आखिर कहां गए गोपाल दास?

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गोपाल दास गायब होने से पहले कई बार मनोवैज्ञानिक दबाव की बात कह चुके थे। उनके साथी भी उनके नाम पर ‘डील’ करने में लगे थे। वह इस बात से भी दुखी थे कि मुद्दे पर बात करने के बजाए आंदोलन से जुड़े लोगों में सेनापति बनने की होड़ मची है।

दिल्ली हाई कोर्ट ने हैवियस कार्पस के तहत सरकार को आदेश दिया है कि गोपाल दास को हाजिर करें। गोपाल दास एक संत हैं जो तकरीबन दो सौ दिनों से गंगा के गंगत्व के लिए अनशन पर है या यूं कहें थे। प्रख्यात पर्यावरणविद प्रोफेसर जीडी अग्रवाल की शहादत के बाद देश का ध्यान गोपाल दास की तरफ गया। अग्रवाल की मौत से हड़बड़ाई सत्ता ने उन्हें उठाकर कभी ऋषिकेश तो कभी दिल्ली एम्स में भर्ती करा दिया। पांच दिसंबर को गोपालदास लापता हो गए। पहले तो एम्स प्रशासन ने उनके गायब होने पर अनभिज्ञता जाहिर की। उनके पिता घंटों एम्स में बैठे रहे लेकिन डाक्टरों बार बार यही कहा कि हमें नहीं पता गोपाल दास कहां चले गए। जब राजनीतिक दबाव बढ़ा तब एम्स निदेशक रणदीप गुलेरिया सामने आए। उन्होने तर्क दिया कि गोपाल दास पूरी तरह स्वस्थ थे और उनकी इच्छा अनुसार उन्हे छुट्टी दे दी गई। महीनों से अनशन पर बैठा शख्स ‘पूरी तरह स्वस्थ’ कैसे होता है यह गुलेरिया ही जानते होंगे। उस दिन एम्स की गाड़ी गोपाल दास को लेकर देहरादून पहुंची और कलेक्टर के घर के बाहर उन्हें छोड़ कर चली गई। गोपाल दास की नाक में ट्यूब लगी हुई थी जिससे खून बह रहा था। कलेक्टर के घर के बाहर अकेले खड़े गोपाल दास ने अपने एक साथी को फोन किया, वे गोपाल दास को लेकर मैक्स अस्पताल पहुंचे जहां गोपाल दास की हालात देख कर मैक्स ने एमएलसी केस बता इलाज करने से मना कर दिया।

पांच दिसंबर को गोपालदास लापता हो गए। पहले तो एम्स प्रशासन ने उनके गायब होने पर अनभिज्ञता जाहिर की। उनके पिता घंटों एम्स में बैठे रहे लेकिन डाक्टरों बार बार यही कहा कि हमें नहीं पता गोपाल दास कहां चले गए।

तब उनके साथी उन्हें लेकर दून अस्पताल पहुंचे और उन्हें भर्ती करा दिया। दून अस्पताल का रिकार्ड बताता है कि 5 दिसंबर रात 1.25 बजे उन्हें दाखिल किया गया। उसी रात को वे दून अस्पताल से गायब हो गए। प्रशासन सीसीटीवी फुटेज के आधार पर दावा कर रहा है कि वे खुद उठ कर अस्पताल से बाहर चले गए लेकिन अब तक ऐसा कोई फुटेज सार्वजनिक नहीं किया गया है। किसी आशंका के डर से गोपाल दास की मां ने प्रशासन से बेटे को वापस लाने की अपील की। वे दत्तात्रेय घाट, ऋषीकेश पर अनशन पर भी बैठ गई जिन्हें पर्यावरण कार्यकर्ताओं ने समझाबुझा कर उठाया। लेकिन गोपाल दास की कोई खबर नहीं मिली। हाईकोर्ट के आदेश के बावजूद प्रशासन हाथ पर हाथ धरे बैठा हुआ है। पुलिस ने गोपाल दास के साथी आचार्य रविंद्र के हवाले से यह दावा जरूर किया कि वे आंध्र प्रदेश में हंै और सुरक्षित हैं। लेकिन इस दावे के बाद से आचार्य रविंद्र भी गायब हैं। पुलिस ने अब तक उनके या गोपाल दास के मोबाइल को सर्विलांस पर भी नहीं लगाया। पुलिस के लिए उनकी लोकेशन पकड़ना मुश्किल नहीं है। लेकिन ऊपर से आदेश है कि इस मुद्दे पर कोई पहल नहीं करना है। वास्तव में सरकार गोपालदास और आत्मबोधानंद जैसे संन्यासियों से बात ही नहीं करना चाहती। उसे लगता है मीडिया को मैनेज कर गंगा सफाई पर उठ रहे सवालों को दबाया जा सकता है। इस बात की भी पूरी आशंका है कि गोपाल दास को पुलिस ने अपनी निगरानी रखा हो और उन्हें जबरदस्ती भोजन दिया जा रहा हो, गायब होने से पहले वे कई बार मनोवैज्ञानिक दबाव की बात कह चुके थे। क्योंकि उनके साथी भी उनके नाम पर ‘डील’ करने में लगे थे। गोपाल दास इस बात से भी दुखी थे कि मुद्दे पर बात करने के बजाए आंदोलन से जुड़े लोगों में सेनापति बनने की होड़ मची है। हाईकोर्ट सहित पर्यावरण से जुड़े सभी लोग यह इंतजार कर रहे हैं कि प्रशासन उन्हे कोर्ट के सामने पेश करे। और कोई अनहोनी न हुई हो।

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