समाधान की नहीं, विरोध-प्रदर्शन की समय सीमा

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पिछले दिनों जंतर-मंतर पर नई सरकार के इंतजार में लोग विरोध-प्रदर्शन से दूर रहे। परंतु नई सरकार ने आते ही जंतर-मंतर पर विरोध-प्रदर्शन करने की समय सीमा तय कर दी है। समस्या के समाधान की समय सीमा क्या होगी? इस पर सरकार मौन है।

जून की गर्मी में जंतर-मंतर का दृश्य बड़ा ही मार्मिक था। अपना गांव-घर छोड़ कर दिल्ली में न्याय की उम्मीद में आए लोगों को पुलिस के क्रोध का शिकार बनना पड़ा। तपती धूप से बचने के लिए प्रदर्शनकारी टेंट लगाए थे। पुलिस-प्रशासन ने उसे उजाड़ दिया। इस बाबत संसद मार्ग थाने के पुलिस अधिकारियों का कहना है कि ‘‘यह क्षेत्र सुरक्षा की दृष्टिकोण से संवेदनशील है। इसलिए पुलिस-प्रशासन एक दिन के धरना- प्रदर्शन की इजाजत देती है। लेकिन ये लोग यहां महीनों डेरा डाल देते हैं।’’

आमतौर पर संसद सत्र के दौरान जंतर-मंतर पर होने वाले प्रदर्शनों की संख्या बढ़ जाती है। इस बार तो नई सरकार से लोगों को अपार उम्मीदें हैं। इसलिए देश भर से सैकड़ों लोग अपनी समस्या लेकर आए थे। सोलहवीं लोकसभा का यह पहला सत्र था। लेकिन सरकारी नुमाइंदों ने प्रदर्शनकारियों के साथ जो सुलूक किया वह किसी भी लोकतांत्रिक सरकार से उम्मीद नहीं की जा सकती है। यहां पीड़ित खुले आसमान के नीचे दोहरा ताप झेलते रहे। क्योंकि गर्मी से कहीं अधिक दुखदायी उनकी समस्या है। जिसके समाधान के लिए वे यहां आए हैं। हरियाणा के हिसार का भगाना गांव अप्रैल माह से ही चर्चा में है। इस गांव के दबंगों ने नाबालिग दलित बच्चियों के साथ दुष्कर्म किया। लेकिन पीड़ित को न्याय की कौन कहे, उसकी सुनवाईं भी नहीं हुई। हरियाणा के मुख्यमंत्री पर अपने स्वजातीय दबंगों को संरक्षण देने का आरोप लगता रहा है। इस कारण भगाना से पीड़ित परिवार जंतर-मंतर पर प्रदर्शन करने आए। पुलिस ने उनके टेंट को भी उजाड़ दिया। चिलचिलाती धूप में अपने बच्चे को चुन्नी की ओट में लिए भगाना की एक महिला कहती हैं, “क्या न्याय मांगना गुनाह है? हमें कब तक इंसाफ मिलेगा यह तो किसी ने नहीं बताया। उल्टे पुलिस वाले जगह खाली करने की धमकी दे रहे हैं।”

झुलसाने वाली गर्मी में भारतीय किसान यूनियन ने जंतर-मंतर पर आकर नई सरकार को उनके वादे याद दिलाए। यूनियन के राष्ट्रीय अध्यक्ष चौध्ारी हरपाल सिंह ने कहा कि ‘‘ग्रामीण अंचलों में टूटी हुई सड़कों को विशेष बजट स्वीकृत कर मजबूत व टिकाऊं बनाने और किसानों को फसलों के ड्योढ़े दाम देने की जरूरत है।’’ उनके साथ आए फर्रुखाबाद के किसान सर्वेश शाह ने कहा कि ‘‘गांवों में कई समस्याओं से दो-चार होना पड़ता है। बिजली और पानी की समस्या तो है ही। सार्वजनिक तालाबों पर दबंगों ने कब्जा कर रखा है।’’ मैनपुरी से आई रामबती देवी कहती हैं कि खेत में देहतोड़ मेहनत करने के बाद भी किसानों का गुजारा बड़ी मुश्किल से हो पाता है। वे चाहती हैं कि सरकार किसानों की दशा सुधारने की दिशा में जल्दी और ठोस पहल करे।

दिल्ली विश्विद्यालय के प्रो. जी.एन. र्साइंबाबा को पिछले दिनों नक्सल समर्थक होने के आरोप में पुलिस ने गिरफ्तार किया है। साईंबाबा की रिहाई को लेकर जन संस्कृति मंच के आह्वान पर जंतर-मंतर पर एक संयुक्त सांस्कृतिक विरोध सभा का अयोजन हुआ। विरोध सभा में चित्रकार अशोक भौमिक ने कहा कि प्रो. जी.एन. साईंबाबा की गिरफ्तारी लोकतंत्र विरोध्ाी कार्रवाई है। वहीं डूटा की अध्यक्ष नंदिता नारायण ने कहा कि पुलिस ने अपहरण के अंदाज में साईंबाबा की गिरफ्तारी की, यह शर्मनाक है। इस बाबत फिल्मकार संजय काक ने कहा कि साईंबाबा गरीबों और आदिवासियों पर ग्रीन हंट के तहत ढाये जा रहे दमन का विरोध कर रहे थे, इसी कारण उन्हें निशाना बनाया गया है।

जंतर-मंतर से प्रदर्शनकारियों को जबरदस्ती हटाए जाने के खिलाफ जेएनयू छात्र संघ के पदाधिकारियों के नेतृत्व में छात्रों ने प्रदर्शन किया। जेएनयूएसयू के अध्यक्ष अकबर का कहना है कि ‘‘यह महज संयोग नहीं कि संसद सत्र के पहले ही दिन पीड़ितों को प्रदर्शन करके अपनी समस्या बताने से रोका जा रहा है। सरकार न्याय देने की बजाए विरोध-प्रदर्शन का अधिकार भी छिनने की कोशिश कर रही है।’’

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