रोहानी की जीत में ईरान का भविष्य

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ईरान में हसन रोहानी राष्ट्रपति पद पर दोबारा चुन लिए गए हैं। यह ईरान के लोगों की मानसिकता में आ रहे परिवर्तन और ईरानी व्यवस्था में नए तत्वों के प्रवेश का संकेत है।

सुधारवादी हसन रोहानी को 57 प्रतिशत, जबकि उनके विरोधी व कट्टरपंथी प्रतिद्वंद्वी इब्राहिम रईसी को मात्र 38.3 प्रतिशत वोटों मिलना एक बड़े बदलाव की संभावना व्यक्त करता है। रईसी को ईरान के कट्टरपंथी धार्मिक नेता अयातुल्लाह खुमैनी का भी समर्थन प्राप्त था।

इसके बावजूद रईसी की करारी हार के गहरे निहितार्थ हैं। माना जा सकता है कि रोहानी की इस जीत से दुनिया के दूसरे देशों के साथ ईरान के संबंधों को फिर से स्थापित करने और संकट से जूझ रही अर्थव्यवस्था को नई गति देने के रोहानी के प्रयासों पर जनता ने मुहर लगा दी है।

ईरान में हसन रोहानी के दोबारा चुने जाने के गहरे निहतार्थ हैं। यह कट्टरवादी सोच को दरकिनार कर वैश्विक जगत से संबंध सुधारने की सोच का परिचायक है। रोहानी की जीत यह संकेत कर रही है कि ईरान के नागरिक बाहरी दुनिया से जुड़ना चाहते हैं।

ईरान के इस चुनाव को व्यापक नागरिक स्वतंत्रता और उग्रवाद जैसे विषयों के सापेक्ष देखा गया था। उदारवादी रोहानी प्रगतिशीलता व वैश्विक परिवर्तनों के साथ संतुलन के संदेश के साथ चुनाव में उतरे थे। उधर इब्राहिम रईसी गरीबों के रक्षक और पश्चिम के विरोधी के रूप में।

इंटरनेशनल क्राइसिस ग्रुप की एक रिपोर्ट के अनुसार खास तौर पर ग्रामीण क्षेत्रों में रोहानी को मिला वोट यह प्रदर्शित करता है कि ईरान के लोग आर्थिक लोक-लुभावनवाद और उग्र राष्ट्रवाद में ज्यादा विश्वास नहीं करते हैं। हसन रोहानी की जीत यह संकेत कर रही है कि ईरान के नागरिक बाहरी दुनिया से जुड़ना चाहते हैं। रोहानी ने अपनी जीत के बाद लोगों से कहा है कि जिस उम्मीद के साथ आपने मुझे यह दायित्व सौंपा है, उससे मुझे जिम्मेदारी का भार महसूस होता है।

इससे तो यही संदेश मिलता है कि रोहानी शांति एवं प्रगतिशीलता की नीति को आगे बढ़ाने का हरसंभव प्रयास करेंगे। लेकिन जिस तरह से खाड़ी में शिया और सुन्नी दुनिया के बीच विभाजक रेखाएं खिंची हुई हैं जिन्हें और गाढ़ा करने का काम महाशक्तियां (विशेषकर अमेरिका एवं रूस) कर रही हैं, उससे यह संशय होना लाजिमी है कि क्या रोहानी अपने उद्देश्यों में सफल भी हो पाएंगे?

हमारे लिए महत्वपूर्ण यह है कि हसन रोहानी को भारत के लिए किस रूप में देखा जा सकता है? प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी की ईरान यात्रा के दौरान कुछ समझौते हुए थे, जो मोदी-रोहानी युक्ति का परिणाम थे। इसके तहत चाबहार पोर्ट प्रोजेक्ट के लिए सहमति, बंदरगाह के विकास के लिए और स्टील रेल आयात करने के लिए 3000 करोड़ रुपए के क्रेडिट, और चाबहार जाहेदान रेलमार्ग के निर्माण के लिए सेवाओं पर स्वीकृति प्रमुख थी।

चाबहार दक्षिण पूर्व ईरान के सिस्तान-बलूचिस्तान प्रांत में स्थित एक बंदरगाह है। इसके जरिए भारत पाकिस्तान को दरकिनार कर अफगानिस्तान के लिए रास्ता बना सकता है।

ईरान के चाबहार बंदरगाह का भारत के लिए विशेष कूटनीतिक व रणनीतिक महत्व है। इस बंदरगाह के विकास के लिए मोदी-रोहानी के बीच सहमति हो चुकी है।

चूंकि अफगानिस्तान की कोई भी सीमा समुद्र से नहीं मिलती और भारत के साथ इस देश के सुरक्षा सम्बंध और आर्थिक हित हैं। चाबहार का इस दृष्टि से विशेष महत्व है। ईरान मध्य एशिया और हिंद महासागर के उत्तरी हिस्से में बसे बाजारों तक आवागमन आसान बनाने के लिए चाबहार बंदरगाह को एक ‘ट्रांजिट हब’ के तौर पर विकसित करने की योजना बना रहा है।

अरब सागर में पाकिस्तान ने ग्वादर पोर्ट के विकास के जरिए चीन को भारत के खिलाफ बड़ा सामरिक अड्डा उपलब्ध करा दिया है। इस स्थिति में चाबहार बंदरगाह को विकसित करते ही भारत को अफगानिस्तान और ईरान के लिए समुद्री रास्ते से व्यापार-कारोबार बढ़ाने का अवसर तो मिलेगा ही, चीन-पाकिस्तान सामरिक गठजोड़ को भी जवाब देने का अवसर प्राप्त हो जाएगा।

इस तरह से भारत ईरान के जरिए अफगानिस्तान के साथ सम्बद्ध होकर पाकिस्तान को उसी तरह से घेर सकता है जिस तरह से चीन पाकिस्तान के साथ मिलकर भारत को घेर रहा है। प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने रोहानी के साथ मिलकर इस दिशा में एक नई पहल की थी, अब चूंकि रोहानी पुन: सत्ता पाने में सफल हो गये हैं और उनका रुख पाकिस्तान के प्रति बेहद सख्त है, इसलिए यह उम्मीद की जा सकती है कि वे भारत के हितों के अनुकूल साबित होंगे।

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