संसद भवन की देहरी पर जन-संसद

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कौतुहल का वातावरण बना हुआ था। कारण एक ही था कि जिस विचार परिवार के प्रतीक प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी माने जाते हैं, उसी परिवार के एक संगठन ने जंतर मंतर पर खुली जन-संसद का आयोजन किया था।

इससे साफ हो रहा था कि उसका भरोसा भवन के भीतर वाली संसद से उठने लगा है। दरअसल, भूमि अधिग्रहण अध्यादेश को लेकर विपक्षी दलों के विरोध का सामना कर रही मोदी सरकार की मुश्किलें बढ़ने लगी हैं। अब केंद्र की सत्ता पर काबिज भारतीय जनता पार्टी की सरकार को घर से ही चुनौती मिलने लगी है। राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ की विचारधारा से प्रेरित स्वदेशी जागरण मंच ने इसी मुद्दे पर स्वदेशी जन-संसद आयोजित कर मोदी सरकार से अहंकार त्याग करने और किसान विरोधी अध्यादेश न लागू करने की अपील की है।

मंच से बोलने वाले अधिकाश वक्ताओं का कहना था कि सरकार किसान को दिहाड़ी मजदूर बनाने पर आमादा है।

जंतर मंतर पर पांच मई बैठी स्वदेशी जन संसद में विचारक केएन. गोविंदाचार्य, स्वदेशी जागरण मंच के संगठन मंत्री कश्मीरी लाल, दिल्ली प्रदेश के संयोजक अश्विनी महाजन, कृषि वैज्ञानिक देवेंद्र शर्मा ने भूमि अधिग्रहण विधेयक पर सरकार को खरी-खरी सुनायी।

स्वदेशी जागरण मंच के राष्ट्रीय संयोजक अरुण ओझा ने सा़फ तौर पर कहा कि हमारा विरोध मोदी से नहीं, बल्कि सरकार की आर्थिक नीतियों से है। गोरखनाथ और मत्स्येन्द्र नाथ की कथा सुनाते हुए उन्होंने कहा कि संसद के भीतर जाकर सत्ता के आनंद में जनहित को भूल जाने वालों को सही रास्ते पर लाना इस जन-संसद का उद्देश्य है।

संसद भवन के सामने ही दूसरी संसद लगी थी। वह जन-संसद थी। संसद भवन के भीतर बैठे जन प्रतिनिधि जब जन की अनदेखी करने लगे तो विकल्प नहीं रह जाता। जंतर मंतर पर ही जन-संसद बैठ जाती है। पांच मई को यही हुआ। वैसे भी सरकार की जनविरोधी नीति या अन्याय के खिलाफ ही यहां प्रदर्शन होते हैं।

हालांकि यह अलग बात है कि सरकार अभी अपने परिवार की बात सुनना चाहती है। इसलिए सरकार की तरफ से पहले कृषि राज्यमंत्री संजीव बालियान के साथ कुछ सांसद आए। समापन से पहले उत्तर पूर्वी दिल्ली से भाजपा सांसद मनोज तिवारी भी मंच पर आकर बोले। मनोज तिवारी यह जानने आए थे कि आखिर विरोध किस बात पर है।

भूमि अधिग्रहण विधेयक में क्या किसान विरोधी है? वहां जब चारों तरफ से सवाल उठने लगे तो आयोजकों ने बात संभाली। खुद को स्वदेशी समर्थक बताते हुए मनोज तिवारी ने कुछ देशभक्तिपूर्ण गीत सुनाकर लोगों का दिल जीता। संजीव बालियान बस सुन-सुनाकर चले गए। पर किसी के पास किसानों की आशंकाओं का समाधान नहीं था।

कृषि वैज्ञानिक देवेंद्र शर्मा ने कहा कि केंद्र सरकार ने कहा था कि भूमि अधिग्रहण होने दो, इससे 30 करोड़ नौकरियों का सर्जन होगा, जो नौकरियां किसान परिवार के सदस्यों को मिलेंगी। उन्होंने सवाल उठाया कि इतनी नौकरियां तो आजादी के बाद से अब तक नहीं हुईं, तो अब कैसे हो जाएगी। असल में सरकार सबको मूर्ख बना रही है।

उन्होंने कहा कि ताजा रिपोर्ट के मुताबिक केवल आठ फीसदी प्रोजेक्ट भूमि अधिग्रहण न होने के चलते लंबित हैं। उन्होंने कहा कि सरकार को अपना अहंकार छोड़कर इस अध्यादेश को वापस लेना चाहिए। उन्होंने सा़फ तौर पर कहा कि प्रधानमंत्री रेडियो पर सिर्फ अपने मन की बात कहते हैं। उन्हें किसान के मन की बात भी सुननी चाहिए।

जन-संसद में आये प्रतिनिधियों ने सर्वसम्मति से एक प्रस्ताव भी पारित किया। यह प्रस्ताव सांसदों और मंत्रियों के माध्यम से सरकार को भेजा गया। इस प्रस्ताव में कहा गया है कि स्वतंत्रता प्राप्ति के पश्चात आज तक सरकारों द्वारा अधिग्रहित भूमि और बड़े उद्योगपतियों के पास पड़ी बेकार भूमि, उसके वर्तमान उपयोग तथा खाली पड़ी शेष भूमि के बारे में एक श्वेत पत्र जारी किया जाए। खेती तथा वन भूमि को किसी भी कीमत पर अन्य उपयोगों के लिए अनुमति नहीं मिलनी चाहिए।

निजी उद्योगों की भूमि आवश्यकता की पूर्ति सरकार की जिम्मेदारी नहीं होना चाहिए। आधारभूत संरचना के लिए अधिग्रहित भूमि का संयमपूर्वक सदुपयोग होना चाहिए। भूमि अधिग्रहण में किसानों की सहमति सुनिश्चित हो।

प्रस्ताव में कहा गया है कि नई सरकार की जनधन योजना, मुद्रा बैंक की स्थापना समेत वर्तमान सरकार के कुछ प्रयासों का यह जन-संसद स्वागत करती है। साथ ही साथ इस जन-संसद की यह स्पष्ट मान्यता है कि सरकार देश में किसानों, मजदूरों, लघु उद्यमियों, गरीबों और वंचितों को ध्यान में रखकर ही अपनी नीतियां बनाए।

प्रस्ताव कहता है कि अगस्त 2013 में कृषि पर संसदीय स्थायी समिति ने कहा था कि जीएम फसलों के सभी जमीनी परीक्षणों को रोकना चाहिए, जब तक कि मानव, धरती और जैव विविधता पर इनके प्रभाव पता नहीं लग जाते। सर्वोच्च न्यायालय द्वारा गठित तकनीकी विशेषज्ञ समिति, जिसमें संबंधित क्षेत्रों के बड़े वैज्ञानिक शामिल थे, ने भी जी.एम. फसलों के खुले में परीक्षणों में निहित खतरों के बारे में कहा था।

यह सिफारिश की थी कि जब तक नियामक व्यवस्था पूरी तरह से लागू न हो, तब तक जी.एम. फसलों का खुले में परीक्षण नहीं होना चाहिए। भारतीय जनता पार्टी के चुनाव घोषणा-पत्र में भी यही बात कही।

दरअसल जी.एम. बीज बेचने वाली कम्पनियां भारत में अपना एकाधिकार जमाना चाहती हैं। हमारे किसानों को उन कम्पनियों पर ही निर्भर होना पड़ेगा। आज जी.एम. बीज वाली कम्पनियां भारत में बीटी काटन का बीज बेचकर जमकर मुनाफा कमा रही हैं। जो बीज वह यहां बेच रही हैं, उसकी लागत महज 20 रुपए है और 940 रुपए में वह उसे बेच रही है।

स्वदेशी जन-संसद की यह स्पष्ट मान्यता है कि जी.एम. फसलों के जमीनी परीक्षणों पर तुरंत प्रभावी रोक लगे।

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