भारत के अवांछित मेहमान!

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17वें करमापा जब साल 2000 में मात्र चौदह साल की उम्र में भारत आए, तो भारत सरकार ने उनकी गतिविधियों पर कुछ प्रतिबंध भी लगाया था। क्योंकि उस समय यह स्पष्ट नहीं था कि उनके आने की वजह भारत में शरण लेना ही है या फिर वे चीन की किसी योजना के तहत आए हैं? पुलिस ने गुप्त सूचना के आधार पर जब उनके ठहरने के स्थान पर छापा मारा, तो वहां से करोड़ों रुपये की राशि बरामद की गई। जब्त की गई इस राशि में भारतीय रुपये के अलावा अमेरिकी डॉलर और चीनी मुद्रा युआन समेत 26 देशों की मुद्राएं मिली थीं।

रमापा उर्गयेन त्रिनले दोरजी (17वें करमापा) भारत के लिए एक ऐसे अतिथि हैं, जिन्हें वांछनीय नहीं कहा जा सकता है। तिब्बती बौद्ध परंपरा के धार्मिक नेता करमापा हिमाचल प्रदेश के धर्मशाला में स्थित मैक्लोडगंज में आयोजित एक धार्मिक सम्मेलन में भाग लेना चाहते थे। वीजा के उनके आवेदन पर भारत सरकार ने पहले तो उन्हें वीजा देने से इनकार कर दिया। बाद में उन्हें सूचित किया गया कि उन्हें सशर्त वीजा दिया जा सकता है। हालांकि भारत सरकार के इस प्रस्ताव का करमापा ने कोई जवाब नहीं दिया।
करमापा को लेकर भारत सरकार इतना ठंडा रुख क्यों अपना रही है? इसकी एक अलग पृष्ठभूमि है। लेकिन करमापा के अतीत के बारे में चर्चा करने के पहले दो बातों पर ध्यान दिया जाना चाहिए। पहली बात तो यह कि भारत और चीन के राजनयिक संबंधों के लिए तिब्बत एक नाजुक विषय है। निर्वासित तिब्बती सरकार, जिसे केंद्रीय तिब्बती प्रशासन (सीटीए) के नाम से जाना जाता है, को धर्मशाला के मैक्लोडगंज में दलाई लामा द्वारा स्थापित किए जाने की बात को लेकर चीन कभी भी सहज नहीं रहा है। दूसरे, करमापा 14 साल की उम्र में तिब्बत से भाग कर भारत आए थे, तब उनके आगमन के बाद का घटनाक्रम काफी विवादित रहा था।

गत वर्ष मैं कुछ दिनों के लिए धर्मशाला के मैक्लोडगंज गया था। वहां मैंने मठ में भी कुछ समय व्यतीत किया। वहां आने वाले अधिकांश लोग सैलानी ही थे, जिनमें विदेशियों की संख्या काफी थी, जो मैक्लोडगंज को लेकर चीनी प्रशासन की उत्सुकता की वजह को जानने के लिए वहां पहुंचे थे। चीन केंद्रीय तिब्बती प्रशासन और मैक्लोडगंज में होने वाली हर बात पर अपनी पैनी नजर रखता है। इसकी एक वजह यह भी है कि तिब्बत से लगातार लोग छोटे-छोटे समूहों में गुप्त रूप से सीमा पार कर शरणार्थी के रूप में यहां पहुंचते रहते हैं। भारत में केंद्रीय तिब्बती प्रशासन तिब्बती शरणार्थियों के लिए विद्यालयों और सांस्कृतिक केंद्रों का संचालन करता है। सीटीए ने पहले ही स्पष्ट कर दिया है कि तिब्बत की आजादी का मुद्दा शांतिपूर्वक सुलझ जाने के बाद उसके अस्तित्व को समाप्त कर दिया जाएगा।

हालांकि दलाई लामा स्वीकार कर चुके हैं कि तिब्बत चीन का ही अंग रहेगा। लेकिन वे चाहते हैं कि तिब्बत को पूर्ण स्वायत्तता और तिब्बती संस्कृति तथा बौद्ध धर्म के संरक्षण और संवर्द्धन की गारंटी मिलनी चाहिए।
करमापा उर्गयेन त्रिनले दोरजी जब साल 2000 में मात्र चौदह साल की उम्र में भारत आए, तो भारत सरकार ने उनकी गतिविधियों पर कुछ प्रतिबंध भी लगाया था। क्योंकि उस समय यह स्पष्ट नहीं था कि उनके आने की वजह भारत में शरण लेना ही है या फिर वे चीन की किसी योजना के तहत आए हैं? सच तो यह भी है कि पुलिस ने गुप्त सूचना के आधार पर जब उनके ठहरने के स्थान पर छापा मारा, तो वहां से करोड़ों रुपये की राशि बरामद की गई। जब्त की गई इस राशि में भारतीय रुपये के अलावा अमेरिकी डॉलर और चीनी मुद्रा युआन समेत 26 देशों की मुद्राएं मिली थीं, जिनकी कीमत तब लगभग छह करोड़ रुपये के बराबर थी।

कौन हैं करमापा?
तिब्बती परंपरा में करमापा का अर्थ है बुद्ध के कार्यों का मूर्त रूप में संचालन करना। जो व्यक्ति बुद्ध की गतिविधियों का संचालन करने के लिए अवतार ग्रहण करता है उसे ही करमापा कहा जाता है। तिब्बती मान्यता के मुताबिक बौद्ध परंपरा के महान और प्रबुद्ध संत जीव जगत की भलाई में अपनी गतिविधियों को लगातार जारी रखने के लिए होशो हवास में ही अपने पुनर्जन्म या अगले अवतार का निर्धारण करने में सक्षम होते हैं। करमापा भी उसी श्रेणी के बौद्ध संत माने जाते हैं। इस परंपरा में पहले करमापा दुसुम ख्येन्पा का जन्म 1110 ईस्वी में हुआ था। तिब्बती बौद्ध गुरुओं की आविर्भाव परंपरा के वे पहले संत थे। 1193 में उनके देहांत के बाद उनके बाद के सभी करमापा का आविर्भाव पुनर्जन्म के रूप में होता रहा है। पहले करमापा दुसुम ख्येन्पा के बाद अभी तक 16 करमापा हो चुके हैं। इन्होंने तिब्बत में बौद्ध उपदेशों और बौद्ध मत के संरक्षण तथा उसके प्रचार में प्रमुख भूमिका निभाई है।
17वें करमापा उर्गयेन त्रिनले दोरजी के बारे में कहा जाता है कि जून 1985 में पूर्वी तिब्बत के ल्हाटोक क्षेत्र में एक खानाबदोश परिवार के घर में उनका जन्म हुआ था। बताते हैं कि उनके जन्म के महीना भर पहले से ही उसकी मां को सुखद और विलक्षण सपने आते थे। जिस दिन इस बालक का जन्म हुआ, उस दिन जिस टेंट में उनका जन्म हुआ, वहां एक कोयल आकर बैठ गई थी। उनके जन्म के वक्त वहां रहने वाले आसपास के कई लोगों ने रहस्यमयी शंख ध्वनि सुनी, जो पूरी घाटी में गुंजायमान हो रही थी। वहां की परंपरा में ऐसी घटनाओं को किसी प्रबुद्ध संत या अवतारी पुरुष के जन्म का मंगलसूचक लक्षण माना जाता है।

सुरक्षा अधिकारियों ने तब 24 घंटे की अवधि में ही करमापा के मठ समेत कई ठिकानों पर छापेमारी की थी। इस संबंध में उन्हें कई बार पूछताछ का भी सामना करना पड़ा। करमापा फिलहाल भारत में नहीं हैं और उन्होंने डोमिनिकन रिपब्लिक की नागरिकता ले ली है। एक तिब्बती प्रकाशन ने उनके बारे में लिखा है कि करमापा को भारत आए 18 साल हो गए हैं, लेकिन एक साल से अधिक समय से वे अन्य देशों, विशेष रूप से अमेरिका में रह रहे हैं। यह उनके लिए काफी कठिन समय रहा है। स्वास्थ्य संबंधी पीड़ा के साथ ही तमाम परेशानियों की वजह से उपजे तनाव के कारण करमापा के लिए ये दिन काफी कठिन रहे हैं। करमापा ने उक्त प्रकाशन को बताया कि उन्हें लगता है कि उन्होंने अमेरिका में अपनी जिंदगी का सबसे कठिन समय व्यतीत किया है। डोमिनिकन रिपब्लिक की नागरिकता लेने की वजह का खुलासा करते हुए उन्होंने कहा है कि यद्यपि भारत सरकार तिब्बतियों को परिचय प्रमाणपत्र देती है, लेकिन इस प्रमाणपत्र की हैसियत पासपोर्ट जैसी नहीं होती है। इस कागजात की मदद से अन्य देशों की यात्रा करना लगातार कठिन होता जा रहा है। क्योंकि कई देश इसे मान्यता देने से स्पष्ट इनकार करते हैं।

वस्तुत: करमापा को उनके सहयोगियों और समर्थकों ने डोमिनिकन रिपब्लिक की नागरिकता लेने की सलाह दी थी। ऐसा करने से उन्हें उस देश के पासपोर्ट के रूप में अंतरराष्ट्रीय स्तर पर मान्य एक दस्तावेज भी हासिल हो गया। इस प्रकाशन के मुताबिक तिब्बती परंपरा के कई वरिष्ठ लामा पहले भी विदेशी नागरिकता ले चुके हैं ताकि वे अपनी धार्मिक गतिविधियों के लिहाज से सुविधापूर्वक अन्य देशों की यात्रा कर सकें। दलाई लामा भी करमापा को डोमिनिकन रिपब्लिक के नागरिक के रूप में मान्यता दे चुके हैं। बौद्ध धर्म के जानकारों के मुताबिक भारत में बौद्ध परंपरा के तहत करमापा की हैसियत दलाई लामा के बाद दूसरे नंबर की मानी जाती है।

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