केन-बेतवा.. कुछ खामोश सवाल

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शंकाओं ने आकार लेना शुरू कर दिया है। केन-बेतवा लिंक प्रोजेक्ट के बारे में दावा है कि यह मध्य प्रदेश और उत्तर प्रदेश में फैले बुंदेलखंड क्षेत्र में पानी की समस्या को दूर करेगा, लेकिन इसके पानी के बंटवारे को लेकर तलवारे खिंच गई हैं।

प्रधानमंत्री कार्यालय का हस्तक्षेप भी दोनों राज्यों को समझाने में विफल रहा। यहां राजनीति कुछ भी नहीं है, क्योंकि दोनों पक्ष और मध्यस्थ सभी एक ही पार्टी से हैं। अपने हिस्से के पानी को कसकर पकड़े राज्य कहीं न कहीं यह जानते हैं कि लिंक प्रोजेक्ट पानी को पैदा नहीं करेगा यानी पानी की उपलब्धता उत्तरोत्तर कम ही होगी, वह बढ़ेगी नहीं।

नदियों के इस सबसे बड़े फ्लैगशिप परियोजना पर उससे जुड़े राज्यों का रवैया चिंता पैदा करता है कि 9,000 करोड़ रुपए कहीं पानी में ही तो नहीं बहने जा रहे? इतना खर्च कर जिन नदियों को जोड़ा जा रहा है वे थोड़ा आगे बढ़कर प्रकृति की नदी जोड़ो योजना के तहत खुद ही यमुना में मिल जाती हैं।

इन नदियों पर पहले ही 22 बांध मौजूद हैं। अब छह और प्रस्तावित हैं तो पुराने बांधों का क्या होगा? क्या बांधों के जरिए नदियों को जोड़ना ही एकमात्र उपाय है?

आम आदमी सोचता है कि दो नदियों को एक नहर के माध्यम से जोड़ दिया जाएगा ताकि ज्यादा पानी वाली नदी कम पानी वाली नदी को पानी दे सके, लेकिन केन-बेतवा के संदर्भ में इसका मतलब है एक विशाल बांध और भी कई सारे बांध और ढेरों नहरें।

इन नहरों से पन्ना राष्ट्रीय उद्यान की कितनी जमीन दलदली होगी, इसका सिर्फ अनुमान ही व्यक्त किया जा सकता है। अवैध शिकार के चलते यहां पहले ही बाघ न के बराबर बचे थे। अब सरकार ने करोड़ों खर्च कर फिर से बाघों को यहां बसाने की शुरुआत की है।

नदियों के इस सबसे बड़े फ्लैगशिप परियोजना पर
उससे जुड़े राज्यों कारवैया चिंता पैदा करता है कि 9,000 करोड़ रुपए
कहीं पानी में ही तो नहीं बहने जा रहे?

लिंक परियोजना के शुरू होने पर यह पूरी कवायद शून्य साबित हो जाएगी। डीपीआर के मुताबिक, उत्तर प्रदेश को केन नदी का अतिरिक्त पानी देने के बाद मध्य प्रदेश करीब इतना ही पानी बेतवा की ऊपरी धारा से निकाल लेगा।

परियोजना के दूसरे चरण में मध्य प्रदेश चार बांध बनाकर रायसेन और विदिशा जिलों में नहरें बिछाकर सिंचाई के इंतजाम करेगा। लेकिन इस पूरी कवायद में कहीं भी यह नहीं बताया गया कि क्या इन नदियों के पास इतना पानी है या रहेगा?

सरकारी दावों का यह आधार भी वैज्ञानिक नहीं है कि इस परियोजना के पूरा होने से 15 लाख लोगों को साफ पीने का पानी मिलेगा और 70 लाख लोग इससे सीधे तौर पर लाभान्वित होंगे। यह दावा इसलिए हवा-हवाई है, क्योंकि पर्यावरणीय मंजूरी के लिए डेवलपरों द्वारा पेश किए गए आंकड़े ही आपस में मेल नहीं खाते।

नदियों को जोड़ने की परियोजना को पहले चरण में तीन तरह की पर्यावरणीय मंजूरी की जरूरत होती है। एक पर्यावरण संरक्षण कानून, 1986 के तहत, दूसरी वन्यजीव संरक्षण कानून, 1976 के तहत और तीसरी वन्य संरक्षण कानून, 1980 के तहत। अन्य सभी परियोजनाओं की तरह केन-बेतवा परियोजना के लिए भी पर्यावरण, वन एवं वन्यजीव मंजूरी अलग-अलग दी गई।

सरकार को सौंपे गए दस्तावेजों के मुताबिक डेवलपरों ने तीन तरह की मंजूरियों के लिए जो आंकड़े पेश किए उनमें भी कई असमानताएं हैं। परियोजना की लागत लगातार बढ़ती जा रही है। शुरुआत में 1994-95 के मूल्य स्तर पर इसकी लागत 1,998 करोड़ रुपए रखी गई थी। वर्ष 2015 में यह करीब 10,000 करोड़ रुपए पहुंच चुकी थी।

अलबत्ता परियोजना के दस्तावेज में यह नहीं बताया गया था कि यह लागत मौजूदा मूल्य स्तर पर है या नहीं। मंजूरी के लिए सरकार को सौंपे गए एक अन्य दस्तावेज में परियोजना के प्रभावितों के पुनर्वास और पर्यावरण प्रबंधन की लागत 5,072 करोड़ रुपए बताई गई। मंजूरी देते समय परियोजना के लागत लाभ विश्लेषण के भाग के रूप में इस पर विचार नहीं किया गया।

अटल बिहारी वाजपेयी सरकार के समय जब नदियों को जोड़ने पर विचार हो रहा था, तब ग्लोबल वॉर्मिंग पर चिंता जाहिर करना फैशन नहीं बना था। अनुपम मिश्र जैसे पर्यावरणविद् जरूर सरकारों को चेताते रहते थे। लेकिन आज यह चुनौती है, वैश्विक चुनौती।

इस चुनौती से निपटने की हमारी गंभीरता हमारे पेरिस घोषणा-पत्र से जाहिर होती है, लेकिन इस गंभीरता को वास्तविक स्वरूप देने के लिए नदी जोड़ो जैसी योजनाओं पर दुबारा विचार करना पड़ेगा अन्यथा आशंकाएं तो बहुत हैं और लगातार आकार ले रही हैं।

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