सत्ता परिवर्तन और जुप्ता बंधु

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दक्षिण अफ्रीका में राष्ट्रपति जैकब जुमा की बेदखली और सिरिल रामफोसा की ताजपोशी के बीच सबसे अधिक चर्चा में तीन भारतीय भाई हैं। उत्तर प्रदेश के सहारनपुर जिले के एक व्यापारी परिवार से जुड़े इन तीन भाइयों अतुल, अजय और राजेश (टोनी) गुप्ता के कारनामों की मीडिया में लगातार चर्चा हो रही है।

जिस देश में महात्मा गांधी के राजनीतिक प्रयोगों की चर्चा होती थी, वहां भारतीय उद्यमियों और व्यापारियों की तीन तिकड़म को लेकर सही-गलत बातें प्रचारित हो रही हैं।

महात्मा गांधी ने करीब 125 साल पहले दक्षिण अफ्रीका में रंग भेदभाव और नस्लवाद के खिलाफ अहिंसक प्रतिरोध के राजनीतिक हथियार का आविष्कार किया था जो उस देश में ही नहीं पूरी दुनिया के मुक्ति संघर्षों के लिए प्रेरणा साबित हुया।

दक्षिण अफ्रीका के मुक्ति संघर्ष के नायक नेल्सन मंडेला और उनकी पार्टी अफ्रीकन नेशनल कांग्रेस (एएनसी) ने श्वेत अल्पसंख्यकों के नस्लवादी अमानवीय शासन का विरोध हथियारबंद संघर्ष के साथ साथ अहिंसक असहयोग आंदोलन से भी किया।

गोरों का राज खत्म होने के बाद दक्षिण अफ्रीका में मुक्ति संघर्ष का जज्बा धीरे धीरे मद्धिम पड़ने लगा और सत्ताधारी एएनसी दल अपनी विचारधारा से भटक गया। अश्वेत बहुसंख्यकों का मोहभंग मंडेला के समय ही उजागर होने लगा था।

लेकिन उनके राजनीतिक परिदृश्य से हटने के बाद स्थिति में तेजी से गिरावट आई। प्राकृतिक संसाधनों से संपन्न और आर्थिक संभावनाओं से परिपूर्ण देश में अपराध और भ्रष्टाचार का दौर चलने लगा।

गुप्ता बंधुओं का व्यापारिक भाग्य और जैकब जुमा का राजनीतिक
भाग्य एक दूसरे से इतना जुड़ गए कि आने वाले 
दिनों में दक्षिण अफ्रीका  में एक नया शब्द ‘जुप्ता’ ( जुमा+गुप्ता) प्रचलित हो गया।

अश्वेतों की बढ़ी हुई आशा अपेक्षाओं का पूरा होना तो दूर, पुरानी शोषणकारी व्यवस्था फिर हावी होने लगी। मंडेला के बाद थाबो एम्बेकी के राष्ट्रपति कार्यकाल में यही हालत रहे।

बाद में जैकब ज़ूमा ने सरकार और पार्टी को मुक्ति संघर्ष  के आदर्शों की ओर लौटाने की कोशिश की लेकिन उनमें देश को सही दिशा देने का माद्दा ही नहीं था। दक्षिण अफ्रीका में गुप्ता बंधुओं की सफलता की कहानी परी कथा जैसी है। गुप्ता बंधुओं की दुनिया भर में फैली व्यापारिक यात्रा उत्तर प्रदेश के सहारनपुर शहर से शुरू हुई जहां उनके पिता शिवकुमार गुप्ता ने मसालों और सोप स्टोन के कारोबार की शुरुआत की थी।

अपनी उद्यमशीलता और महत्वाकांक्षा से उन्होंने अपने पुत्रों को दुनिया के कई देशों में अपना भाग्य आजमाने के लिए प्रेरित किया। एक पुत्र अजय दिल्ली आया तो दूसरा राजेश (टोनी) चीन गया, तीसरे अतुल ने दक्षिण अफ्रीका का रुख किया।

अतुल गुप्ता ने अपने व्यवसाय की शुरुआत जूतों की बिक्री से की। लेकिन जल्दी ही वह कंप्यूटर कारोबार से जुड़ गया।  दक्षिण अफ्रीका विशेषकर वहां के अश्वेत लोगों के लिए सस्ता, विश्वसनीय और कारगर कंप्यूटर पहुंच के बाहर रहा था।

अतुल ने इस कमी को पूरा करने का बीड़ा उठाया।  वर्ष 1994 में उसने ‘सहारा कम्प्यूटर्स लिमिटेड’ कंपनी की स्थापना की तथा पर्सनल कम्प्यूटर्स का आयात शुरू किया।

शुरुआती अनुभव से ही अतुल को भान  हो गया कि नस्लभेद और श्वेत एकाधिकार खत्म होने के बावजूद देश में एक छोटे से वर्ग का आधिपत्य है जिसमें छोटे उद्यमियों के लिए काम कर पाना बहुत मुश्किल है।

उसने इन बाधाओं को पार करने के इरादे से उन तौर तरीकों को अपनाया जो दूसरे उद्यमी अपना रहे थे। धीरे धीरे परिस्थितियों को अतुल ने अपने अनुकूल बना लिया और दो अन्य भाई अजय और राजेश भी दक्षिण अफ्रीका आ गए।

व्यापार और राजनीति के रिश्ते को पहचानते हुए गुप्ता बंधुओं  ने सत्ताधारी अफ्रीकन नेशनल कांग्रेस (एएनसी) के नेताओं से संपर्क साधा। सबसे पहले वे एएनसी के वरिष्ठ नेता एसोप पहद के संपर्क में आए जिसने उन्हें उपराष्ट्रपति थाबो एम्बेकी के निकट पहुंचाया।

वर्ष 1999 में थाबो एम्बेकी ने नेल्सन मंडेला के बाद देश की बागडोर संभाली और गुप्ता बंधुओं की पहुंच सत्ता के गलियारे में सीधे हो गई।

अतुल राष्ट्रपति के सलाहकार समूह में आ गया और देश के विदेश व्यापार से जुड़ी महत्वपूर्ण संस्था इंटरनेशनल मार्केटिंग काउंसिल का सदस्य नियुक्त हुआ। 21वीं सदी की शुरुआत में गुप्ता बंधु दक्षिण अफ्रीका के उद्यमी-व्यापारी समूह में अग्रणी पंक्ति में आ गए। उन्होंने सत्ताधारी दल में चल रहे शक्ति संघर्ष पर नज़र भी रखी। पार्टी में राष्ट्रपति एम्बेकी को उद्योग व्यापार समर्थक माना जाता था जबकि उपराष्ट्रपति जैकब ज़ुमा का रुझान समाजवाद की ओर था।

व्यापारिक बुद्धिमता का परिचय देते हुए गुप्ता बंधुओं ने एम्बेकी और ज़ूमा दोनों से संपर्क साधा।  अजय गुप्ता ने एम्बेकी गुट में विश्वास बनाए रखा जबकि राजेश गुप्ता जुमा के पाले में रहे।

आलोचकों के अनुसार गुप्ता बंधुओं ने जुमा और उनके निकटवर्ती लोगों को आर्थिक रूप से उपकृत किया। उन्होंने जुमा के पुत्र दुदुज़ाने को अपनी कंपनी में अधिकारी नियुक्त किया और उसकी जुड़वा बहनों को कंपनी का निदेशक बना दिया।

इतना ही नहीं, जुमा की एक पत्नी गुप्ता बंधुओं की कंपनी में संपर्क अधिकारी भी बनाई गयीं। इस बीच गुप्ता बंधुओं का कारोबार यूरेनियम और कोयला खानों तक विस्तृत हो गया।

व्यापक अर्थ में यह शब्द अश्वेत व्यापारियों और उद्यमियों के लिए सम्बोधन सूचक है। ‘जुप्ता’ देश के आर्थिक जगत पर हावी गोरे लोगों के एकाधिकार को खत्म करने वाले लोगों का समूह बन गया। नस्लभेद के खात्मे के बावजूद पश्चिमी देशों के संरक्षण में गोरे लोगों ने देश में आर्थिक संसाधनों पर कब्जा बनाए रखा।

वर्ष 2007 में दक्षिण अफ्रीका की राजनीति में एक नया मोड़ आया जब जैकब जुमा ने थाबो एम्बेकी को सत्ता बेदखल कर देश की बागडोर संभाली।

गुप्ता बंधुओं ने जुमा के समर्थन में राजनीतिक अभियान भी छेड़ दिया और अफ्रीकन नेशनल कांग्रेस की राजनीति में हस्तक्षेप शुरू कर दिया। शायद यही उनकी सबसे बड़ी गलती थी।

जुमा नस्लभेद के खिलाफ लड़ाई को अधूरा मानते हुए उसे सामाजिक आर्थिक समानता में तब्दील करना चाहते थे। लेकिन जो काम नेल्सन मंडेला नहीं कर पाए, वह जुमा नहीं कर सकते थे। नस्लभेद का खात्मा भी अल्पसंख्यक गोरों की शर्तों पर ही खत्म हुआ था। श्वेत लोगों को अमेरिका व यूरोप की सरकारें समर्थन दे रही थीं।

धीरे धीरे बहुराष्ट्रीय कंपनियों ने देश पर अपनी पकड़ मजबूत कर ली और राजनीतिक नेतृत्व को भी साम दाम दंड भेद से अपने प्रभाव में ले लिया। मीडिया पर पहले से ही गोरों का कब्जा था। पश्चिमी देशों के प्रचार माध्यम भी दक्षिण अफ्रीका में मूलभूत बदलाव के खिलाफ थे।

राष्ट्रपति जुमा के खिलाफ अनवरत रूप से दुष्प्रचार अभियान चलाया गया। पश्चिमी देश जुमा की विदेश नीति को भी नापसंद करते थे।

जुप्ता को आज कई रूप से परिभाषित किया जा रहा है। सामान्य
अर्थ में यह राष्ट्रपति जुमा के कार्यकाल में सरकारी संरक्षण
के जरिये आर्थिक फायदा उठाने वाले लोगों के लिए प्रयुक्त होता है।

जुमा देश का भविष्य विकासशील देशों और ब्रिक्स समूह के साथ निकट संबंधों में देखते थे। उनका मानना था कि भारत, रूस, चीन और ब्राज़ील जैसे देशों के साथ जुड़ कर वह देश को आर्थिक विकास के मार्ग पर ले जा सकते हैं।

ऐसी ही सोच ब्राज़ील की राष्ट्रपति रोसेफ डेल्मा की भी थी। यह मात्र संयोग नहीं है कि आज रोसेफ डेल्मा और जुमा दोनों सत्ता से बाहर है।ऐसे समय जब राष्ट्रपति जुमा पर चारों ओर से हमले हो रहे थे, गुप्ता बंधुओं ने उनके पक्ष में राजनीतिक मुहिम छेड़ दी।

इस काम में उन्होंने अपनी मीडिया कंपनियों के साथ ब्रिटेन की एक प्रमुख जनसम्पर्क कंपनी बेल पोटिंगर्स की सेवाएं हासिल कीं। देश में एक नया राजनीतिक एजेंडा सामने आया। वह था – श्वेत एकाधिकारवादी पूंजी। देश की जनता को सीधा संदेश था कि नस्लभेद के अंत के बावजूद श्वेत एकाधिकारवादी पूंजी आज भी काबिज है और वह मुक्ति संघर्ष को अंजाम तक नहीं पहुंचने देगी।

गुप्ता बंधुओं के बारे में यह राय बनी कि वे श्वेत एकाधिकारवादी पूंजी के खिलाफ जंग में देश के बहुसंख्यक अश्वेत लोगों के साथ हैं। गुप्ता बंधु स्वयं भी सार्वजनिक रूप से कहते थे कि वे दक्षिण अफ्रीका के अश्वेत लोगों को आर्थिक रूप से मजबूत बनाना चाहते हैं।

उन्होंने अश्वतों के कल्याण के लिए अनेक प्रोजेक्ट शुरू किये और उनकी छवि एक संवेदनशील-परोपकारी उद्यमी के रूप में उभरी। गोरे लोगों और उनके प्रभाव वाली मीडिया ने गुप्ता बंधुओं के खिलाफ अभियान छेड़ दिया और उनपर आरोप लगाया गया  कि वे देश में गृहयुद्ध कराना चाहते हैं।

गुप्ता बंधु वास्तव में अश्वेतों की भलाई को लेकर फिक्रमंद थे या यह केवल उनकी चाल थी, यह विवाद का विषय हो सकता है। इस तथ्य से भी कोई इनकार नहीं कर सकता कि उनकी आर्थिक सफलता केवल उनकी सूझबूझ और उद्यमशीलता का परिणाम ही नहीं थी। देश में अपराध और भ्रष्टाचार का बोलबाला है और सरकारें इनसे निबटने में अक्षम हैं। इस माहौल में नियम आधारित आर्थिक क्रियाकलाप संभव ही नहीं थे।

दक्षिणी अफ्रीकी राष्ट्रपति जैकब जुमा और उनके शासन-प्रशासन की छत्रछाया में ही गुप्ता बंधुओं ने अपना आर्थिक साम्राज्य खड़ा किया। आज गुप्ता बंधुओं का कारोबार डूब रहा है।

उनकी कम्पनियों ने दिवालिया होने का आवेदन दाखिल किया है। वे देश से बाहर भागे-भागे फिर रहे हैं।

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