गंगा एक्ट में देरी क्यों?

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गंगत्व ही वह मूल गुण है जिस कारण गंगा पर एक्ट लाने की जरूरत महसूस की जा रही है। गंगत्व को सरकार और वैज्ञानिक साफ तौर पर स्वीकार करते हैं लेकिन इसे एक्ट में शामिल नहीं कर सकते। गंगत्व को पाने या बचाने की कोशिश का मतलब है गंगा के साथ पवित्र व्यवहार सुनिश्चित करना यानी उससे राजस्व के उगाहने का विचार छोड़ना। विकास के रथ पर सरपट दौड़ती सत्ता यह सौदा नहीं कर सकती।

पिछले साढ़े चार साल में गंगा मंत्रालय और उसके मंत्रियों के काम करने का तरीका देखिए। सबसे पहले मंत्री जी मीडिया के सामने कोई वादा कर देते हंै। जैसे ई वोट, नाला बंद करना, घाट निर्माण, जीरो डिचार्ज, पौधरोपण या फिर गंगा निर्मलता की कोई तारीख दे देना। कुछ महीने बीत जाने पर वे दबाव बढ़ता देख अपने वादे को संकल्प में बदल देते हैं अधिकारियों के मुंह से एक तारीख निकलवाते हैं कि फलां तारीख तक यह काम हो जाएगा। अब अधिकारी अपनी पूरी ताकत उस योजना को एक छोटी सी जगह पर शुरू करने (सिर्फ शुरू करने) में लगा देते हैं। यह पूर्व निर्धारित जगह ज्यादातर बनारस का असी घाट होती है। फिर तय समय पर उस जगह में योजना को लागू कर दिया जाता है। इसके बाद गगनभेदी नारा लगाया जाता है गोया यह योजना आपके घर में रखे गंगा जल पर भी लागू हो गई है। विचार करके देखिए, आपको एक भी ऐसी योजना याद नहीं आएगी जो लागू की गई और जिस पर लगातार बात हो रही है।

किसी के पास यह जानने की फुर्सत नहीं कि झारखंड में गंगातट पर जो लाखों पौधे रोपे गए थे, उनका हुआ क्या? या फिर सोलर पैनल से चलने वाली ई वोट बंद क्यों हो गई? ऐसे ही कई सवाल हैं। न्यूनतम प्रवाह नोटिफिकेशन पर बांध कंपनियां अमल क्यों नहीं कर रहीं और कत्लखाने हटाने में सरकार को समस्या क्या है? इन सारे सवालों का जवाब यह है कि जनता को सिर्फ शुभारंभ याद रहता है सत्ता इस बात को अच्छी तरह जानती है। बस इसीलिए गंगा एक्ट बचा कर रखा गया है ताकि चुनाव के ठीक पहले उसे सामने रखा जाए और जीडी अग्रवाल के साथ-साथ उनकी मांगों और गंगा सफाई पर उठने वाले सवालों को एक झटके में आप्रासंगिक कर दिया जाए। वैसे प्रस्तावित एक्ट अभी तक अंतिम रूप नहीं ले पाया है। जीडी अग्रवाल के अनशन के चलते बने दबाव में आनन-फानन एक प्रारूप तैयार किया गया था, खुद सरकार ही इसे लेकर असमंजस में थी। अब दूसरे मंत्रालयों से सुझाव मंगाकर इसे अंतिम रूप देने की कोशिश की जा रही है। प्रस्तावित गंगा एक्ट में ऐसे कई प्रावधान हैं जो सुनने में अच्छे लगते हैं। लेकिन गंगापथ पर व्यावहारिक नहीं है। एक्ट में प्रावधान है कि गंगा में साबुन लगाना या कपड़े धोना दंडनीय अपराध है जिसके लिए दो साल तक कैद हो सकती है। इतिहास गवाह है कि इस तरह के प्रावधान कभी लागू नहीं किए जा सके हैं। ये सिर्फ वाहवाही लूटने और निचले स्तर पर भ्रष्टाचार के कारण बनते हैं।

प्रस्तावित एक्ट अभी तक अंतिम रूप नहीं ले पाया है। जीडी अग्रवाल के अनशन के चलते बने दवाब में आनन-फानन एक प्रारूप तैयार किया गया था। खुद सरकार ही इसे लेकर असमंजस में थी।

एक्ट में बांध निर्माण पर कोई बात नहीं की गई है यानी यह तय है कि तमाम विरोधों के बाद भी गंगा पर नए बांध बनते रहेंगे। जीडी अग्रवाल की चार प्रमुख मांगों पर भी यह एक्ट मौन है। इसमें न ही रेत खनन पर रोक की बात है न ही गंगा भक्त परिषद निर्माण की। एक्ट में नदी की निर्मलता पर जोर दिया गया है न कि अविरलता पर। गंगत्व पर तो विचार ही नहीं किया गया। गंगत्व ही वह मूल गुण है जिस कारण गंगा पर एक्ट लाने की जरूरत महसूस की जा रही है। गंगत्व को सरकार और वैज्ञानिक साफ तौर पर स्वीकार करते हैं लेकिन इसे एक्ट में शामिल नहीं कर सकते। गंगत्व को पाने या बचाने की कोशिश का मतलब है गंगा के साथ पवित्र व्यवहार सुनिश्चित करना यानी उससे राजस्व के उगाहने का विचार छोड़ना। विकास के रथ पर सरपट दौड़ती सत्ता यह सौदा नहीं कर सकती। 

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