नायक नहीं, खलनायक

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टीपू जैसे खलनायक की जयंती वही मना सकता है, जो अपना स्वाभिमान और इतिहासबोध खो बैठा हो। ऐसे ही इतिहासकारों की संगत में सिद्धरामैया को टीपू जयंती मनाने की सूझी। वे अपने आपको नास्तिक कहते हैं और नकारात्मक राजनीति में पड़ गए हैं। लेकिन कांग्रेस ने क्यों उनका साथ दिया, यह समझ पाना मुश्किल है। शायद कांग्रेस में भी कोई स्वत्वबोध नहीं बचा है।

कर्नाटक में हाल के उपचुनावों ने कांग्रेस और जनता दल सेक्यूलर के बीच तालमेल की जो तस्वीर बनाई थी, उसे टीपू जयंती के आयोजनों ने तोड़ दिया है। अपने शासनकाल में टीपू जयंती मनाने का निर्णय पूर्व मुख्यमंत्री सिद्धरामैया ने लिया था। उन्होंने इसे सरकारी पैसे से राज्य ही नहीं, जिला और तहसील स्तर पर भी मनाने का आदेश दिया था। उस समय भाजपा और जनता दल सेक्यूलर के नेताओं ने इसका विरोध किया था। अब कर्नाटक में कांग्रेस और जनता दल सेक्यूलर की मिलीजुली सरकार है और जनता दल सेक्यूलर के एचडी कुमारस्वामी उसके मुख्यमंत्री हैं। उनकी अनिच्छा के बावजूद सिद्धरामैया सरकार से टीपू जयंती मनवाने का निर्णय करवा पाए, यह कांग्रेस में उनकी शक्ति का परिचायक है। टीपू जयंती कार्यक्रमों में न मुख्यमंत्री शामिल हुए, न कांग्रेस के उपमुख्यमंत्री।

लेकिन नाम के लिए ही सही, टीपू जयंती मनाई गई। कई जिलों में उस कार्यक्रम का घोर विरोध हुआ और प्रशासन को आयोजन को पुलिस संरक्षण में करवाना पड़ा। लेकिन सिद्धरामैया कांग्रेस के भीतर अपने गुट को कार्यक्रम में लगाए रहे। कुछ वामपंथी इतिहासकारों को छोड़कर कोई टीपू सुल्तान को नायक नहीं मानता। कर्नाटक में कूर्ग और मंगलूर क्षेत्रों में उसे सदा एक अत्याचारी शासक के रूप में ही देखा गया है। मैसूर क्षेत्र में भी न केवल राज परिवार इन कार्यक्रमों के खिलाफ रहा है बल्कि मांड्या के सात सौ अयंगार परिवारों को ठीक नरक चतुर्दशी के दिन जब वहां दीपावली मनाई जाती है, सूली पर चढ़वा दिया था। इसलिए मैसूर क्षेत्र में भी टीपू सुल्तान की छवि अच्छी नहीं रही। इसी तरह केरल के मालाबार इलाके में हैदर अली और टीपू सुल्तान ने जो नृशंसता बरती थी, उसे आज तक भुलाया नहीं गया है। तमिलनाडु के तंजावूर इलाके में भी टीपू सुल्तान कीे एक नृशंस शासक की ही छवि है।

इस सबके बावजूद कांग्रेस टीपू जयंती मनाने के कार्यक्रम आयोजित करती रही है, इससे पता चलता है कि वह किस तरह की नकारात्मक राजनीति करती है। वामपंथी इतिहासकारों का एक वर्ग अपने आपको सेक्यूलर सिद्ध करने के लिए मुस्लिम काल के शासकों को महिमामंडित करता रहा है। इसी वर्ग ने टीपू सुल्तान को खलनायक की जगह नायक सिद्ध करने की कोशिश की है। इसमें इरफान हबीब की अग्रणी भूमिका रही है। इतिहासकारों के इस वर्ग का कहना है कि टीपू सुल्तान पहला राष्ट्रवादी राजा था, जिसने ब्रिटिश चुनौती को पहचान कर देश के अन्य राजाओं को आगाह किया था और ब्रिटिश चुनौती का मिलकर सामना करने का आग्रह किया था।

 टीपू सुल्तान एक कट्टरपंथी इस्लामी शासक था। उसने हिन्दुओं पर तो बर्बर अत्याचार किए ही, मंगलूर के इसाईयों को भी उसकी बर्बरता का सामना करना पड़ा। मैसूर क्षेत्र में भी उसने खूब अत्याचार किया। केरल के मालाबार इलाके में हैदर अली और टीपू सुल्तान ने जो नृशंसता की थी, उसे भुलाया नहीं गया है। तमिलनाडु के तंजावूर में टीपू कीे नृशंस शासक की ही छवि है। 

इन इतिहासकारों ने उसे एक प्रगतिशील शासक सिद्ध करने के लिए उसके प्रशासनिक सुधारों और सामरिक प्रयोगों का भी काफी बखान किया है। वास्तव में टीपू सुल्तान एक कट्टरपंथी इस्लामी शासक था और उसने हिन्दुओं पर तो बर्बर अत्याचार किए ही, मंगलूर के इसाईयों को भी उसकी बर्बरता का काफी सामना करना पड़ा। टीपू सुल्तान ब्रिटिश ईस्ट इंडिया कंपनी का विरोधी अवश्य था, लेकिन इसके लिए उसके व्यक्तिगत और स्थानीय कारण थे। आरंभ में टीपू सुल्तान के पिता हैदर अली ने ब्रिटिश ईस्ट इंडिया कंपनी का सहयोग लेने की कोशिश की थी। लेकिन हैदर अली को अंग्रेजों ने काफी धोखे में रखा। उस समय दक्षिण भारत में ब्रिटिश ईस्ट इंडिया कंपनी और फ्रांसीसियों के बीच गहरी प्रतिस्पर्धा थी। हैदर अली ने ब्रिटिश ईस्ट इंडिया कंपनी से निराश होकर फ्रांसीसियों का हाथ पकड़ लिया। उसकी फौज का प्रशिक्षण फ्रांसीसियों ने किया था। धीरे-धीरे ब्रिटिश ईस्ट इंडिया कंपनी और हैदर अली के हित आपस में टकराते गए और उनके बीच प्रतिस्पर्धा शुरू हो गई। टीपू सुल्तान के राज्यारोहण तक वह काफी बढ़ चुकी थी।

इस तरह यह राष्ट्रवाद का मामला नहीं है, ब्रिटिश ईस्ट इंडिया कंपनी की जगह फ्रांसीसियों को महत्व देने का मामला है। टीपू सुल्तान का पिता हैदर अली मैसूर वोडेयार राजा कृष्णराज वोडेयार द्वितीय की सेना में एक कनिष्ठ पद पर था। असल में दक्षिण में जब विजयनगर साम्राज्य की अवनति हुई तो मैसूर एक स्वतंत्र राज्य के रूप में उभर आया था। इस राज्य के बाद के शासक चामराजा वोडेयार की कोई संतान नहीं थी। इसलिए उन्होंने कृष्णराज को गोद लिया था। जब उसे राजगद्दी मिली तो वह एक अक्षम राजा सिद्ध हुआ। जल्दी ही वास्तविक सत्ता देवराज और नन्जराज नाम के दो भाइयों के हाथ में चली गई। देवराज मैसूर राज का सेनापति था और नन्जराज सर्वाधिकारी। देवराज वृद्ध हो गया था इसलिए राजपाट नन्जराज के हाथ में आ गया था। हैदरअली उसी की नौकरी में था।

उस समय की प्रमुख शक्ति मराठा थे। मराठाओं ने पुराना कर वसूल करने के लिए 1758 में मैसूर राज्य पर आक्रमण कर दिया था। नन्जराज में मराठों का सामना करने की शक्ति नहीं थी। हैदर अली बहुत महत्वाकांक्षी था और उसने मराठों से बात करने का जिम्मा ले लिया। हैदरअली ने मराठों को कुछ बकाया देकर उनसे समझौता कर लिया। फिर धोखे से नन्जराज की सत्ता हथिया ली। हैदरअली ने सबसे पहले ब्रिटिश ईस्ट इंडिया कंपनी से सहयोग लेने की कोशिश की। अंग्रेजों से परस्पर रक्षा की उसने दो संधियां कीं। लेकिन अंग्रेज उसे धोखे में ही रख रहे थे। उसी से चिढ़कर हैदरअली ने फ्रांसीसियों का हाथ थाम लिया। हैदरअली ने ही अपने पुत्र और उत्तराधिकारी टीपू सुल्तान में ब्रिटिश ईस्ट कंपनी के बारे में अविश्वास पैदा किया था और शत्रुता की भावना भरी थी। हैदर अली एक चालाक व्यक्ति था,

 

 अपने आपको सुल्तान घोषित करके टीपू ने सबसे पहले अपने राज्य का इस्लामीकरण किया। राज्य का कैलेंडर इस्लामी हो गया। शहरों के नाम बदले गए। नाप-जोख के मानक तक बदल गए। राजकाज और न्याय प्रणाली में फारसी प्रभाव आ गया। 1789 में मालाबार पर आक्रमण के समय उसने पिता से भी अधिक नृशंसता दिखाई। कालीकट को खंडहर बना दिया गया। पूरे शहर में उसने जो नरसंहार मचाया, उसकी तुलना तैमूर और नादिरशाह की नृशंसता के वृतांतों से ही की जा सकती है।
उसने धोखे से सत्ता हथियाई थी, जनता उसका विरोध न करे, इसलिए उसने वोडेयार राजाओं के नाम पर ही आखिर तक शासन किया। उस समय की सबसे बड़ी शक्ति तो मराठा ही थे, लेकिन 1761 में पानीपत की लड़ाई में हुई उनकी अप्रत्याशित हार ने कुछ समय के लिए उन्हें पस्त कर दिया था। इसी काल में हैदर अली को अपनी शक्ति बढ़ाने का मौका मिल गया। पेशवा माधवराव के कुशल नेतृत्व में मराठे पानीपत की हार से उबर आए थे और हैदर अली को फिर मराठा आक्रमण झेलने पड़े थे। इससे हैदर अली का वित्तीय संकट बढ़ गया था। वह अत्यंत महत्वाकांक्षी और नृशंस व्यक्ति था। अपना वित्तीय संकट दूर करने के लिए उसने आस-पास के इलाकों में आक्रमण करना शुरू किया था। इसी क्रम में वह आसपास के किलों को जीतता केरल में मालाबार तक पहुंच गया था।
 वामपंथी इतिहासकारों का एक वर्ग अपने आपको सेक्यूलर सिद्ध करने के लिए मुस्लिम काल के शासकों को महिमामंडित करता रहा है। इसी वर्ग ने टीपू सुल्तान को खलनायक की जगह नायक सिद्ध करने की कोशिश की है। इसमें इरफान हबीब की अग्रणी भूमिका रही है। इन इतिहासकारों ने उसे एक प्रगतिशील शासक सिद्ध करने के लिए उसके प्रशासनिक सुधारों और सामरिक प्रयोगों का भी काफी बखान किया है।
रास्ते में कूर्ग में उसने अकथनीय अत्याचार किए। पर मालाबार में तो उसकी नृशंसता पराकाष्ठा तक पहुंच गई थी। उसने वहां के सभी हिन्दू मंदिरों को नष्ट कर दिया। मालाबार के सभी शहरों में व्यापक नरसंहार किया गया। उसने इस क्षेत्र के शासक नायर और पुजारी नंबूदिरियों की पूरी जाति को नष्ट करने का संकल्प लिया था। कई जगह उसने स्त्रियों और बच्चों तक को हाथियों के पैरों तले रौंदवा दिया था। उसकी बर्बरता से त्रस्त होकर नंबूदिरी और नायर त्रावणकोर राज्य में शरण लेने पहुंच गए थे या जंगलों में छिप गए थे। हैदर अली ने उनके हथियार रखने पर पाबंदी लगा दी। जंगल से उन्हें झूठा आश्वासन देकर बुलावाया। फिर उन्हें तलवार की नोक पर इस्लाम कबूल करने के लिए विवश किया। हैदर अली का पूरा शासनकाल धूर्तता और नृशंसता से भरा हुआ ही था।
हैदर अली का शासन 1761 से 1782 तक रहा। 1782 में उसकी कैंसर से मृत्यु हो गई और टीपू सुल्तान गद्दी पर बैठा। हैदर अली अनपढ़ था, लेकिन अपने बेटे टीपू सुल्तान को उसने फ्रांसीसियों के यहां अच्छी से अच्छी शिक्षा दिलवाई थी। टीपू सुल्तान का शासन 1782 से 1799 तक रहा। हैदर अली की तरह टीपू सुल्तान बोडेयार राजाओं के नाम पर शासन करने के लिए तैयार नहीं था। उसने अपने आपको स्वतंत्र राजा घोषित कर दिया। दोनों पिता-पुत्र ने 1761 से 1799 तक कोई चार दशक राज्य किया। हैदर अली के समय राज्य का विस्तार हुआ। लेकिन टीपू सुल्तान ने तो पिता से मिला राज्य गंवाया ही। उसके अपने समय में उसके आस-पास के राजाओं में उसकी गिनती एक बड़े जमींदार से अधिक नहीं थी। लेकिन टीपू सुल्तान के राज्यारोहण तक मराठा विभाजित हो गए थे।
पेशवा माधवराव की 1772 में मृत्यु हो चुकी थी। कहा जाता है कि अगर माधवराव कुछ और समय जीवित रहे होते तो हैदर अली का विनाश तय था। पर टीपू सुल्तान के समय रघुनाथ राव और नाना फणनवीस के आपसी संघर्ष के कारण मराठा कमजोर हो गए थे। इसलिए 1784-85 में टीपू सुल्तान को निजाम और मराठाओं की एक संयुक्त सेना को पराजित करने का मौका मिल गया। उसी से उसकी धाक एक स्वतंत्र राजा के रूप में बनी। अपने आपको सुल्तान घोषित करके टीपू ने सबसे पहले अपने राज्य का इस्लामीकरण किया। राज्य का कैलेंडर इस्लामी हो गया। शहरों के नाम बदले गए। नाप-जोख के मानक तक बदल गए। राजकाज और न्याय प्रणाली में फारसी प्रभाव आ गया। अपने आपको एक कट्टर इस्लामी शासक सिद्ध करने के लिए टीपू सुल्तान ने सभी तरीके इस्तेमाल किए।
दूसरे क्षेत्रों पर आक्रमण करते हुए उसने पिता हैदरअली से भी अधिक नृशंसता दिखाई। उसने 1785 में कूर्ग पर आक्रमण किया और उसे तहस-नहस करते हुए नागरिकों पर घोर अत्याचार किए। 1789 में मालाबार पर आक्रमण के समय उसने पिता से भी अधिक नृशंसता दिखाई। कालीकट को खंडहर बना दिया गया। पूरे शहर में उसने जो नरसंहार मचाया, उसकी तैमूर और नादिरशाह की नृशंसता के वृतांतों से ही की जा सकती है। उसकी असहिष्णुता और नृशंसता का एक लोमहर्षक उदाहरण अयंगार ब्राह्मण परिवारों की हत्या है। 1790 में उसे यह बताया गया कि 1760 में बोडेयार रानी को अंग्रेजों से मिलवाने में अयंगार ब्राह्मणों की भूमिका रही थी।
उस समय मेलकोट में 700 अयंगार परिवार थे। उसने उन सभी को सूली पर चढ़ाने के आदेश दे दिए। टीपू सुल्तान ने मंगलूर के कैथलिक इसाइयों के साथ भी काफी नृशंसता बरती। टीपू सुल्तान की जिस तलवार का इतिहासकारों न बहुत बखान किया है, उसे खुद वह काफिरों के लिए मौत बताता था। वह तलवार 1799 में टीपू की पराजय के बाद अंग्रेजों के हाथ लगी। 2003 में लंदन में उसकी नीलामी हो रही थी, जहां से विजय माल्या उसे डेढ़ करोड़ में खरीद कर भारत ले आया। किसी ने  यह नहीं कहा कि यह तलवार टीपू के शौर्य की नहीं, उसकी धर्मांधता की निशानी है। उसने जहां भी आक्रमण किया, स्थानीय नागरिकों के सामने यही विकल्प रखा कि वे इस्लाम कबूल कर लें या मौत के घाट उतारे जाने के लिए तैयार रहे। कूर्ग पर आक्रमण के समय उसने इस्लाम स्वीकार न करने पर 12 हजार हिन्दुओं को कैद करके श्रीरंगपटनम की जेल में डाल दिया था। इसी तरह उसने तंजावूर के किसानों को रौंद डाला। तंजावुर तमिलनाडु के संपन्न इलाके में गिना जाता था। टीपू के आक्रमण के बाद उसे फिर से अपनी पुरानी स्थिति में आने में 90 वर्ष लग गए। भारतीय राजा जब किसी राज्य पर आक्रमण करते थे तो वे आम नागरिकों को नहीं छेड़ते थे।
उनका और उनकी फसलों का कोई नुकसान नहीं किया जाता था। लेकिन इस्लाम के नाम पर जो राज्य कायम हुए, उन्होंने इस मर्यादा को छोड़ दी। अन्य मुस्लिम शासकों की तरह टीपू सुल्तान ने भी जिस राज्य पर चढ़ाई की, उसके नागरिकों और फसला को तबाह कर दिया ताकि वह राज्य फिर उसके मुकाबले खड़ा न हो पाए। अपने पिता की तरह टीपू सुल्तान ने सभी मर्यादाओं को तोड़ा और अपना भय पैदा करने के लिए एक से बढ़कर एक अत्याचार किए। टीपू ने मराठों और अंग्रेजों से जितने युद्ध किए, उसमें उसे जय कम मिली और पराजय अधिक। 1782 में अपने पिता की मृत्यु के बाद उसे अंग्रेजों से दूसरे एंग्लो-मैसूर युद्ध में उलझना पड़ा था। 1784 में उसने मंगलूर संधि की। तब तक अंग्रेज दक्षिण में उतनी बड़ी शक्ति नहीं थे। 1789 में तीसरे एंग्लो मैसूर युद्ध में तो उसे पहले विजित अनेक इलाके अंग्रेजों के सुपुर्द करने पड़े थे। उसके हाथ से निकले इलाकों में मालाबार और मंगलूर शामिल थे।
मराठों के साथ युद्ध में भी टीपू को काफी अपमानजनक स्थितियों का सामना करना पड़ा था। मराठों के साथ हुई गजेंद्रगढ़ संधि के परिणामस्वरूप उसे 48 लाख रुपये युद्ध के हर्जाने के तौर पर मराठों को देने पड़े थे और उसने हैदर अली द्वारा जीते मराठों के इलाके वापस करने के साथ-साथ उन्हें 12 लाख रुपये सालाना देना मंजूर किया था। 1792 में ब्रिटिश ईस्ट इंडिया कंपनी के साथ उसे जो अपमानजनक संधि करनी पड़ी थी और अपना लगभग आधा राज्य अंग्रेजों को सौंपना पड़ा था, उसके बाद ही उसके व्यवहार में परिवर्तन आया। इसी दौर में उसने अंग्रेजों के विरुद्ध एकजुट होने के लिए अन्य राजाओं से आग्रह भी किया और शृंगेरी आचार्य को चिट्ठी भी लिखी। दूसरी तरफ वह बाहरी शक्तियों के पास दूत भेजकर अपनी मदद की याचना भी कर रहा था। उसने फ्रांस में नेपोलियन से आग्रह किया कि वह अंग्रेजों के खिलाफ उसकी मदद करें। नेपोलियन ने मिस्र पर यह सोचकर हमला किया था कि वहां से उसे भारत पर चढ़ाई करने का आधार मिल जाएगा। लेकिन मिस्र में उसकी फौजें फंस गई और नेपोलियन उन्हें संकट में छोड़कर फ्रांस लौट गया। टीपू ने उस्मानी साम्राज्य को भी दूत भेजे और ईरान के शाह को भी।
वह जहां भी मदद की याचना कर सकता था उसने की। लेकिन उसे कहीं सफलता नहीं मिली। अंत में चौथे एंग्लो मैसूर युद्ध में वह श्रीरंगपटनम के अपने किले की रक्षा करता हुआ मारा गया। जिन लोगों ने भी उसके कूर्ग, मालाबार, मंगलूर और तंजावूर में किए गए अत्याचारों के वृतांत पढ़े हैं, वे कभी सपने में भी उसकी जयंती मनाने की बात नहीं सोच सकते। लेकिन मार्क्सवादी इतिहासकारों के लिए कभी जनता महत्वपूर्ण नहीं रही। उन्हें कुछ मुस्लिम शासकों का गौरव गान करना था और इसके लिए उन्हें टीपू दिखाई दे गया। टीपू में कहीं से काई नायकत्व नहीं है। उसने पिता से मिला अधिकांश राज्य गंवा दिया था। वह एक ही बात में अपने पिता से बढ़कर था। वह धूर्तता, नृशंसता और बर्बरता में हैदर अली से भी एक कदम आगे निकल गया था। जिन लोगों ने उसके कालीकट में दिखाई गई नृशंसता के वर्णन पढ़े हैं, वे उससे नफरत किए बिना नहीं रह सकते हैं। उसने स्त्रियों और बच्चों को अपने हाथी के पैरों तले रौंद डाला। लोगों को नंगा करके हाथी के पैरों में बांध दिया गया था। पूरा शहर तहस-नहस कर दिया गया था।
निरपराध नागरिकों पर ऐसी लोमहर्षक बर्बरता के वृतांत कम ही सुनने को मिलते हैं। जो लोग अपने वामपंथी पूर्वाग्रहों में अंधे हो गए हैं, उन्हें ही यह वृतांत विचलित नहीं करते। एक ऐसे खलनायक की जयंती वही मना सकता है, जो अपना स्वाभिमान और इतिहासबोध खो बैठा हो। ऐसे ही इतिहासकारों की संगत में सिद्धरामैया को टीपू जयंती मनाने की सूझी। वे अपने आपको नास्तिक कहते हैं और नकारात्मक राजनीति में पड़ गए हैं। लेकिन कांग्रेस ने क्यों उनका साथ दिया, यह समझ पाना मुश्किल है। शायद कांग्रेस में भी कोई स्वत्वबोध नहीं बचा है।

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