पंथनिरपेक्षता के उद्भव के कारण

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हमारे संविधान के निर्माण के बाद से ही राजनेता इस बात की घोषणा करते रहे हैं कि हमारा राज्य ‘धर्मनिरपेक्ष’ है। यहां पंथनिरपेक्षता के उद्भव के कारणों को बताने की कोशिश की गई है।

संविधान के निर्माण के बाद से ही राजनेता इस बात की घोषणा करते रहे हैं कि हमारा राज्य ‘धर्मनिरपेक्ष’ है। यह अंग्रेजी के सेक्युलर शब्द के समानार्थी रूप में प्रयुक्त किया गया था। जिन विद्वानों को ‘धर्म’ शब्द की अर्थव्याप्ति का ज्ञान था, उन्होंने उस समय कहा था कि ‘धर्मनिरपेक्ष’ प्रयोग गलत है। महादेवी वर्मा ने बहुत कम शब्दों में यह भाव प्रकट करते हुए कहा था, “हम अपने धर्म के प्रति निरपेक्ष कैसे हो सकते हैं।” ‘रिलीजन का पर्याय मत, पंथ या संप्रदाय है। धर्म नहीं। धर्म का उपासना पद्धति से कोई संबंध नहीं है। एक प्रचलित श्लोक है- ‘‘धृति क्षमादमोस्तेयं शौचमिन्द्रियनिग्रहः। धीर्विद्या सत्यमक्रोधो दशकं धर्मलक्षणं।।’’ यही धर्म की परिभाषा है। इसमें पूजा पद्धति कहीं नहीं है। जो दस बातें गिनाई गई हैं, उन सबका संबंध मनुष्य के आचरण से है।

भारत की परंपरा रही है कि सम्राट अपनी प्रजा को अपनी इच्छा और विवेक के अनुसार ईश्वर की उपासना करने की स्वतंत्रता देता था। जो ईश्वर के या वेदों के अस्तित्व या प्रधानता को स्वीकार नहीं करते थे, उन्हें अपनी मान्यता के अनुरूप आचरण करने और अपने दृष्टिकोण तथा विचार का प्रचार करने की पूर्ण स्वतंत्रता थी। हिंदू ग्रंथों में और दैनिक वार्तालाप में एक शब्द प्रयुक्त होता है- इष्टदेवता। इष्ट का अर्थ है अपनी रुचि का। तुलसी कहते हैं- ‘‘तुलसी सरनाम गुलाम है राम को, जाको रूचौं सो कहै सोई कोई।’’

तुलसी के इष्ट राम हैं। वे अन्य स्वरूपों का अपमान नहीं करते, परंतु सर्वत्र अपने आराध्य को ही देखते हैं। इसलिए वृंदावन आकर भगवान श्रीकृष्ण की प्रशंसा करते हुए कहते हैं- ‘‘तुलसी मस्तक तब नवै धनुष बाण लेहु हाथ।’’ रुचि के भिन्न होने से ही नाना पंथ हैं। रुचीनां वैचिर्त्यात् ऋजु कुटिल नाना पथ जुषां। कोई पंथ हेय नहीं है। घृणास्पद नहीं है। अपने आराध्य के निकट जाने के लिए असंख्य मार्ग हैं, कोई एक पंथ नहीं। सभी नदियां अंत में समुद्र में पहुंचती हैं।

रोम के सम्राट कांस्टेंटाइन ने जब ईसाई धर्म स्वीकार कर लिया तब शासन ने यह प्रयास प्रारंभ किया कि सभी लोग ईसा का मार्ग अपनाएं। जो नहीं मानते थे, उन पर अनेक तरह के अत्याचार किए गए। यंत्रणाएं दी गईं। स्पेन में ‘इंक्विजीशन’ हुआ। प्रत्येक व्यक्ति की राज्य परीक्षा करता था कि वह ईसाई है या नहीं। यदि वह परीक्षण में सफल नहीं होता था तो उसे मार दिया जाता था। ईसाई ध्ार्म नगरों में तो फैल गया, किंतु यूरोप के ग्रामों में लोग पुराने पंथ के अनुयायी बने रहे। विशेषकर महिलाएं पुराने पर्व और रीति रिवाज मनाती थी। उन गांव वालों को विलेन (विलेज से उद्भूत) और महिलाओं को जादूगरनी (विच) की संज्ञा दी गई। ऐसी महिलाओं को राजाज्ञा से लकड़ी के खंभे से बांधकर जला दिया जाता था। जॉन ऑफ आर्क को 1431 में इसी प्रकार जलाया गया था। समस्त यूरोप में पोप को ईश्वर का प्रतिनिधि माना जाता था। पोप का अर्थ है पिता। विवाह, उत्तराधिकार आदि के नियम राज्य नहीं पोप बनाता था। पोप ही यह तय करता था कि शिक्षा कैसी हो और कौन सी पुस्तकें पढ़ाई जाएं। लगभग 1500 वर्षों तक बाईबल का अनुवाद अंग्रेजी में करने की अनुमति नहीं थी। जिन्होंने प्रयत्न किया उन्हें मृत्युदंड दिया गया। एक अनुवादक की मृत्यु के कुछ वर्ष बाद उसकी अस्थियों को निकालकर जलाया गया, ताकि उसे नरकवास मिले।

जब पोप और रोमन कैथोलिक चर्च के विरोध में एक नया संप्रदाय बना तो उसे प्रोटेस्टेंट (विरोधी) कहा गया। रोमन कैथोलिक की एक शाखा आर्थोडाक्स चर्च बन गई, जिसका मुख्यालय कुस्तुनतुनिय (कांस्टेटिनोपल) में था। रूस में इस चर्च के अनुयायी अधिक थे। यूरोप के राज्य में जब एक पंथ को मानने वाला राजा हो जाता था तो वह अन्य पंथों को नष्ट करने का प्रयास करता था। यूरोप में 13वीं शताब्दी से प्रारंभ होकर लाखों नर नारी इस धर्मभेद के शिकार हुए।

समूचे उत्तरी, दक्षिणी और मध्य अमेरिका में स्थानीय इंका, मय, अजटेक आदि संस्कृतियों को बलपूर्वक नष्ट कर दिया गया। स्थानीय लोगों की हत्या कर दी गई या उन्हें ईसाई बनाया गया। यह संख्या करोड़ों में है। ऑस्ट्रेलिया को जोड़ लें तो तीन महाद्वीपों से स्थानीय धर्म और संस्कृति को नष्ट कर दिया गया।

इंग्लैंड से अमेरिका चार जहाजों में जो लोग गए थे, वे ‘प्रेसबिटेरियन’ थे। इंग्लैंड का राजा एंग्लिकन मत का था। यही नहीं, वह एंग्लिकन चर्च का सर्वोपरि प्रधान था। आज भी महारानी ऐलिजाबेथ ही एंग्लिकन चर्च की प्रधान है। इंग्लैंड में शासन के अत्याचारों से बचने के लिए वे लोग जिन्हें अमेरिका में ‘पिल्ग्रिम फादर्स’ (तीर्थयात्री पितृगण) नाम दिया गया, अमेरिका गए थे। इंग्लैंड में सुधार 1534 में प्रारंभ हुआ। पोप से संबंध विच्छेद करके सम्राट हेनरी अष्टम ने एंग्लिकन चर्च की स्थापना की। सम्राट चर्च का सर्वेसर्वा हो गया। उसके पश्चात उसकी पुत्री क्वीन मेरी ने एंग्लिकन चर्च को नष्ट करने के लिए अनेक कदम उठाए। आर्चबिशप क्रेनर और बिशप रिडली तथा लेटिमर को जिंदा जला दिया गया। ऐलिजाबेथ (1558-1601) ने पुनः एंग्लिकन चर्च को प्रतिष्ठित किया।

सुधार प्रक्रिया के बाद कैथोलिकों के लंदन में प्रवेश को प्रतिबंधित कर दिया गया। वे अपने घर से 10 मील की दूरी से अधिक नहीं जा सकते थे। 10 पाउंड कीमत से अधिक के घोड़े नहीं रख सकते थे। ऑक्सफोर्ड और कैंब्रिज विश्वविद्यालय चर्च के अधीन थे। 1854 तक केवल एंग्लिकन चर्च के अनुयायियों को ही प्रवेश मिलता था। 1875 तक शिक्षक होने के लिए एंग्लिकन चर्च का अनुयायी होना अनिवार्य था।

जब इस प्रकार लाखों लोगों ने प्राण गंवा दिए, तब यूरोप में सन् 1648 में वेस्टफेलिया की संधि में यह तय हुआ कि शासक अपने राज्य में अन्य मतावलंबियों पर मत परिवर्तन के लिए दबाव नहीं डालेगा। इसे सेक्युलरिज्म नाम दिया गया। इसका लक्ष्य था राजा और चर्च (धार्मिक सत्ता) को अलग-अलग रखना। पहले तो पूरा यूरोप ही पावन रोम साम्राज्य था। ईसा को पैगंबर, बाईबिल को धर्म की पुस्तक और पोप को ईश्वर का प्रत्यक्ष प्रतिनिधि मानना अनिवार्य था। अब वैसा नहीं रहा। दूसरे पंथों को सहन किया जाने लगा। उनका आदर नहीं। इसलिए कहा गया कि अन्य पंथों के प्रति सहिष्णुता होनी चाहिए। यह हिंदुओं के ‘सर्वधर्म समभाव’ से बहुत पीछे है। हिंदू यह मानते हैं कि जैसी हमारी उपासना पद्धति है वैसी ही सबकी है। विश्व में यह अपवाद स्वरूप है।

इस्लाम का प्रारंभ ही अन्य धर्मों के पूजा स्थलों के ध्वंस से हुआ। मक्का में 360 मूर्तियां थीं, जिन्हें भिन्न-भिन्न जनजातियां पूजती थीं। एक पवित्र मास में सभी जनजातियां अपने-अपने देवता की पूजा के लिए मक्का आती थीं। इससे मक्कावासियों को प्रतिवर्ष बड़ी राशि प्राप्त होती थी। मुहम्मद साहब के स्वर्गारोहण के बाद सन् 632 में अबूबक्र खलीफा बने। उनकी मृत्यु के पश्चात 634 में उमर खलीफा हुए, किंतु सन् 644 में उनकी हत्या कर दी गई। तीसरे खलीफा उस्मान 644 से 656 तक रहे। उनकी भी हत्या हुई। उनके पश्चात मुहम्मद साहब के दामाद और चचेरे भाई अली ने गद्दी संभाली, किंतु वे भी 661 में मार दिए गए।

इमाम अली के जो पक्षधर थे, उनका यह मानना था कि उन्हें ही पैगंबर के बाद खलीफा बनाया जाना था। प्रारंभ के तीन खलीफा अनुचित ढंग से गद्दी पर बैठ गए। इमाम अली के पश्चात उनके दो पुत्र हसन और हुसैन की भी हत्या कर दी गई। यह दुखद घटना करबला में हुई। उनकी स्मृति में मोहर्रम का मातम मनाया जाता है। जो इमाम अली को वैध उत्तराधिकारी मानते थे, उनको शिया कहा गया। दूसरे लोग अहल-ए-सुन्नत या सुन्नी कहलाए। गत 1400 वर्षों से शिया और सुन्नी संप्रदायों में वैमनस्य है। यही सद्दाम हुसैन (सुन्नी) और ईरान (शिया) के बीच दस वर्षीय युद्ध का कारण था। आज ईरान में (जहां शिया बहुमत में हैं) विद्रोही सुन्नी लोगों ने सीरिया की सहायता से एक बड़े भू-भाग पर कब्जा कर लिया है। पाकिस्तान में कराची, बलूचिस्तान और पेशावर के आसपास के क्षेत्र में शियाओं की हत्या की घटनाएं नित्य ही समाचार पत्रों में छपती है। इस्लाम में ये दो संप्रदाय ही नहीं हैं। कुल 73 संप्रदाय हैं। पाकिस्तान ने अपने मुख्य न्यायमूर्ति मुनीर अली की अध्यक्षता में एक आयोग बनाया, जिसे यह कार्य सौंपा गया कि वह बताए कि मुस्लिम कौन है? न्यायमूर्ति मुनीर अली ने पाया कि हर संप्रदाय अपने को छोड़ अन्य किसी को मुसलमान नहीं मानता है। अहमदियों को तो पाकिस्तान में कुरान घर में रखने और मस्जिद में प्रवेश करने की अनुमति नहीं है। पाकिस्तान के पहले विदेश मंत्री और सुप्रीम कोर्ट के न्यायाधीश जफरुल्ला खान अहमदिया थे। उन्हें पाकिस्तान छोड़कर इंग्लैंड में रहना पड़ा।

ईसाई और इस्लाम मत में अपने ईश्वर और अपने मार्ग की श्रेष्ठता मानना अनिवार्य है। अन्य ईश्वर मिथ्या हैं और अन्य मार्ग हेय है। अपने धर्म में परिवर्तन कराना धार्मिक कृत्य है। चाहे लालच देकर हो या मृत्यु का भय देकर। 18वीं और 19वीं शताब्दी में धीरे-धीरे ईसाई राज्यों ने यह स्वीकार कर लिया कि राज्यों को धर्म के मामलों में हस्तक्षेप नहीं करना चाहिए और नागरिकों को अपनी इच्छानुसार कोई भी मत स्वीकार करने की स्वतंत्रता होनी चाहिए। फिर भी हम देखते हैं कि 20वीं शताब्दी में जर्मनी, पोलेंड, आस्ट्रिया, रूस आदि में यहूदियों का सामूहिक विनाश हुआ, जिसमें 60 लाख यहूदी मारे गए।

इसके परिप्रेक्ष्य में हिंदू धर्म को देखा जाना चाहिए। भारत के गत 5-7 हजार वर्षों के इतिहास में कभी बलपूर्वक धर्म परिवर्तन नहीं कराया गया। कोई धार्मिक स्थल नष्ट नहीं किए गए। सभी मतों को अपनी इच्छानुसार आचरण करने की स्वतंत्रता दी गई। धर्म के नाम पर कोई रक्तपात नहीं हुआ।

बौद्ध और हिंदू धर्म का प्रसार तिब्बत, चीन, कोरिया, जापान, मंगोलिया, इंडोनेशया आदि में हुआ। किंतु कहीं भी रक्तपात नहीं हुआ। साथ ही पारसी, यहूदी, सीरियन ईसाई और अरब (मोपला) लोगों को भारत में शरण और आश्रय दिया गया।

अमेरिका में प्रारंभ में जो राज्य बने, वे भी विशेष ईसाई संप्रदायों के थे। कहीं मारमोन थे, कहीं प्रेसन्विटेरियन थे। कहीं कैथोलिक आदि। जब 1776 में स्वतंत्र अमेरिका की घोषणा करने के लिए वे एकत्र हुए तो उन्होंने एक बुद्धिमत्तापूर्ण और दूरदर्शी निर्णय किया। उन्होंने यह कहा कि मतभिन्नता के आधार पर संघर्ष की स्थिति न आने पाए, इसलिए आवश्यक है कि राज्य सेक्युलर (पंथनिरपेक्ष) रहे। इस प्रकार लिखित संविधान के साथ प्रथम पंथनिरपेक्ष राज्य, संयुक्त राज्य अमेरिका का प्रादुर्भाव हुआ।

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