कारगर कायदा-कानून की मांग

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कहीं आग लगती है तो सबसे पहले अग्निशमन दल बुलाए जाते हैं। दुर्भाग्य से यह विभाग सरकारी उपेक्षा का शिकार है और बुनियादी जरूरतों के लिए भी जूझ रहा है।

देश भर का अग्निशमन विभाग खस्ता हालत में है। विभाग के पास आज की जरूरत के हिसाब से न तो आधुनिक अग्निशमन यंत्र हैं। न ही प्रशिक्षित कर्मचारी।

शहरों  में बहुमंजली इमारतें बन रही हैं। दुर्घटनाएं भी अधिक हो रही हैं। इसके बावजूद आग लगने पर विभाग के पास तत्काल राहत देने वाला कोई यंत्र नहीं है। केंद्र और राज्य सरकारें के साथ-साथ स्थानीय नगर निगम अग्निशमन दल के आधुनिकीकरण और कर्मचारियों की सुरक्षा पर कोई ध्यान नहीं दे रहा है।

राज्यों के वार्षिक बजट में अग्निशमन दल के लिए कोई बड़ी राशि का निर्धारण नहीं किया जाता है। इससे आधुनिक अग्निशमन यंत्र खरीदने में विभाग को परेशानी का सामना करना पड़ता है। कर्मचारियों की सुरक्षा के लिए भी खर्च का कोई प्रावधान नहीं होता है। सरकार के इस उदासीन रवैए से विभाग के कर्मचारी आहत हैं।

अग्निशमन विभाग के कर्मचारियों ने बीते 20 अगस्त को जंतर-मंतर पर प्रदर्शन किया। नेशनल फायर फेडरेशन ऑफ इंडिया और मुंबई फायर सर्विसेज यूनियन के बैनर तले देश भर के अग्निशमन कर्मचारियों ने सरकार के सामने अपने विभिन्न मांगों को रखा।

मुंबई फायर सर्विसेज यूनियन के अध्यक्ष शरद राव कहते हैं, “कई बार अपना कर्तव्य निभाते हुए कर्मचारियों की जान चली जाती है। कई विकलांग भी हो जाते हैं। ऐसे हादसों से बचने और उनकी सुरक्षा के लिए पूरे देश में कहीं कोई योजना नहीं है।”

हमारी अर्जी केन्द्र सरकार एवं राज्य सरकारों के पास निर्णय के लिए पिछले काफी समय से पड़ी हुई है। यदि अब भी हमारी बात नहीं सुनी गयी तो हम भारत के कोने-कोने में आंदोलन चलाएंगे। और हमारा आंदोलन आग की तरह फैल सकता है।-

देवेन्द्र गौतम. नेशनल फायर फेडरेशन ऑफ इंडिया के राष्ट्रीय महासचिव

राव आगे कहते हैं कि किसी कर्मचारी को कुछ हो जाए तो उसके परिवार को सरकार की तरफ से उचित सहायता भी नहीं मिलती है। प्रधानमंत्री देश की तरक्की की बात करते हैं। वे हमारी तरक्की के लिए कोई प्रावधान क्यों नहीं करते?

नेशनल फायर फायटर्स फेडरेशन उत्तर प्रदेश शाखा के सदस्य विजय नारायण अपनी इक्कीस सूत्रीय मांग पत्र देते हुए कहते हैं कि, उनका प्रतिनिधिमंडल प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी, केंद्रीय गृहमंत्री राजनाथ सिंह और केंद्रीय शहरी विकास मंत्री वेंकैया नायडू को अपना मांग पत्र सौंप चुका है।

इनकी प्रमुख मांगों में कर्मचारियों की समस्याओं के अध्ययन के लिए त्रिपक्षीय समिति बनाना, उन्हें सैन्य प्रशिक्षण देना, अग्नि दुर्घटना में बचाव कार्य करते हुए यदि कर्मचारी की मृत्यु हो जाए तो उसे शहीद का दर्जा दिया जाना, घायल कर्मचारियों के परिवार को तत्काल न्यूनतम 1.50 लाख रुपए की आर्थिक सहायता देना, अग्नि शमन सेवा को अखिल भारतीय सेवा व राज्य सेवा का दर्जा दिया जाना शामिल है।

फेडरेशन ने विभागीय कर्मचारियों को 1 जून, 2006 से लागू छठे वेतन आयोग की सिफारिश के अनुसार वेतन देने की मांग की है। साथ ही आपदा प्रबंधन के लिए राष्ट्रीय स्तर पर प्रशिक्षण संस्थान खोलने की मांग शामिल है। फेडरेशन के राष्ट्रीय महासचिव देवेन्द्र गौतम कहते हैं कि हमारी अर्जी केन्द्र सरकार एवं राज्य सरकारों के पास निर्णय के लिए पिछले काफी समय से पड़ी हुई है। यदि अब भी हमारी बात नहीं सुनी गयी तो हम भारत के कोने-कोने में आंदोलन चलाएंगे। और हमारा आंदोलन आग की तरह फैल सकता है।

जंतर मंतर पर नेशनल हॉकर्स फेडरेशन के बैनर तले सैकड़ों की संख्या में फेरी और रेहड़ी पटरी वाले मजदूर अपने हक के लिए आवाज बुलंद कर रहे थे। उनका कहना है कि कानून बन जाने के बावजूद स्थानीय नगर निकायों द्वारा उनका उत्पीडि़त किए जा रहा है।

हॉकर्स फेडरेशन का कहना है कि उनके लगातार संघर्ष के दबाव में सरकार ने वर्ष 2004 में फेरीवाला नीति बनाई। वर्ष 2009 में इस विधेयक में संशोधन भी किया गया, लेकिन सरकार कारगर तरीके से इस नीति का अनुपालन नहीं करा पाई है। 30-32 सालों की कानूनी लड़ाई के बाद पिछले साल 9 सितंबर को सुप्रीम कोर्ट ने हमारे हक में फैसला सुनाया। सरकार को निर्देश दिया कि वो रेहड़ी पटरी वालों को व्यवसाय करने का कानूनी हक दे।

राष्ट्रीय हॉकर्स एवं फेरीवाला संरक्षण विधेयक इस वर्ष मार्च में पास हुआ और 4 अप्रैल को राष्ट्रपति के हस्ताक्षर के बाद कानून भी बन गया। इस कानून में लाइसेंस जारी करने से पहले शहर व कस्बे में पटरी दुकानदारों के सर्वेक्षण एवं सत्यापन के लिए एक समिति बनाई गई। इस समिति में 50 प्रतिशत सरकार, 40 प्रतिशत फेरीवालों का प्रतिनिधित्व और 10 प्रतिशत गैरसरकारी संगठनों की भागीदारी निश्चित की गई है।

हॉकर्स फेडरेशन की मांग है कि इस समिति से गैरसरकारी संगठनों को बाहर किया जाए। उनका कहना है कि गैरसरकारी संगठन उद्योगपतियों और पूंजीपतियों के पैसे से चलते हैं, जिससे वे कई बार फेरीवालों के पक्ष की जगह उनके विरोध में काम करने लगते हैं। कानून बन जाने के बावजूद अभी तक लाइसेंस जारी करने की प्रक्रिया शुरू नहीं हो पाई है।

फेडरेशन के लखनऊ इकाई के संरक्षक संदीप पाण्डेय कहते हैं कि ये गरीब लोग पूंजी के अभाव में गली-मोहल्लों में फेरी लगाते हैं, लोगों की जरूरत के समान बेचकर अपने परिवार का भरण पोषण करते हैं। लेकिन  आए दिन पुलिस और स्थानीय निकायों के कर्मचारी इनसे नाजायज वसूली करते हैं। साथ ही उन पर जुर्माना भी लगाते हैं।

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