं कि वे दसवीं पास हैं या फेल । लेकिन इससे फर्क भी क्या पड़ता है।

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