एक मौत का तमाशा

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तारीख 22 अप्रैल। दिन के दस बज रहे थे। धूप भी तीखी हो चली थी। जंतर-मंतर पर लोगों का हुजूम धीरे-धीरे पहुंच रहा था। अच्छी संख्या में आम आदमी पार्टी के कार्यकर्ता मंच के आस-पास सक्रिय थे।

हालांकि, वहां बने विशाल मंच पर कोई जाना-पहचाना चेहरा नहीं था। दोपहर एक बजे तक अमूमन यही स्थिती थी। अंतर इतना भर था कि वहां लोगों की संख्या सुबह की अपेक्षा काफी अधिक हो गई थी। अब पटेल चौक मैट्रो स्टेशन के गेट नंबर-दो तक आने-जाने वालों का हुजूम दिखने लगा था।

वहां बड़ी संख्या में लोग सफेद टोपी पहने दिखलाई दे रहे थे। उन टोपियों को देखकर कोई भी समझ सकता था कि अब सिक्का बदल गया है। वहां एक भी ऐसी टोली नहीं दिखी, जिस पर लिखा हो- ‘हमें चाहिए लोकपाल।’ हां, जो लिखा था, वह था- ‘आम आदमी पार्टी जिंदाबाद।’ यह ‘आपा’ में आए चरित्रगत बदलाव का सूचक था।

खैर, वहां कई लोग हाथों में अरविंद केजरीवाल के पोस्टर लिए नारे लगा रहे थे। मंच से लेकर पीछे तक, कहीं कोई दूसरे नेता की तस्वीर नहीं दिखी। मंच पर बड़े-बड़े अक्षरों में लिखा था- ‘मोदी सरकार के भूमि अधिग्रहण बिल के खिलाफ संसद मार्च।’

तभी लोगों का एक समूह नारा लगाता दिखा- ‘जय जवान, जय किसान।’ वहीं कुछ लोग पूरे इत्मीनान से डिब्बा बंद खान खा रहे थे। शायद वे जानते थे कि इससे आगे के नारे लगाए जा चुके हैं- ‘जय जवान, जय किसान, जय विज्ञान।’ वहां एक महिला से बातचीत हुई तो मालूम हुआ कि उसका पूरा परिवार रैली में आया हुआ है। दिल्ली के ओखला इलाके से आई उस महिला को भूमि अधिग्रहण बिल के बारे में कोई जानकारी नहीं थी।

उस दिन आम आदमी पार्टी की रैली में आए लोग एक-एक कर अपने घर को चले गए। सभी पहुंच भी गए होंगे, लेकिन गजेन्द्र सिंह जीवित अपने घर नहीं पहुंच पाया। आखिर यह कोई साजिश थी या दुर्घटना? यह सवाल अब भी हवा में तैर रहा है।

पूछने पर उसने कहा, ”अभी खाना और रैली के बाद पैसे मिलने वाले हैं।” वह एक डिस्पोजेबल प्लेट में खाना खा रही थी। उसे रैली के अंत तक रहना था। आखिर उसके बाद ही पैसे देने का वादा किया गया था। बातचीत के दौरान उसने अपना नाम शाहीन बताया। शाहीन ऐसी अकेली महिला नहीं थी। वहां डिस्पोजेबल प्लेट में भोजन करते हुए सैकड़ों लोग दिखे। उन सभी को रैली के अंत तक रहना था, इसलिए भोजन करना जरूरी था। इस बात की जानकारी शाहीन ने ही दी।

सुनीता करोल बाग से आईं थीं। वह एक गैर सरकारी संस्था में काम करती हैं। अरविंद केजरीवाल की समर्थक हैं। यहां क्यों आई हैं? पूछने पर कहा, ”महंगाई काफी बढ़ गई है। हमें काफी मुसीबतें झेलनी पड़ रही हैं। वेतन भी समय पर नहीं मिलता है। इसलिए केंद्र सरकार का विरोध करने आई हूं।”

दोपहर 12 बजे तक भीड़ इतनी बढ़ गई थी कि मंच के नजदीक पहुंचना कठिन हो रहा था। जो लोग मंच के नजदीक थे, उनके लिए पीछे आना मुश्किल था। एक घेरे के भीतर भीड़ लगभग अनियंत्रित थी। आम आदमी पार्टी का कोई कार्यकर्ता लोगों को रास्ता दिखलाता या बतलाता नहीं दिखा। वहां पुलिसकर्मियों की संख्या भी अच्छी-खासी थी और बेफिक्र दिख रही थी।

जंतर मंतर पर रैली के साथ-साथ बाजार भी लगा था। खाने-पीने की समाग्रियों के साथ-साथ जूते-मौजे भी बिक रहे थे। हाथ और गले पर पेंटिंग करने वाले कलाकार भी व्यस्त थे, मानो कोई आईपीएल मैच अभी-अभी शुरू होने वाला है। ऐसे लोगों की संख्या भी काफी थी, जो एक सीमा को लांघकर आगे बढ़ने या फिर अपनी तरफ मीडिया का ध्यान खींचने की कोशिश कर रहे थे।

दोपहर के एक बज चुके थे। तापमान काफी बढ़ चुका था, लोग बेचैन होने लगे थे। वहां सुबह से आए लोग और कैमरा पकड़े मीडियाकर्मी नाराजगी व्यक्त करने लगे थे। तभी शोर शराबे के बीच एक व्यक्ति नीम के पेड़ पर चढ़ गया। आश्चर्य की बात यह थी कि वह पेड़ पर काफी ऊंचाई तक पहुंच गया था। तब उसकी गतिविधि वहां मौजूद लोगों के आकर्षण का विषय बन गई थी। उस पेड़ के निकट जो लोग थे वे तालिया बजा रहे थे। नारे लगा रहे थे।

वहीं मंच पर दिल्ली के मुख्यमंत्री अरविंद केजरीवाल अपने सहयोगियों के साथ पहुंचे। कुमार विश्वास चिरपरिचित अंदाज में भाषण दे रहे थे। लेकिन, चर्चा और आकर्षण का केंद्र वह व्यक्ति बना हुआ था। वहां इकट्ठा लोग उसके बारे में अलग-अलग टिप्पणियां कर रहे थे। तालियां लगातार बज रही थीं और नारे लग रहे थे। उसी पेड़ के ठीक नीचे गेस्ट टीचर अपने प्रदर्शन में सुबह से ही व्यस्त थे। हालांकि, कुछ लोग मंच की तरफ इशारा कर उस व्यक्ति की तरफ नेताओं का ध्यान दिलाने की कोशिश कर रहे थे।

यह बात रहस्य बन गई थी कि क्या वह सचमुच आत्महत्या के इरादे से पेड़ पर चढ़ा था? किसी को यह बात समझ में नहीं आ रही थी। वहां सभी एक-दूसरे के मन को पढ़ने की कोशिश कर रहे थे

गौर से देखने पर नजर आया कि वह गले में सफेद फंदा डाले कुछ बोल रहा था। शायद नारे लगा रहा था। वहां उसकी हरकतें देखकर कुछ लोग गंभीर हुए, तो कइयों ने ध्यान ही नहीं दिया। मंच पर बैठे नेतागण भी उस व्यक्ति की गतिविधियों पर नजर रखे हुए थे। मंच से कुमार विश्वास ने गेस्ट टीचरों को संबोधित किया। फिर उस आदमी से नीचे आने और अपनी बात रखने को कहा। साथ ही पुलिस से अपील की कि कृपया इसको नीचे उतारिए।

तब तक पेड़ के नजदीक अपेक्षाकृत भीड़ बढ़ चुकी थी। मंच से नेता और वहां मौजूद पुलिस मूकदर्शक की भूमिका में थी। उसे नीचे उतारने की कोई गंभीर कोशिश होती नहीं दिखी। शोर बढ़ता जा रहा था। वहां लोगों का ध्यान पेड़ पर चढ़े व्यक्ति पर केंद्रित हो गया था।

दोपहर के करीब दो बज रहे होंगे। उस पेड़ के आस-पास अचानक हलचल बढ़ गई। तत्काल कुछ लोग पेड़ पर चढ़ते दिखाई दिए। वह फंदे पर झूल चुका था। अब उसे पेड़ से उतारने की कोशिश हो रही थी। किसी तरह उसे नीचे उतारा गया। यूं कहना ज्यादा ठीक होगा कि ऊपर से गिराया गया। नीचे बड़ी दरी पर उसे थामने की कोशिश हुई।

तब तक जंतर-मंतर का माहौल बदल चुका था। नारे लगने कम हो गए थे। तत्काल उस शख्स को अस्पताल भेजा गया। फिर तरह-तरह की खबरें उड़ने लगीं। कोई कुछ कहता, तो कोई कुछ। सभा थोड़ी देर के लिए रुक गई थी। फिर शुरू हुई तो दिल्ली के मुख्यमंत्री अरविंद केजरीवाल ने लंबा भाषण दिया। हालांकि, लोगों में वह उत्साह नहीं था, जो पहले दिखाई पड़ रहा था। थोड़ी-बहुत गतिविधि जरूर दिखाई दे रही थी, पर अधिकतर लोग अपनी-अपनी जगह पर ही थे। पूरी तरह स्तब्ध।

यह बात रहस्य बन गई थी कि क्या वह सचमुच आत्महत्या के इरादे से पेड़ पर चढ़ा था? किसी को यह बात समझ में नहीं आ रही थी। वहां सभी एक-दूसरे के मन को पढ़ने की कोशिश कर रहे थे। अपने-अपने मोबाइलों पर लोग खबर देखने-पढ़ने को व्याकुल थे। वे इतना जानना चाहते थे कि वह आदमी जीवित है या नहीं? यही एक मात्र सवाल था, जिसे लेकर बेचैनी बढ़ती जा रही थी।

इस बीच अरविंद केजरीवाल ने मंच से कहा, ”मैं और मनीषजी अभी अस्पताल जाएंगे, उस शख्स से मिलने।” इस घटना के बाद अरविंद केजरीवाल ने करीब 15 मिनट का भाषण दिया। रैली समाप्त होने तक गेस्ट टीचरों का प्रदर्शन जारी रहा। जंतर-मंतर से अरविंद केजरीवाल और मनीष सिसोदिया रवाना हुए तो कुछ देर बाद ही खबर आई कि गजेन्द्र सिंह नाम के उस व्यक्ति की मौत हो गई है।

वह राजस्थान के दौसा जिले से आम आदमी पार्टी की रैली में शामिल होने आया था। इस खबर के आते ही वहां कई लोग अपनी ही नजर में गिर चुके थे। वे ग्लानि से भरे थे। आम आदमी पार्टी की रैली में आए लोग एक-एक कर अपने घर को चले गए। पहुंच भी गए होंगे, लेकिन गजेन्द्र सिंह जीवित अपने घर नहीं पहुंच पाया। यह कोई साजिश थी या दुर्घटना? इस पर जितने मुंह उतनी बातें। संसद से लेकर सड़क तक सवाल उठ रहे हैं। जंतर-मंतर पर नीम का पेड़ अब भी खड़ा है। मौन गवाह के रूप में।

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