खेल बनाया जीवन को

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अशोक सिंहल हिन्दुत्व के अब पुरोधा मान लिए गए हैं। पहले योद्धा माने जाते थे। अपनी उम्र के नब्बेवें पड़ाव के लिए जिस दिन उन्होंने एक कदम बढ़ाया, उसी दिन उन्हें समाज से यह सम्मान मिला।

बीते एक अक्टूबर की बात है। उस दिन दिल्ली के सिविक सेंटर में उत्सव का वातावरण था। देश-विदेश से काफी लोग आए। श्रोताओं में विश्व हिन्दू परिषद के कार्यकर्ताओं के अलावा केंद्र सरकार के कई मंत्री और भाजपा के अनेक सांसद भी उपस्थित थे। राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के सरकार्यवाह भैय्या जी जोशी और सहसरकार्यवाह डॉ. कृष्णगोपाल आदि भी थे।

मंच के केंद्र में स्वामी सत्यमित्रानंद, अशोक सिंहल, मोहन भागवत और राजनाथ सिंह बैठे थे। मंच पर ही दोनों तरफ प्रमुख साध्वी और संत बड़ी संख्या में बैठे हुए थे। इस अवसर को सार्थक बनाने के लिए मोहन भागवत विशेष रूप से उपस्थित रहे।

सब कुछ ठीक-ठाक ही चल रहा था। जैसा कि विश्व हिन्दू परिषद के सभा समारोह में हमेशा होता है। फर्क इतना ही था कि इस समारोह में धर्म, समाज और राजनीति का संगम सा हो गया था। अशोक सिंहल के दीर्घायु की कामना की गई। संत महात्माओं ने उपस्थित होकर आशीर्वाद दिए।

विश्व हिन्दू परिषद के कार्यकर्ता और पदाधिकारी धन्य भाव से ओतप्रोत थे। उनके व्यवहार में आतिथ्य की विनम्रता थी। वे अवसर की गरिमा को अपने अनुरूप आचरण से व्यक्त कर रहे थे। समारोह में भव्यता और सादगी का पूरा समन्वय था।

स्वामी सत्यमित्रानंद बोले। संस्मरण सुनाए। एक बात बताई। वह इसकी सूचना थी कि वे अशोक सिंहल के परिवार से बहुत लंबे समय से परिचित हैं। उन्होंने ही उनकी माता को मनाया और समझाया कि वे अशोक सिंहल को अपनी राह चलने दें। विवाह और गृहस्थ जीवन अपनाने का पुत्रवत्सल मोह त्याग दें। मां भी मान गई। उनके बाद राजनाथ सिंह बोले। उन्होंने अशोक सिंहल को जैसा देखा और समझा उसका बहुत प्रेरणास्पद वर्णन किया।

योद्धा जब ईश्वरीय चेतना से भरपूर हो जाता है, तब वह पुरोधा कहलाता है। इस रूप में वह एक प्रेरक होता है। असल में ऐसे व्यक्ति का जीवन लीला बन जाता है। सब कुछ खेल सरीखा। जैसा अशोक सिंहल का हो गया है।

फिर बारी आई उत्सव पुरुष की। जिन लोगों ने अशोक सिंहल को चालीस-पचास सालों से देखा और समझा है, वे थोड़ा चकित थे। अपनी उपस्थिति से सभा को उत्साहित और प्रेरित करने वाले अशोक सिंहल इस अवसर पर अपनी अंतर्यात्रा में खोए हुए लग रहे थे। वैसा होना उनके लिए सहज और स्वाभाविक रहा होगा। पर देखने वालों के लिए यह नई बात थी। थोड़ी अटपटी थी। जब वे बोले तो यह प्रकट भी हुआ।

एक मिनट के लिए वहां सन्नाटा छा गया। जो उनके मन में घुमड़ रहा था, वह वाणी में उतर आया। वे बोल पड़े कि यह ठीक नहीं हो रहा है। अर्थ स्पष्ट था। वे इस उत्सव को व्यक्ति पूजा मान रहे थे। यह उनका एक सामयिक संकोच था। जिसे यह कहकर स्पष्ट किया कि हिन्दुत्व के जागरण के लिए जो कुछ मैंने किया है, उसमें हजारों-लाखों कार्यकर्ताओं का खून पसीना लगा है।

इतना ही कहकर वे रुके नहीं। दूसरे दीर्घकालिक संकोच को भी संयत शब्दों में रखा। याद दिलाया कि वे संघ के प्रचारक हैं। इस पर आश्चर्य व्यक्त किया कि यह समारोह क्यों मनाया जा रहा है! यानी यह आयोजन संघ परंपरा में नहीं ठहरता। फिर अपनी उपस्थिति और स्वीकृति को इसलिए उचित ठहराया, क्योंकि सरसंघचालक की इसे अनुमति प्राप्त हो गई थी।

अगर कोई दूसरी संस्था होती और मोहन भागवत सरसंघचालक न होते तो यह एक बड़ा और तीखा विवाद का रूप ले लेता। मोहन भागवत ने यह तो साफ कर दिया कि उनसे कोई अनुमति नहीं ली गई। वे इसलिए आए क्योंकि इस उत्सव के लिए अशोक सिंहल ने सहमति दे दी थी। यही उन्हें बताया गया। इस तथ्य को उन्होंने तूल नहीं दिया। जो कहा वह सबके लिए समझने जैसा था। इस उत्सव की उन्होंने सार्थकता समझाई। ऐसे अवसर अनुकरण के लिए होते हैं, उत्सवधर्मिता के लिए नहीं। व्यक्ति पूजा के लिए तो कदापि नहीं।

अशोक सिंहल ने जब कहा कि वे प्रचारक हैं तो अर्थ उससे यही निकलता है कि यह उत्सव संघ की परंपरा से मेल नहीं खाता। मोहन भागवत ने संघ की परंपरा को भी समझाया और कहा कि वे इसलिए यहां आए कि बता सकें कि अशोक सिंहल का जीवन अपवाद स्वरूप है। इसलिए आयोजन को परंपरा विरूद्ध नहीं मान सकते।

मोहन भागवत आधुनिक हैं। अनुभवी हैं। उनमें चाणक्य की चतुराई है। वे अवसर को सही भांप लेने वाले शिखर पुरुष हैं। इसी साल उन्होंने अपने बयान से दो बड़े विवाद छेड़ दिए। पहला था- मदर टेरेसा के बारे में तो दूसरा था- आरक्षण संबंधी। पर इस अवसर को उन्होंने समाधान का समारोह बना दिया।

अशोक सिंहल को जो जानते हैं, वे उनकी ईश्वर के संबंध में अवधारणा से परिचित हैं। ईश्वर की धारणा का मौलिक आधार यह है कि प्रकृति में एक प्रयोजन है। उसका एक लक्ष्य है। जिसके लिए अस्तित्व आतुर रहता है। कार्य-कारण से उसका संबंध होता है। इसे अशोक सिंहल ने वहां अलग तरीके से रखा। अपने व्यक्तित्व के गठन का श्रेय दो व्यक्तियों को दिया। अपने गुरुदेव और गुरुजी गोलवलकर को।

अशोक सिंहल ने जब कहा कि वे प्रचारक हैं तो अर्थ उससे यही निकलता है कि यह उत्सव संघ की परंपरा से मेल नहीं खाता। मोहन भागवत ने संघ की परंपरा को भी समझाया और कहा कि वे इसलिए यहां आए कि बता सकें कि अशोक सिंहल का जीवन अपवाद स्वरूप है।

लोगों से अपील की कि वे उस पुस्तिका को पढ़ें, जो उन्होंने लिखी है। पुस्तिका है- ‘मेरे गुरुदेव।’ साठ पेज की यह पुस्तिका खजाना है, सूचना, रहस्य और चमत्कार का।

अशोक सिंहल के बारे में संभवत: इसे पढ़ने और अपने अनुभवों से मोहन भागवत बोले। जो सहज और प्रभावी था। उनकी एक बात विशेष रूप से ध्यान देने लायक है। वह यह कि गुरु प्रारब्ध से मिलता है। अशोक सिंहल को दो गुरु मिले। पहले गुरु गोलवलकर के पास वे खुद पहुंचे तो दूसरे गुरु रामचंद्र तिवारी ने उन्हें खोजा।

पहले गुरु ने समाज और राष्ट्र का बोध कराया तो दूसरे ने अध्यात्म की राह दिखाई। उस पर चलाया। 1950 में अशोक सिंहल ने राष्ट्रसेवा का व्रत लिया। 12 साल बाद अचानक उन्हें दिल का दौरा पड़ा। इसे कितने लोग जानते हैं? शरीर की इस आकस्मिक घटना से उस शाश्वत प्रश्न के सम्मुख खुद को खड़े पाया कि क्यों यह शरीर और जीवन मिला था? यह प्रश्न परंपरागत वैराग्य को जन्म देता है। अशोक सिंहल भी उसी विकल्प पर सोचने लगे।

वह दौर उनके लिए आंतरिक भीषण द्वंद्व का था। तब उन्हें दूसरे गुरु ने जो उपदेश दिया, वही उनकी जीवन गीता बन गई। उसी समय वे दीक्षित भी हुए। फिर शुरू हुई ऐसी जीवन यात्रा जिससे आध्यात्मिक राष्ट्रीयता की उन्हें भरपूर ऊर्जा मिली। फिर मुड़ कर कभी सोचने का क्षण नहीं आया।

समाज जीवन में एक योद्धा बनकर अशोक सिंहल उतरे थे। उस मोड़ से वे रूपातंरित होने लगे। योद्धा जब ईश्वरीय चेतना से भरपूर हो जाता है तब वह पुरोधा कहलाता है। इस रूप में वह एक प्रेरक होता है। असल में ऐसे व्यक्ति का जीवन लीला बन जाता है। सब कुछ खेल सरीखा। जैसा अशोक सिंहल का हो गया है।

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