सही समय पर नरेन्द्र मोदी की दस्तक

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प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी हाल ही में यूरोप के चार देशों की छह दिवसीय यात्रा कर वापस लौटे हैं। प्रधानमंत्री की यह यात्रा उस समय हुई जब अमेरिका अपनी अन्तरराष्ट्रीय जिम्मेदारियों से हाथ खींच रहा है।

इसके चलते यूरोप के नेता खिन्न भाव लिए अन्तरराष्ट्रीय सहयोग के विकल्पों पर विचार कर रहे हैं। नरेन्द्र मोदी जानते थे कि इस बदलते अन्तरराष्ट्रीय परिदृश्य में अभी भारत की सीमित भूमिका ही हो सकती है। भारत एक बड़ा देश है, पुरानी सभ्यता है, लेकिन वह अभी इतनी बड़ी आर्थिक शक्ति नहीं है कि अन्तरराष्ट्रीय स्तर पर कोई हस्तक्षेप कर सके।

उसने एक बड़ी आर्थिक शक्ति होने की ओर कदम अवश्य बढ़ा दिये हैं। पर उसका रास्ता वह नहीं है जो अब तक अमेरिका, यूरोप या उनके नए प्रतिस्पर्धी चीन का है। भारत विश्व व्यापार का न बड़ा खिलाड़ी है, न ऐसा बनने की उसकी कोई आकांक्षा है। वह एक संतुलित विकास की ओर बढ़ रहा है, जिसकी मूल ऊर्जा उसके आंतरिक स्रोतों से ही मिल सकती है।

विदेशी पूंजी, विदेश व्यापार और उन्नत प्रौद्योगिकी की उसे भी आवश्यकता है, लेकिन उतनी ही कि वे भारत की आंतरिक शक्ति और ऊर्जा को क्रियाशील कर सकें। इसलिए नरेन्द्र मोदी ने अपनी इस यात्रा के दौरान विदेशी निवेश आकर्षित करने, उन्नत प्रौद्योगिकी के क्षेत्र में सहयोग बढ़ाने, द्विपक्षीय सहयोग को गति देने, आंतकवाद जैसे मुद्दे पर अन्य देशों का समर्थन जुटाने और अन्तरराष्ट्रीय सहयोग के राजनीतिक और आर्थिक मंचों में अपनी भागीदारी सुनिश्चित करने की कोशिश अवश्य की, पर कोई बड़ा लक्ष्य नहीं रखा। इस दिशा में वे सीमित सफलता की आशा लेकर ही इस यात्रा पर गये थे, और उतनी सफलता उन्हें मिली।

बात जर्मनी की
इस यात्रा का पहला पड़ाव जर्मनी था। जर्मनी की चांसलर एंजेला मार्केल अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप के व्यवहार से सबसे अधिक खिन्न हैं। डोनाल्ड ट्रंप ने सार्वजनिक रूप से जर्मनी की यह कहते हुए आलोचना की है कि वह उत्तरी अटलांटिक संधि संगठन (नाटो) का खर्च उठाने में अपेक्षित सहयोग नहीं कर रहा और उसका व्यापार संतुलन अमेरिका के प्रतिकूल है।

नरेन्द्र मोदी की यात्रा से ठीक पहले एंजेला मार्केल ने यह कहा था कि जर्मनी अब अपने सहयोगियों पर अधिक निर्भर नहीं रह सकता। भारतीय प्रधानमंत्री के लिए यह सही मौका था, जब वे भारत और जर्मनी के बीच सहयोग को नई दिशा देने और उसे अधिक ऊंचाइयों तक ले जाने की बात कह सकते थे।

उन्होंने कहा कि दोनों देशों के दृष्टिकोण और हितों में काफी समानता है और वे परस्पर सहयोग को काफी आगे बढ़ा सकते हैं। अब तक भारत और जर्मनी के बीच अपेक्षित आर्थिक सहयोग विकसित नहीं हो पाया।

इसका बड़ा कारण यह है कि अब तक जर्मनी की वित्तीय संस्थाएं और कंपनियां आंख मूंदकर अमेरिकी वित्तीय संस्थाओं और कंपनियों के पीछे चलती रही हैं। पिछले तीन-चार दशक तक अमेरिकी कंपनियां चीन में निवेश और निर्माण करती रहीं। वही जर्मनी ने भी किया।

चीन में जर्मन निवेश अब साठ अरब डॉलर के आसपास है जबकि भारत में उनका निवेश नगण्य है। विश्व बाजार में अपने स्टील के अतिरिक्त उत्पादन को सस्ते दाम पर बेचने और जर्मनी की निर्माता कंपनियों पर इलेक्ट्रिक वाहनों की एक निर्धारित मात्रा बनाने और बेचने जैसी समस्याएं दोनों के बीच कुछ तनाव पैदा करती रही हैं। लेकिन ऐसी सब आशंकाओं के बावजूद अभी जर्मनी और चीन के बीच आर्थिक सहयोग बढ़ने की ही संभावना है।

नरेन्द्र मोदी की जर्मनी की यात्रा के ठीक बाद चीन के प्रधानमंत्री जर्मनी पहुंचे थे, इसलिए यह तुलना होना स्वाभाविक ही था कि जर्मनी और चीन के बीच बढ़ती व्यापारिक साझेदारी को देखते हुए भारत कहां ठहरता है। लेकिन यह तुलना ठीक नहीं है। भारत और जर्मनी के बीच बहुआयामी संबंध हैं, क्योंकि दोनों ही देश खुली और पारदर्शी व्यवस्था वाले देश हैं। उनके बीच सांस्कृतिक और राजनैतिक सहयोग अधिक रहा है।

जर्मनी और चीन के बीच का सहयोग एकआयामी सहयोग है। चीन अपने व्यापारिक साम्राज्य का विस्तार करने में लगा है और जब तक उसके हित जर्मनी के हितों से टकराते नहीं हैं, तब तक यह सहयोग बना रहेगा। नरेन्द्र मोदी को जर्मनी से अधिक सहयोग की जो अपेक्षाएं रही हैं, उसका फल पिछली तिमाही में दिखाई दिया।

जर्मनी औद्योगिक निर्माण के क्षेत्र में यूरोप की अग्रणी शक्ति है। भारत अपने औद्योगिक निर्माण के क्षेत्र का विस्तार करने में लगा हुआ है। इस सिलसिले में जर्मनी से पूंजी निवेश और प्रौद्योगिकी दोनों ही क्षेत्रों में कहीं अधिक सहयोग हो सकता है। अब जबकि जर्मनी को अमेरिकी बाजार से पहले जैसी आशाएं नहीं रहीं, भारत उसके लिए एक आकर्षक विकल्प हो सकता है।

अन्तरराष्ट्रीय परिदृश्य में अमेरिका ने नैराश्य पैदा किया है। ऐसे समय में यूरोप के चार महत्वपूर्ण देशों की यात्रा का महत्व बढ़ जाता है। सबसे महत्वपूर्ण है रूस, जिसके साथ हमेशा से रहे राजनीतिक व सामरिक रिश्तों को नई ऊर्जा मिली है।

25 साल बाद स्पेन
जर्मनी के बाद नरेन्द्र मोदी स्पेन की यात्रा पर गए। यह 1992 के बाद किसी भारतीय प्रधानमंत्री की पहली स्पेन यात्रा थी। पिछले पच्चीस वर्ष में कोई भारतीय प्रधानमंत्री स्पेन नहीं गया। यह अपने आपमें आश्चर्य की बात है। क्योंकि, स्पेनिश बोलने वाले लातिनी अमेरिकी देशों की बदौलत स्पेन की कंपनियों का अन्तरराष्ट्रीय विस्तार कई दूसरे औद्योगिक देशों से अधिक है।

भारत में स्पेन की लगभग 200 कंपनियां कार्यरत हैं। भारत की भी लगभग 40 कंपनियां स्पेन में कारोबार कर रही है। भारत में स्पेनिश निवेश पांच अरब डॉलर से अधिक ही है। भारत में संभावनाओं को देखते हुए यह निवेश भी बहुत नहीं है। अपनी इस यूरोप यात्रा के दौरान नरेन्द्र मोदी ने स्थानीय उद्योग व्यापार के अग्रणी लोगों को यही समझाने की कोशिश की कि उनके लिये भारत में अनंत संभावनाएं हैं।

भारत ने इस बीच अपने नियम-कानूनों और नियंत्रक प्रक्रियाओं को काफी आसान बना दिया है। यह आशा की जा सकती है कि बदली हुई परिस्थितियों में भारत स्पेनिश कंपनियों से अधिक पूंजी निवेश और व्यापार प्राप्त करेगा। स्पेन में भारतीय प्रधानमंत्री ने आतंकवाद से अन्तरराष्ट्रीय जगत की समवेत लड़ाई को और अधिक रेखांकित किया।

यूरोप के देश स्वयं आतंकवाद की समस्या से ग्रस्त है, इसलिए आतंकवाद के कारण भारत को जो कठिनाईयां हो रही हैं, उन्हें वे अधिक अच्छी तरह समझ सकते हैं। स्पेन से हमें सांस्कृतिक स्तर पर अपना सहयोग और बढ़ाना चाहिए। अब तक हमारा ध्यान एंग्लो-सेक्सन प्रधानता वाले उत्तरी यूरोप की तरफ ही रहा है। जबकि उसकी ढाई गुना आबादी वाला दक्षिणी अमेरिका अधिकांशत: स्पानी भाषा बोलता है और स्पानी संस्कृति के निकट है। हमें अपने यहां स्पानी संस्कृति को जानने-समझने वाले लोगों की संख्या भी बढ़ानी चाहिए।

रूस का महत्व
नरेन्द्र मोदी की इस यूरोप यात्रा का तीसरा पड़ाव रूस था। यह इस यात्रा का सबसे महत्वपूर्ण पड़ाव भी था। रूस ने नरेन्द्र मोदी की इस यात्रा को दोनों देशों के बीच राजनयिक संबंध स्थापित होने के सत्तर वर्ष पूरे होने के अवसर के रूप में मनाया। इस अवसर पर की गई नरेन्द्र मोदी की यह टिप्पणी गलत नहीं है कि दूसरे देशों के संबंधों में उतार-चढ़ाव आते रहे हैं, लेकिन भारत और रूस के संबंधों में प्रगाढ़ता बनी रही है। दोनों देशों की दोस्ती सदाबहार दोस्ती है।

आमतौर पर भारत की आजादी के बाद के आरंभिक दिनों में हमारे सोवियत संघ की तरफ झुकाव को जवाहरलाल नेहरू के वामपंथी रुझान के रूप में देखा जाता है। लेकिन यह आधा सच ही है। भारत में रूस के प्रति और रूस में भारत के प्रति काफी पहले से जिज्ञासा और अनुकूलता रही है।

रूस अपने आपको यूरेशिया का देश मानता है। अनेक विद्वान यह मानते हैं कि रूस और पूर्वी यूरोप के देशों की जनसंख्या में भारत से वहां जाकर बसी जातियों और समूहों का काफी मिश्रण है। इसलिए उनकी भाषाओं और भारतीय भाषाओं में काफी समानता है।

यह सही है कि बीसवीं सदी के छठे दशक में जवाहरलाल नेहरू ने अमेरिका से निकटता ठुकरा दी थी और सोवियत संघ हमारी गुटनिरपेक्ष नीतियों के बावजूद हमसे अधिक निकट का संबंध बनाने में सफल रहा था। बाद में चीनी आक्रमण और 1965 के पाकिस्तान युद्ध के बाद 1971 में भारत और सोवियत रूस के बीच मैत्री संधि हुई, जिसके कई संस्करण अब तक हो चुके हैं।

शीत युद्ध की समाप्ति के बाद भारत और रूस के संबंधों में कुछ ठहराव आया था। रूस में सत्ता में आये नये नेताओं को भारत के बारे में अधिक जानकारी या समझ नहीं थी। कुछ समय के लिए रूस अपनी आंतरिक परिस्थितियों को संभालने में लगा रहा। पिछले दिनों अमेरिका और चीन के संबंधों में प्रकट हुए तनाव के बाद रूस और चीन के बीच कुछ निकटता आई।

फ्रांस सदा आड़े समय में हमारे काम आया है। वह एंग्लो सेक्सन जगत से भिन्न रुख लेने की कोशिश करता है। अन्तरराष्ट्रीय राजनीति में वह अमेरिका का सहयोगी ही रहा है। लेकिन यूरोप की दूसरी बड़ी शक्ति होने के नाते फ्रांस का हमारे लिए सदा महत्व रहा है।

तेल के दामों में गिरावट से अपनी आमदनी में हुई कटौती की भरपाई रूस ने अधिक हथियार बेचकर करने की कोशिश की। इसी प्रक्रिया में चीन उसके हथियारों का बड़ा ग्राहक बना। उसके हथियारों के एक नए खरीददार के रूप में चीन ने पाकिस्तान को रूस के निकट लाने की कोशिश की।

इस सबसे भारत में कुछ चिंताएं पैदा हुईं। लेकिन नरेन्द्र मोदी की हाल की यात्रा के दौरान रूस के राष्ट्रपति ब्लादिमीर पुतिन ने यह स्पष्ट कर दिया कि पाकिस्तान से उनके कोई गहरे सामरिक संबंध नहीं हैं। नरेन्द्र मोदी की इस यात्रा की सबसे बड़ी उपलब्धि यही है कि भारत और रूस के संबंधों की प्रगाढ़ता फिर लौट आई है।

अब तक अन्तरराष्ट्रीय राजनीति में रूस हमारा सबसे विश्वस्त सहयोगी रहा है। उससे हमारे संबंधों का मूल आधार रक्षा क्षेत्र में सहयोग है। रूस से हमें अनुकूल शर्तों पर युद्धपोत, लड़ाकू विमान और अन्य युद्धक सामग्री तो मिलती ही रही है, नाभिकीय क्षेत्र में भी हमें रूस का निरन्तर सहयोग मिला है। पिछले कुछ दशक में हमने दूसरे स्रोतों से भी अपनी आवश्यकता की रक्षा सामग्री प्राप्त की। उसे लेकर रूस में कुछ चिंताएं रही हो सकती हैं। लेकिन अपने विकल्पों को खुले रखने का अर्थ यह नहीं है कि रूस के साथ संबंधों की जो अन्नयता है, भारत ने उसे छोड़ दिया है।

सेंट पीटर्सवर्ग में, जो राष्ट्रपति पुतिन का गृह प्रदेश भी है, आयोजित मोदी-पुतिन शिखर वार्ता के दौरान दोनों नेताओं ने द्विपक्षीय, क्षेत्रीय और अन्तरराष्ट्रीय मुद्दों पर खुलकर बात की। इस वार्ता से कुडनकुलम परमाणु ऊर्जा संयंत्र की अंतिम दो इकाईयों के निर्माण का रास्ता खुल गया। इस यात्रा के दौरान भारत और रूस के बीच रक्षा सामग्री के निर्माण को लेकर महत्वपूर्ण समझौते हुए हैं।

रूस भारत में पांचवीं पीढ़ी के अत्याधुनिक लड़ाकू विमान और युद्धपोत आदि बनाने में सहायता देने को सहमत हो गया है। रूस भारत को विमान भेदी एस-400 मिसाइल प्रणाली बेचने के लिए भी तैयार हो रहा है। इस समय भारत रक्षा सामग्री के निर्माण का अपने यहां जो तंत्र खड़ा करने में लगा है, उसमें सबसे अधिक सहयोग मिलने की अपेक्षा रूस से ही की जा सकती है।

इस सिलसिले में रूस ने एक स्वतंत्र क्रेडिट रेटिंग एजेंसी की बात भी की है, जिसके फैसले अमेरिकी रेटिंग एजेंसियों की तरह राजनैतिक न हों। रूस हमें तेज रफ्तार रेल से लेकर ऊर्जा के वैकल्पिक साधनों के तीव्र गति के विकास में सहयोग देने के लिये भी उत्सुक है।

फ्रांस का साथ
नरेन्द्र मोदी की इस यात्रा के चौथे पड़ाव के रूप में फ्रांस का चयन सोच-समझकर ही किया गया था। पिछले वर्ष गणतंत्र दिवस की परेड के समय फ्रांस के राष्ट्रपति हमारे अतिथि थे। अब वहां राष्ट्रपति बदल गए हैं और इमेनुएल मैक्रो नए राष्ट्रपति हैं। संबंधों की निरंतरता बनाए रखने के लिए प्रधानमंत्री की फ्रांस यात्रा को उपर्युक्त समझा गया।

फ्रांस सदा आड़े समय में हमारे काम आया है। वह एंग्लो सेक्सन जगत से भिन्न रुख लेने की कोशिश करता है। अन्तरराष्ट्रीय राजनीति में वह अमेरिका का सहयोगी ही रहा है। लेकिन यूरोप की दूसरी बड़ी शक्ति होने के नाते फ्रांस का हमारे लिए सदा महत्व रहा है। यूरोप में ब्रिटेन के बाद फ्रांस से हमारी सबसे अधिक सांस्कृतिक और बौद्धिक स्तर पर निकटता रही है।

फ्रांस का हमें नाभिकीय क्षेत्र में भी सहयोग मिलता रहा है। लड़ाकू विमानों से लगाकर उन्नत प्रौद्योगिकी की अन्य अनेक सामग्री हमें फ्रांस से मिलती रही है। अन्तरराष्ट्रीय मंचों पर भी फ्रांस ने हमेशा हमारा साथ दिया है। आतंकवाद से भारत की तरह वह भी जूझ रहा है। इसलिए प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी को फ्रांस में एक अनुकूल वातावरण मिलना स्वाभाविक ही था।

भारत और फ्रांस के बीच पिछले वर्ष लगभग 8.5 अरब डॉलर का व्यापार हुआ। यह अधिक नहीं है। भारत में लगभग 750 फ्रांसीसी कंपनियां कार्यशील हैं। वे लगभग तीन लाख भारतीयों को रोजगार देती हैं और प्रतिवर्ष लगभग 20 अरब डॉलर का कारोबार करती हैं।

भारत के प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी 29 मई से 3 जून तक 6 दिवसीय विदेश यात्रा पर रहे। इस दौरान वे जर्मनी, स्पेन, रूस और फ्रांस गए। मोदी की इस यात्रा की सबसे बड़ी उपलब्धि यही है कि भारत और रूस के संबंधों की प्रगाढ़ता फिर लौट आई है।

प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी की यूरोप के चार महत्वपूर्ण देशों की यह यात्रा एक तरह से यूरोप में दस्तक देने जैसी थी। इस यात्रा के दौरान बड़ी उपलब्धि रूस से संबंधों की प्रगाढ़ता ही है।

नरेन्द्र मोदी यूरोप की तीन अन्य शक्तियों का ऐसे समय ध्यान खींचने में अवश्य सफल हुए, जब वे अमेरिका से कुछ निराश होकर वैकल्पिक सहयोग तलाश रही हैं लेकिन अमेरिका और यूरोपीय संघ के देशों के बीच डोनाल्ड ट्रंप की नीतियों के कारण जो तनाव आया है उसे अतिरंजित करके नहीं देखा जाना चाहिए।

यह सोचना भूल होगी कि चीन अमेरिका का विकल्प हो सकता है। इतना ही हुआ है कि अमेरिका ने रणनीतिक रूप से अपना एक पैर पीछे लौटाया है। अलबत्ता औद्योगिक देशों ने अन्तरराष्ट्रीय व्यापार पर नियंत्रण के जरिए जो समृद्धि प्राप्त की थी, उसमें अब कमी ही आएगी। भारत अपनी अर्थव्यवस्था विदेश व्यापार पर आश्रित न करके ठीक ही कर रहा है।

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