खतरे में विश्वविद्यालयों की आजादी

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रामजस विवाद पर अखबारों में काफी कुछ लिखा गया है। मेरा आशय उनमें छपे लेखों से है, समाचारों से नहीं। यह सिलसिला अभी चलेगा। इन लेखों का स्वर निंदा से भरा हुआ है। उनमें चिंता कम है, आरोप अधिक हैं।

निंदा की जा रही है अखिल भारतीय विद्यार्थी परिषद की। आरोप लगाए जा रहे हैं कि विद्यार्थी परिषद ने मानों बोलने की आजादी छीन ली है। जो आरोप लगा रहे हैं, वे नहीं जानते, और अगर जानते हैं तो जान-बूझकर इसकी अनदेखी कर रहे हैं कि अखिल भारतीय विद्यार्थी परिषद वही है जिसने इंदिरा गांधी की तानाशाही के सन्नाटे को अपनी बुलंद आवाज से तोड़ा था। आरोप लगाना आसान है। कौन पूछता है और कौन चिंता करता है कि उस आरोप में सच्चाई कितनी है!

जब से केंद्र में नरेन्द्र मोदी प्रधानमंत्री बने हैं, तब से ही एक लाइन चलाई जा रही है कि बोलने की आजादी खतरे में है। असहिष्णुता बढ़ रही है। यह असल में नागपाश है। जिसमें पूरे देश को बांधने की हर बार कोशिश हो रही है। इसे अखिल भारतीय विद्यार्थी परिषद से ज्यादा दूसरा कोई नहीं समझता।

आजादी के आंदोलन की एक विरासत छात्र राजनीति में चली आ रही है। उसे 1921 से प्रारंभ हुआ मान सकते हैं, जब महात्मा गांधी ने छात्रों-अध्यापकों से अपील की थी कि ‘पढ़ना-पढ़ाना छोड़ो और आजादी के लिए संघर्ष करो।’ उनकी अपील ने अमिट छाप छोड़ी। एक नई लहर पैदा हुई। छात्र-अध्यापक संग्राम में कूदे। उससे ही एक राजनीतिक धारा निकली। उसे अपनी विरासत भी कह सकते हैं। वह संघर्ष के कुरुक्षेत्र में ब्रह्मास्त्र बना।

लड़ाई क्या है? क्या है असली मुद्दा? इसकी सतही जांच भी करें तो साफ हो जाता है कि बोलने की आजादी खतरे में नहीं है। खतरे में है विश्वविद्यालयों की आजादी। उसमें ही पहले जवाहर लाल नेहरू विश्वविद्यालय, फिर हैदराबाद और इस तरह दूसरे विश्वविद्यालयों की आजादी पर एक तरफा हमले किए गए।

लेकिन क्या हर छोटे-मोटे अवसर पर कोई ब्रह्मास्त्र चलाता है। ऐसा करना मूर्खता ही होगी। जिस तरह संघर्ष की एक धारा उस अपील से निकली उसी तरह एक धारणा भी निकली। वह यह कि देश की जनभावना विश्वविद्यालयों के परिसरों से प्रकट हाती है। इसे बार-बार और इतनी बार राजनीतिक नेताओं ने आजमाया है कि वह अस्त्र अपनी ऊर्जा खो बैठा है। इसे कई उदाहरणों से बताया जा सकता है।

लोकनायक जयप्रकाश नारायण ने महात्मा गांधी की शैली में एक अपील की। बिहार आंदोलन के एक चरण में उन्होंने कक्षाओं के बहिष्कार का आह्वान किया। अखिल भारतीय विद्यार्थी परिषद उस आंदोलन का अगुआ था। उसने जेपी से असहमति जताई। नारा दिया- ‘पढ़ाई के साथ लड़ाई।’ कुछ दिनों तक जरूर विवाद रहा। पर अंतत: जेपी ने भी विद्यार्थी परिषद की सूझ-बूझ, व्यवहारिकता और प्रामाणिकता को माना। अपनी लाइन बदली।

दूसरी बार 1988 में विश्वनाथ प्रताप सिंह ने जब राष्ट्रीय स्तर पर भ्रष्टाचार के खिलाफ अभियान चलाया तो उसमें अखिल भारतीय विद्यार्थी परिषद ने बढ़-चढ़कर हिस्सा लिया।

इन दोनों उदाहरणों से अखिल भारतीय विद्यार्थी परिषद की मुद्दे आधारित संघर्ष का इतिहास सामने आता है। कोई ऐसा उदाहरण नहीं मिलता जिसमें वह बोलने की आजादी के खिलाफ खड़ा हो। फिर ऐसी क्या बात हो गई कि अखिल भारतीय विद्यार्थी परिषद को बार-बार इसी आरोप में लांछित करने की कोशिश हो रही है। क्या इसलिए कि वह किसी राजनीतिक दल की छात्र शाखा नहीं है? यह भी एक कारण है।

जिस तरह दूसरे छात्र संगठन हैं, वैसा अखिल भारतीय विद्यार्थी परिषद नहीं है। अपने-अपने छात्र संगठनों के आंदोलन में राजनीतिक नेता कूद पड़ते हैं। जैसा रामजस विवाद में भी हुआ है। पहले उनके हरावल दस्ते ने वातावरण बनाया। उसके बाद सीताराम येचुरी सहित सब वहां पहुंचे। दूसरी तरफ अखिल भारतीय विद्यार्थी परिषद अपनी लड़ाई मात्र छात्रों के बल पर लड़ रहा है। यह फर्क हमारी राजनीति के रूप को भी प्रकट करता है।
लड़ाई क्या है? क्या है असली मुद्दा? इसकी सतही जांच भी करें तो साफ हो जाता है कि बोलने की आजादी खतरे में नहीं है। खतरे में है विश्वविद्यालयों की आजादी। उसमें ही पहले जवाहर लाल नेहरू विश्वविद्यालय, फिर हैदराबाद और इस तरह दूसरे विश्वविद्यालयों की आजादी पर एक तरफा हमले किए गए। उसे बचाने और बचाए रखने की लड़ाई लड़ रही है अखिल भारतीय विद्यार्थी परिषद।

यह वर्चस्व की लड़ाई है। एक तरफ वे लोग हैं जो विश्वविद्यालयों को महाभारत का कुरूक्षेत्र बनाने पर तुले हुए हैं, तो दूसरी तरफ अखिल भारतीय विद्यार्थी परिषद है जो उसे धर्मक्षेत्र बनाना चाहती है।

लेकिन इससे भी बड़ी बाधा है विद्यार्थी परिषद की अपनी बनाई हुई छवि। उसे 2014 के बाद उसने खुद बनाई है। उसी की वह कैद में है। उसे हिम्मत, सूझ-बूझ और वक्त के मुताबिक उससे बाहर आना होगा। यह काम बहुत कठिन है। आसान तो बिल्कुल नहीं है। उसे भी आसान तरीके से जीने और बरतने की आदत-सी लग गई है। उस आदत को तोड़ना क्या आसान होगा?

रामजस विवाद में उसकी प्रारंभिक भूमिका नहीं है। उससे जो गलती हुई है वह दूसरी है। जिसे उसको स्वीकार करना चाहिए। लेकिन गलती क्या हुई है, यह जानना पहले जरूरी है।

अखिल भारतीय विद्यार्थी परिषद को भांप लेना चाहिए था कि कुटिल अध्यापकों का जाल क्या है। जिन लोगों के दुराग्रह पर रामजस के प्राचार्य ने अनिच्छापूर्वक गोष्ठी की अनुमति दी, वह दिखने में भोली-भाली कोशिश भले लगे पर वास्तव में वह एक कुटिल चाल थी। उस समूह को उकसाने की वह चाल थी जो उमर खालिद जैसे से तुरत भड़क जाते हैं।

यह तथ्य है कि भड़क कर विरोध पर जो उतरे वे अखिल भारतीय विद्यार्थी परिषद के कार्यकर्ता नहीं थे। वे ईमानदारी से मानते थे कि उमर खालिद को नहीं बुलाना चाहिए। वह गोष्ठी नहीं हुई। उमर खालिद नहीं बोल पाए। पर परिणाम देखिए। बिना बोले कितना बड़ा बवाल खड़ा कर दिया।

इस चाल के जो मास्टर माइंड थे, वे अब अखिल भारतीय विद्यार्थी परिषद को बेतुके उदाहरणों से उपदेश दे रहे हैं। उन्हें पहले अपने गिरेबां में झांकना चाहिए। अखिल भारतीय विद्यार्थी परिषद को भी इस भूल से सीखने की जरूरत है। नहीं तो छिड़ी लंबी लड़ाई में वह अपने समर्थकों को खोती जाएगी।

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