राजनीतिक फलक पर तालिबान!

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भारत-पाकिस्तान-रूस-चीन-ईरान जैसे पड़ोसी देशों के साथ-साथ, पूरी दुनिया की निगाहें, इस वक्त अफगानिस्तान पर लगी हुई हैं। अमेरिका ने 2001 से अफगानिस्तान में मौजूद,अपने सैनिकों को अगले एक-डेढ़ साल में वापस बुलाने का फैसला कर लिया है। यह सहमति अमेरिका की तरफ से तालिबान से बातचीत कर रहे जल्माय खलीलजाद और तालिबान प्रतिनिधियों के बीच दोहा में हुई छह दिनी बैठक का नतीजा है।
इस बैठक में शांति प्रक्रिया का एक खाका तैयार किया गया है। कहा जा रहा है कि तालिबान ने अमेरिका को यह भरोसा दिया है कि वह अफगानिस्तान में अलकायदा, इस्लामिक इस्टेट जैसे संगठनों को प्रश्रय नहीं देगा। लेकिन इस पूरे बातचीत का सबसे कमजोर पहलू यह है कि अफगानिस्तान सरकार का कोई प्रतिनिधि वहां मौजूद नहीं था। ऐसा लगता है कि अमेरिका किसी जल्दीबाजी और आर्थिक दबाव में है। अमेरिका अफगानिस्तान में अपने सैनिक और खर्चे में कटौती करता रहा है। फोर्ब्स में प्रकाशित आंकड़ों के अनुसार, 2016 में अमेरिका का अफगानिस्तान में अपने सैनिकों पर खर्च 30.8 बिलियन डॉलर और 2017 में 5.7 बिलियन डॉलर रहा। साल 2010 में यह खर्च , 112. 7 बिलियन डॉलर तक था।
अफगानिस्तान से जब अमेरिका अपने सैनिक हटा लेगा और तालिबान की राजनीतिक प्रक्रिया में वापसी होगी तो एशिया में किस तरह के राजनैतिक-राजनयिक समीकरण बनेंगे, इसका कयास लगाया जा रहा है। क्या अमेरिका की गैर-मौजूदगी में रूस -चीन अफगानिस्तान में अपना दखल बढ़ाएंगे?

अफगानिस्तान में एक तबका अपनी सरकार के शांति -प्रक्रिया में शामिल नहीं होने को, आगे राजनीतिक अराजकता का खतरा मानता है। तो क्या, अफगानिस्तान में चार दशक से चले आ रहे युद्ध का अभी खात्मा नहीं होगा ? इस सवाल का उत्तर तो अमेरिकी सैनिकों की औपचारिक विदाई और तालिबान की राजनीतिक फलक पर वापसी के बाद ही पता चलेगा।

नए बनते हालत में, भारत-अफगानिस्तान और अफगानिस्तान -पाकिस्तान के रिश्तों पर क्या असर पड़ेगा? भारत ने तालिबान के 1990 के मध्य में बनी सरकार को मान्यता नहीं दी थी तो क्या तालिबान के राजनीतिक परिदृश्य पर उभरने पर,भारत,अफगानिस्तान में अपने निवेश पर पुर्निवचार करेगा? भारत और अफगानिस्तान के बीच 2017 में एक बिलियन डॉलर की विकास योजनाओं में साझेदारी का समझौता हुआ था। भारत दशकों से, अस्पताल-बांध-सड़क-कृषि-पानी- परिवहन-एयर कार्गो जैसी योजनाओं के द्वारा उसकी मदद करता रहा है। अभी भारत -अफगानिस्तान के बीच व्यापारिक साझेदारी लगभग 900 मिलियन डॉलर की है जिससे भारत-अफगानिस्तान दोनों को आयात -निर्यात का मौका मिलता है। एयर कार्गो की मदद से 2020 तक दोनों देश, इस साझेदारी को 2 बिलियन डॉलर तक पहुंचाना चाहते हैं। अफगानिस्तान में बदलते हालत को लेकर, भारत-रूस-चीन सजग हैं। इन तीनों देशों के विदेश मंत्रियों की जल्दी ही एक बैठक संघाई में होने का अनुमान है।
बहुमत में,अफगानिस्तान का आम-आवाम,भारत को एक स्वाभाविक दोस्त मानता है और शिक्षा-व्यापार-स्वास्थ्य सेवाओं के लिए भारत आना पसंद करता है लेकिन पूर्व में भारतीय दूतावास पर हमले और अफगानिस्तान में कार्यरत भारतीयों के अपहरण-हत्या जैसी घटनाएं,चुनौती भी पैदा करती रही हैं। पिछले महीने भी काबुल में एक गेस्ट हाउस पर हुए हमले में एक भारतीय की मौत हो गई थी। ऐसा कहा जा रहा है कि भारत पूर्व राष्ट्रपति हामिद करजई और कुछ अन्य सामुदायिक नेताओं के संपर्क में है ताकि बदलते हालत में, बातचीत के विकल्प खुले रहें।
अफगानिस्तान में एक तबका अपनी सरकार के शांति -प्रक्रिया में शामिल नहीं होने को, आगे राजनीतिक अराजकता का खतरा मानता है। तो क्या, अफगानिस्तान में चार दशक से चले आ रहे युद्ध का अभी खात्मा नहीं होगा ? इस सवाल का उत्तर तो अमेरिकी सैनिकों की औपचारिक विदाई और तालिबान की राजनीतिक फलक पर वापसी के बाद ही पता चलेगा।

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