इमरजेंसी का एक सच यह भी

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जो सुनते आ रहे थे, वह सच ही निकला। जो कहानी का मुख्य पात्र था, वही अब हमें अपनी कहानी लिखकर बता रहा है। लिखा सीधे है। सटीक शब्दों में वर्णन किया है। पर पूरा नहीं।

पूरी बात अगर लिखी होती तो इतिहास का बहुत बड़ा धमाका हो जाता। क्या किसी खुफिया जीव के लिए पूरी बात लिखना संभव है? खासकर ऐसे व्यक्ति के लिए जो एहसान के बोझ तले दबा रहा हो।

एक बाधा तो स्वभाव की भी है। जो राज बनाए रखने के लिए ढाले गए हों, वे राज बताएंगे कैसे? सब कोई एमके. धर तो नहीं हो सकता। यह कोई बुझौअल नहीं है। यह टीवी. राजेश्वर की वह हकीकत है जो ‘इंडिया, दी क्रुसियल इयर्स’ में सामने आई है। खासकर इमरजेंसी और जनता शासन के दौरान उनकी भूमिका हमेशा सवालों के घेरे में रही है। इसलिए उनके संस्मरण पर छपी पुस्तक का महत्व है।

टीवी. राजेश्वर शासनतंत्र का वह नाम है जो इंदिरा गांधी को उनके दुर्दिन से उबारने के लिए जाना जाता है। कहा तो यहां तक जाता है कि टीवी. राजेश्वर ने ही जनता पार्टी की मोरारजी सरकार की कमजोर कड़ियों को इंदिरा गांधी के हाथों सौंपा। अपने ‘भेदिए’ के जरिए गृह मंत्री चौधरी चरण सिंह के हर निर्णय की सूचना उन्हें दी। फिर क्या था, इंदिरा गांधी को तिनके का नहीं, बाढ़ से भरी नदी में एक वृक्ष का सहारा मिल गया। डूबने से वे बच सकीं।

जनता पार्टी की सरकार आने के बाद इंदिरा गांधी बेतरह डरी हुई थीं। पूर्व सूचनाओं से उनका डर धीरे-धीरे जाता रहा। जब संभली तो जनता पार्टी को तोड़ने में भी कामयाब हो गई। फिर जो हुआ, वह एक इतिहास है। अगर टीवी. राजेश्वर ने मदद न की होती तो भारतीय राजनीति का नक्शा कुछ और होता।

यह सब कैसे हुआ? इसे जानने के लिए पुस्तक में जो लिखे शब्द हैं वे संकेत मात्र हैं। जो वे नहीं लिख पाए हैं, उसे पढ़ सकने वाला ही पूरा राज जान सकेगा। फिर भी इस पुस्तक में कुछ बातें नई हैं। खुफिया विभाग के बड़े अफसर वे बातें भी पहले ही जान लेते हैं, जिनकी सूचना प्रधानमंत्री, मंत्री और शासन तंत्र के महत्वपूर्ण अफसरों को बाद में मिलती है।

उन्होंने अगर पूरी बात लिखी होती तो इतिहास का बहुत बड़ा धमाका हो जाता। लेकिन जो राज बनाए रखने के लिए ढाले गए हों, वे राज बताएंगे कैसे? सब कोई एम.के. धर तो नहीं हो सकता। यह कोई बुझौअल नहीं है। यह टी.वी. राजेश्वर की वह हकीकत है जो ‘इंडिया, दी क्रुसियल इयर्स’ में सामने आई है।

टीवी. राजेश्वर तो खुफिया ब्यूरो (आई.बी) के निदेशक रहे हैं। वे अगर खुलासा करना चाहते तो कई राज खोल सकते थे। कुछ खोले भी हैं। जैसे, इंदिरा गांधी के सचिवालय ने कोशिश की थी कि जज जगमोहन लाल सिन्हा का चुनाव याचिका पर आने वाला फैसला पहले ही जान लिया जाए। पर खुफिया ब्यूरो को सफलता नहीं मिली।

पुस्तक में एक योग्य अफसर जेएन. राय का उल्लेख आया है। वे इलाहाबाद में तैनात थे। उनका कहना है कि टीवी. राजेश्वर ने अधूरी बात लिखी है। वे इससे ज्यादा कुछ नहीं कहते, क्योंकि वे मानते हैं कि एक खुफिया अधिकारी को अपनी मर्यादा तोड़नी नहीं चाहिए। संकेत ऐसे हैं कि जगमोहन लाल सिन्हा को कांग्रेस के ही एक बड़े नेता ने उस फैसले के लिए फुसलाया था। वे हेमवती नंदन बहुगुणा हो सकते हैं।

टीवी. राजेश्वर ने बड़े सहज ढंग से बताया है कि इमरजेंसी घोषित होने के बाद ही खुफिया ब्यूरो को भी जानकारी मिली। वे उन दिनों निदेशक के बाद सबसे बड़े अधिकारी थे। राजनीतिक मामलों के प्रभारी थे। इस नाते कायदे से उन्हें तो पहले ही जानकारी होनी चाहिए थी।

वे कबूल करते हैं कि किसी भी रूप में उनसे राजनीतिक परिस्थितियों के बारे में रिपोर्ट नहीं मांगी गई। सरकार क्या कदम उठाए, इसके बारे में सलाह का फिर सवाल ही कहां था! अपनी बात की पुष्टि के लिए टीवी. राजेश्वर ने आत्मा जयराम और बीडी. पांडे की शाह आयोग में गवाही को आधार बनाया है। आत्मा जयराम खुफिया ब्यूरो के निदेशक थे। बीडी. पांडे कबीना सचिव थे। जाहिर है कि इमरजेंसी लगाने का फैसला शासन तंत्र का नहीं, राजनीतिक था। जो प्रधानमंत्री निवास में लिया गया।

प्रधानमंत्री निवास में तय होता था कि किसे गिरफ्तार करना है। उसका आदेश फोन से अफसरों को दिया जाता था। ऐसा सिर्फ दिल्ली में ही नहीं हुआ, बल्कि प्रधानमंत्री निवास में बनी सूची ही राज्य के मुख्यमंत्रियों को भेजी गई। इसके लिए जहाज का उपयोग किया गया। कांग्रेसी मुख्यमंत्रियों को सूची जाकर किसी ने सौंपी। यह सब संजय गांधी की देख-रेख में हुआ।

 

विडंबना देखिए कि जॉर्ज फर्नांडीस को गिरफ्तार करने वाला उस समय पुलिस मेडल पाता है। जब लोकतंत्र बहाल हो गया था, तब प्रधानमंत्री मोरारजी देसाई ने उन्हें वह सम्मान दिया।

 

 

 

टीवी. राजेश्वर ने भी इस सर्वज्ञात तथ्य की पुष्टि की है कि संजय गांधी संविधानेत्तर सत्ता बन गए थे। इसका मतलब समझें। जनता ने इंदिरा गांधी को सरकार चलाने के लिए चुना था। इंदिरा गांधी ने इमरजेंसी में देश चलाया, संजय गांधी के इशारे से। उदाहरण के तौर पर दिल्ली के उपराज्यपाल किशन चंद का उल्लेख किया है। जो संजय गांधी के निर्देश पर चलते थे। दिल्ली में जितनी ज्यादतियां हुईं, उसे जब किशन चंद ने महसूस किया तो वे आत्मग्लानि में ऐसे डूबे कि आत्महत्या कर ली।

ऐसा नहीं था कि इंदिरा गांधी को उन ज्यादतियों की जानकारी न हो। टीवी. राजेश्वर ने लिखा है कि उन्हें खुफिया ब्यूरो हर बात बताता था। इमरजेंसी में खुफिया ब्यूरो की भूमिका क्या थी? इसे उन्होंने अत्यंत संक्षेप में बताया है। जो बताया है, वह बहुत काम का है। जैसे यह कि इंदिरा गांधी ने अगर खुफिया ब्यूरो की सलाह मानी होती तो मार्च 1976 में ही लोकसभा का चुनाव हो जाता। तब कांग्रेस का वैसा सफाया नहीं होता जैसा सालभर बाद हुआ। पर इंदिरा गांधी ने वही किया जो संजय गांधी चाहते थे।

उन दिनों विपक्ष को तोड़ने के जो खेल हुए उसके बारे में भी उन्होंने कुछ बातें बताई हैं। लेकिन यह सब करते हुए टीवी. राजेश्वर ने अपना खेल भी किया है। क्यों न करें? आखिर उन पर इंदिरा गांधी के भारी उपकार जो हैं! उनके उपकार को इंदिरा गांधी ने भी ब्याज सहित लौटाया। वे पहले पुलिस अधिकारी रहे, जिन्हें उपराज्यपाल और कई राज्यों में राज्यपाल बनाया गया।

टीवी. राजेश्वर को राष्ट्रपति का पुलिस मेडल मिला। इसलिए कि उन्होंने जॉर्ज फर्नांडीस को आखिरकार खोज ही लिया। हुआ यह कि एक कांग्रेसी विधायक गुजरात से आया। ओम मेहता से मिला। उन दिनों प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी के बाद जिसकी तूती बोलती थी, वे ओम मेहता ही थे। वे थे तो सिर्फ गृह मंत्रालय में राज्य मंत्री, परंतु वे वस्तुत: गृहमंत्री हो गए थे। उस विधायक ने जो सुराग दिए उससे जॉर्ज फर्नांडीस पकड़े गए।

इस तथ्य से भी एक नई बात सामने आती है। वह यह कि इमरजेंसी के दिनों में कांग्रेस के विधायक, सांसद और कुछ प्रमुख नेता पुलिस के भेदिए की भूमिका निभा रहे थे। हर तानाशाही में ऐसा होता ही है। विडंबना देखिए कि जॉर्ज फर्नांडीस को गिरफ्तार करने वाला उस समय पुलिस मेडल पाता है। जब लोकतंत्र बहाल हो गया था, तब प्रधानमंत्री मोरारजी देसाई ने उन्हें वह सम्मान दिया। यह घटना है 16 मई, 1978 की।

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