संविधान दिवस सार्थक कैसे बने?

0
24

अभी तो सिर्फ शुरुआत ही हुई है। बहुत पहले ही यह हो जाना चाहिए था। आश्चर्य तो इस बात पर है कि किसी प्रधानमंत्री को पहले क्यों नहीं यह सूझा।

डॉ. भीम राव आम्बेडकर स्मारक का शिलान्यास करते हुए प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने जो घोषणा की, उससे संवैधानिक चेतना की लहर उठ सकेगी। उन्होंने ठीक ही घोषणा की कि हर साल 26 नवंबर को संविधान दिवस मनाया जाएगा।

इससे दो बात तुरंत पूरी होती है। पहली कि देश-समाज याद रख सकेगा कि 26 नवंबर, 1949 का दिन हमारे लिए हर तरह से स्मरणीय है। उसी दिन संविधान स्वीकार किया गया। देश को अर्पित किया गया। यह कितने लोगों को मालूम है? अगर कोई सर्वेक्षण हो तो पता चलेगा कि शायद ही इसे आम नागरिक अपनी याद में संजोए हुए है। अपवाद स्वरूप कुछ वकील हो सकते हैं, जिन्हें यह याद हो। यह साधारण चूक नहीं है। इसे ही प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी दूर करना नहीं चाहते, बल्कि वे संविधान को जानने का रास्ता खोल रहे हैं।

प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने मुंबई में बीते 11 अक्टूबर को घोषणा की थी। इसका असर दूरगामी होगा। मानव संसाधन मंत्री स्मृति इरानी ने बिना विलंब किए इस घोषणा पर शैक्षिक संस्थानों को निर्देश दिलवाया। इससे बीते 26 नवंबर को सारे देश में हर स्तर के शैक्षिक संस्थानों में ‘संविधान दिवस’ की शुरुआत हो गई। यह बहुत जरूरी था। संविधान के प्रति अज्ञान बहुत अधिक है।

संविधान के बारे में सुनना अलग बात है और संविधान को जानना उससे बिल्कुल भिन्न बात है।

 

पिछले कुछ सालों से संविधान पर अनेक तरह की चर्चा होती रही है। इंदिरा गांधी के कार्यकाल में संविधान पर सबसे अधिक चर्चा कांग्रेस के नेताओं ने की। एक बार तो इमरजेंसी के दौरान संविधान को बदलने के लिए इंदिरा गांधी ने कमेटी बना दी थी। उसी की सिफारिश पर संविधान में 42वां संशोधन आया, जिसे जनता शासन में आंशिक रूप से बदला गया।

संविधान को जानने से पहले उसके क,ख,ग, को समझना जरूरी है, जो इतना भी नहीं जानते वे ही संविधान के निरक्षर माने जाएंगे। जिनकी संख्या अपार है।

पिछले कुछ सालों से संविधान पर अनेक तरह की चर्चा होती रही है। इंदिरा गांधी के कार्यकाल में संविधान पर सबसे अधिक चर्चा कांग्रेस के नेताओं ने की। एक बार तो इमरजेंसी के दौरान संविधान को बदलने के लिए इंदिरा गांधी ने कमेटी बना दी थी। उसी की सिफारिश पर संविधान में 42वां संशोधन आया। जिसे जनता शासन में आंशिक रूप से बदला गया।

समय-समय पर संविधान के बारे में चर्चा होती रही है। उसके कारण तात्कालिक रहे हैं। जब कभी सुप्रीम कोर्ट संविधान की व्याख्या करता है तो वह चर्चा तेज हो जाती है। उसी तरह सरकार जब किसी संवैधानिक पहलू को कानून में बदलती है तो उस समय भी एक चर्चा छिड़ जाती है।

प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी ने संविधान समीक्षा आयोग बनाया था, तब भी एक बहस छिड़ी थी। इस तरह संविधान, चर्चा में समय-समय पर रहता आया है। लेकिन यह नहीं कह सकते कि इन चर्चाओं से संविधान के बारे में निरक्षरता उससे दूर हो जाती है।

इसका सबसे बड़ा कारण संविधान के प्रति जागरूकता का अभाव है। अगर थोड़ी छानबीन करें तो पाएंगे कि कांग्रेस ने संविधान के बारे में एक अंधविश्वास पैदा किया। वह बना हुआ है। वह यह है कि संविधान को जानो मत। संविधान को सिर्फ मानो। इसमें से ही एक अंधविश्वास पैदा हुआ है। संविधान को जाने बगैर एक धारणा बना दी गई है कि वह एक पवित्र ग्रंथ है। जिसकी पूजा हो सकती है। जिसे पढ़ना और जानना जरूरी नहीं है। संविधान दिवस से नई शुरुआत हुई है। वह संविधान को जानने की चेतना में बदल सकती है।

संविधान को जानने के कई अर्थ हैं। एक यह कि उसकी खास-खास बातें लोग जान सकें। छात्रों को संविधान की बातें मालूम हो। इतना ही काफी नहीं है कि यह बताया जाए कि संविधान कब बनकर तैयार हुआ। यह भी जरूरी है कि संविधान निर्माताओं के बारे में भी पूरी जानकारी दी जाए। इसकी शुरुआत संविधान सभा के गठन और प्रक्रिया से होती है। संविधान जो बना वह 1950 में लागू हुआ। उसमें समय-समय पर संशोधन हुए।

संविधान को जानने के लिए पहला कदम उठा लिया गया है। उसे सार्थक बनाने की जरूरत है। वह कैसे हो? जो संविधान है, उससे काम चल रहा है। डॉ. भीम राव आम्बेडकर ने भी एक बार कहा था कि ‘यह संविधान काम चलाने की दृष्टि से उपयुक्त और लचीला है।’ उनका यह कथन समय की कसौटी पर खरा उतरा है।

छात्रों को यह भी मालूम होना चाहिए कि संविधान की आत्मा कहां है? उन्हें बताया जाना चाहिए कि वह प्रस्तावना में है। यह भी बताया जाना चाहिए कि इंदिरा गांधी के समय में वह प्रस्तावना भी बदल दी गई। उसमें कुछ शब्द जोड़ दिए गए। छात्र पूछेंगे कि क्या उसकी जरूरत थी?

संविधान को पाठ्यक्रम का हिस्सा क्यों बनाया जाना चाहिए? यह सवाल अब अधिक महत्वपूर्ण हो गया है। इसलिए संविधान का शिक्षण आवश्यक है, क्योंकि संविधान ही है जिससे शासन चलता है और समाज का जीवन उससे संचालित होता है।

संविधान वह संहिता है जो अपने देश और समाज को चलाने के लिए रची गई है। संविधान की शिक्षा से बहुत बड़ा अज्ञान दूर हो सकेगा। यह जाना जा सकेगा कि भारत का संविधान दुनिया के तमाम देशों (अमेरिका, ब्रिटेन, फ्रांस, जापान, जर्मनी और कनाडा) के संविधानों के विभिन्न अंशों से बना है। यह भी जाना जा सकेगा कि अंग्रेजों ने अपने साम्राज्य को दीर्घकालिक अवधि तक चलाने के लिए जिस अधिनियम 1935 को बनाया था, उसका बहुत बड़ा हिस्सा इस संविधान में उतार लिया गया है। यह भी जाना जा सकेगा कि संविधान तब जल्दी में बनाया गया। भारत विभाजन की वे परिस्थितियां थी।

आज जब वैचारिक बहस अनेक रूपों में छिड़ गई है, वैसे समय में संविधान को जानने से विचारों की स्पष्टता बढ़ेगी। असहिष्णुता क्या होती है? इसे समझा जा सकेगा। सेकुलरिज्म को समझने में मदद मिल सकती है। संविधान किसी नागरिक में भेद नहीं करता। इसलिए संविधान से मिले अधिकार जैसे, न्याय, समानता, भाईचारा और मौलिक अधिकार आदि के बारे में जागरूकता बढ़ेगी।

बहस छिड़ने पर यह भी याद किया जाएगा कि राष्ट्रपिता गांधी की संविधान के बारे में क्या समझ थी। गोलमेज सम्मेलन में जब वे लंदन जा रहे थे, तब उन्होंने कहा था कि ‘मैं एक ऐसे संविधान की आकांक्षा रखता हूं जो हिन्दुस्तान को सारे बंधनों से मुक्त कर दे।’ इसे भी इस संविधान में खोजा जाएगा।

संविधान को जानने के लिए पहला कदम उठा लिया गया है। उसे सार्थक बनाने की जरूरत है। वह कैसे हो? जो संविधान है, उससे काम चल रहा है। डॉ. भीम राव आम्बेडकर ने भी एक बार कहा था कि ‘यह संविधान काम चलाने की दृष्टि से उपयुक्त और लचीला है।’ उनका यह कथन समय की कसौटी पर खरा उतरा है।

पर इतना ही काफी नहीं है। इससे आगे जाने की जरूरत है। इसलिए संविधान दिवस को सार्थक बनाने के लिए मंथन आवश्यक है। शिक्षण संस्थानों में छात्रों को क्या पढ़ाया जाए और क्या बताया जाए? उससे पहले यह सुनिश्चित होना चाहिए कि शिक्षक संविधान को जाने और उसे हर तरह से जाने। अगर शिक्षक ही संविधान को पूरी तरह नहीं जानते तो वे पढ़ाएंगे क्या? इस बारे में स्पष्टता बहुत जरूरी है।

LEAVE A REPLY

Please enter your comment!
Please enter your name here