विश्व राजनीति में भारत का अंगद पांव

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रूस के शासक परिवार का एक दंपत्ति करीब 150 साल पहले अपने साम्राज्य के दक्षिणीछोर पर कैस्पियन सागर के तट पर स्थित बाकू कस्बे के भ्रमण पर आया। स्थानीय गवर्नर ने जार और जरीना को वहां स्थित अग्नि मंदिर के बारे में बताया।

शाही दंपत्ति जब अग्नि मंदिर पहुंचा तो भारतीय पुजारी ने परंपरागत तरीके से उनका स्वागत किया।उन्हें गर्भ गृह तक ले गयाजहां पृथ्वी से अग्नि की लौ प्राकृतिक रूप से प्रकट थी। यही मंदिर कीआराध्य ज्योति थी। आध्यात्मिक परिवेश से अभिभूत जरीना ने अपने पति से पूछा– ‘क्या हम भारत में गए हैं या हमारा साम्राज्य भारत तक फैल गया है।

आज बाकू मध्य एशिया के अजरबैजान देश का हिस्सा है। कभी दुनिया की ऊर्जा राजधानी माने  जानेवाले इस इलाके में तेल और प्राकृतिक गैस का इतना दोहन हुया कि   स्वाभाविक रूप से अग्नि मंदिरतक आने वाली गैस समाप्त हो गई। आराध्य लौ बुझ गई।

ऐसे समय जब अमेरिका का ट्रंप प्रशासन विश्व मामलों में अपनी दिलचस्पी
कम कर रहा है तो ‘शंघाई सहयोग संगठन‘ (एससीओइस रिक्तता
को भरनेका कारगर माध्यम है।

तत्कालीन प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी को जब इस बात का पता चला तो उन्होंने अजरबैजान अधिकारियोंसे आग्रह किया कि वे कोई वैकल्पिक व्यवस्था करें। आज बाकू का अग्नि मंदिर अजरबैजान कीसांस्कृतिक धरोहर है और वहां कृत्रिम  रूप से गैस की आपूर्ति कर आराध्य ज्योति को प्रज्जवलितरखा गया है।

इसी तरह गुजरात मुख्यमंत्री के रूप में नरेन्द्र मोदी को वर्ष 2001 में बाकू से कुछ दूर स्थित दक्षिणी रूस के अस्त्राखान  कस्बे के भ्रमण का अवसर मिला। वह आश्चर्यचकित रह गएजब अधिकारियों नेवहां स्थित मुल्तानी बस्ती के बारे में उन्हें बताया। यह बस्ती भारतीय व्यापारियों ने बसाई थीजो उसइलाके में कारोबार करते थे।

बाकू का अग्नि मंदिर और अस्त्राखान की मुल्तानी बस्ती इस बात का प्रमाण है कि कुछ सदी पहले तक भारतीय लोग मध्य एशिया के देशों से सांस्कृतिक और व्यापारिक रूप से कितनी निकटता के साथ जुड़े थे। आजादी के बाद भारत के लिए यह अवसर था कि वह इन संबंध सूत्रों को और मजबूत बनाता। लेकिन ऐसा नहीं हो पाया।

प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने भारतीय कूटनीति को मध्य एशिया केंद्रित बनाने की पहल की है। देश कीभावी ऊर्जा आवश्यकताओं को पूरा करने के लिए इस इलाके का विशेष महत्व है। भारत को अतीत में पश्चिमोत्तर से ही हमलों का सामना पड़ा था। इस्लामी आतंकवाद यहां पांव जमा रहा है और भारत उसके निशाने पर है।

एक व्यापक गठजोड़ के जरिए ही भारत इस खतरे का सामना कर सकता है। मोदी सरकार केकूटनीतिक प्रयासों का ही नतीजा है कि भारत को हाल ही में मध्य एशिया के देशों की प्रमुख भूमिकावाले एशियाई मंच ‘शंघाई सहयोग संगठन‘ (एससीओकी पूर्ण सदस्यता हासिल हो गई है। पिछलेदिनों कजाखिस्तान के अस्ताना नगर में आठ और नौ जून को संपन्न एससीओ शिखर बैठक में भारतऔर पाकिस्तान को पूर्ण सदस्यता प्रदान की गई और इस प्रकार अब इस संगठन की सदस्य संख्याआठ हो गई है। यह ‘अष्ट प्रधान‘ 21वीं सदी की विश्व राजनीति में महत्वपूर्ण भूमिका निभाएंगे।

अस्ताना घोषणापत्र विश्व को बहुध्रुवीय बनाने का जरिया बनेगा।
एससीओ के चार्टर के अनुसार इस संगठन में शामिल देश अपने
द्विपक्षीय मुद्दों को नहीं उठा सकते हैं।

रूस और चीन के वर्चस्व वाले 16 वर्ष पुराने इस संगठन में अब तक कुल छह सदस्य थे। अन्यसदस्य थेकजाखिस्तानकिर्गिजस्तानताजिकिस्तान और उज्बेकिस्तान।नए सदस्य देशों केप्रतिनिधि के रूप में प्रधानमंत्री मोदी और पाकिस्तान के प्रधानमंत्री नवाज शरीफ ने बैठक में भागलिया।ईरानअफगानिस्तानबेलारूस और मंगोलिया के नेताओं ने पर्यवेक्षक रूप में बैठक मेंहिस्सेदारी की।पहले भारत और पाकिस्तान को भी पर्यवेक्षक का दर्जा हासिल था।

एससीओ के बीजिंग स्थित मुख्यालय में 15 जून को भारत तिरंगा और पाकिस्तान का झंडा फहरायागया।संगठन महासचिव रशीद अलीमोव ने इस अवसर पर कहा कि 16 साल पहले यह संगठन विश्वमानचित्र पर उभरा था।आज मुख्यालय पर आठ देशों का झंडा फहरा रहा है।

ये सब देश संगठन के चार्टर की भावना के अनुरूप सम्मिलित रूप से विश्व घटनाक्रम को प्रभावितकरेंगे।बीजिंग में एससीओ मुख्यालय पर भारत और पाकिस्तान राष्ट्रीय ध्वजों का साथसाथ फहरानाभारतीय उपमहाद्वीप की राजनीति में एक नई शुरुआत है।सीमा पार आतंकवाद का शिकार भारतलंबे समय तक पाकिस्तान को अंतरराष्ट्रीय मंच पर अलग थलग करने की मुहिम  चलाता रहा है। भारतने पाकिस्तान को राष्ट्रमंडल देशों की बिरादरी से बाहर रखने का अभियान भी चलाया  था।

इसी तरह भारत चाहता है कि समुदाय पाकिस्तान को आतंकवादी देश घोषित करे इन परिस्थितियोंमें यह सवाल उठना  लाजिमी है कि भारत संगठन में क्यों शामिल हुआजिसमें पाकिस्तान बराबर की हैसियत रखता है?

सरसरी तौर पर तो कारण यह है कि चीन संगठन में पाकिस्तान को शामिल करने की वकालत कररहा था लेकिन इससे भीमहत्व की बात यह है कि एससीओ चार्टर और इस संगठन की आतंकवाद विरोधी रणनीति भारत के तात्कालिक और   दूरगामी हितों से मेल खाती है। मुंबई हमलों सहित विभिन्नवारदातों से पल्ला झाड़ने वाले पाकिस्तान को एससीओ देशों की आतंकवादी विरोधी सैन्य औरखुफिया गतिविधियों में भाग लेना  होगा।

आने वाले दिनों में असंभव लगने वाली बात संभव बनेगीजब भारत और पाकिस्तान के कमांडोज एकसाथ एससीओ के आतंकवाद विरोधी अभियान के तहत सैन्य अभ्यास करेंगे।एक तरफ रूस चेचन्यामें तो चीन शिंजियांग में और भारत जम्मू कश्मीर में आतंकवाद का सामना कर रहा है।

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