पूरब के विजयी मित्र से भारत की उम्मीदें

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बांग्लादेश की प्रधानमंत्री शेख हसीना ने भारत के खिलाफ आतंकी व अलगाववादी गतिविधियां चलाने वाले शिविरों के विरुद्ध निर्णायक कार्रवाई की। यही वजह है कि दोनों देशों की सुरक्षा संस्थाओं के बीच विभिन्न स्तरों पर संतोषजनक संयोजन स्थापित हुआ है। लेकिन चीन लगातार इन संबंधों में सेंध लगाने की कोशिश कर रहा है। उससे सतर्क रहने की जरूरत है। दोनों देशों का इसका एहसास भी है।

भारत के पड़ोसी बांग्लादेश में हुए आम चुनावों में शेख हसीना वाजेद की पार्टी को बड़ी जीत हासिल हुयी। वह एक बार पुन: सत्ता पर कब्जा करने में सफल हो गयी हैं। बांग्लादेश के लिए महत्वपूर्ण तथ्य यह है कि परम्परागत बांग्लादेशी राजनीति में यह ‘बेगमों’ की लड़ाई थी जिसमें खालिदा जिया की राजनीति लगभग खत्म हो गयी। अपेक्षाकृत उदार स्वभाव तथा भारत के प्रति मैत्री भाव रखने वाली शेख हसीना स्थापित हो गयीं। शेख हसीना की पार्टी अवामी लीग ने अपने सहयोगियों के साथ मिलकर तीन चौथाई बहुमत हासिल कर लिया।
बांग्लादेश हमारा ऐसा पड़ोसी है, जो लम्बे समय तक (जनरलों और बेगम खालिदा जिया के शासनकाल में) पाकिस्तान की गिरμत में रहा पाकिस्तान इसका प्रयोग भारत के खिलाफ अलगाववादी गतिविधियों को संचालित करने में किया। अब बांग्लादेश भारत के लिए एक अहम पड़ोसी और रणनीतिक साझेदार बनने की ओर अग्रसर है। ऐसे में प्रश्न यह उठता है कि शेख हसीना चौथी बार बांग्लादेश की सत्ता हासिल करने के पश्चात भारत के प्रति नजरिया बदलेगा या फिर और उदार एवं सहयोगात्मक होगा?

प्रथम दृष्टया शेख हसीना की जीत को भारत कूटनीतिक उपलब्धि के रूप में देख सकता है। कारण यह है कि शेख हसीना वाजेद का भारत के प्रति अधिक मैत्रीपूर्ण रवैया रहा है जिसके चलते भारत ने पूर्वोत्तर के साथ जुड़ाव बनाने तथा परम्परागत चुनौतियों का सामने करने में सफलता अर्जित की है। इसके विपरीत बीएनपी और खालिदा जिया कट्टरपंथ एवं पाकिस्तान के समर्थक रहे हैं। खालिदा जिया का ढर्रा वही रहा जो उनके पति जियाउर रहमान का रहा था। परिणाम यह हुआ था कि उनके समय में पाकिस्तान की खुफिया एजेंसी आईएसआई ने बांग्लादेश के कट्टरपंथियों के साथ मिलकर ‘आॅपरेशन पिनकोड’ शुरू किया जिसका उद्देश्य भारत के सीमांत जिलों में जनसांख्यिकीय असंतुलन व विभाजन कराकर ‘ग्रेटर बांग्लादेश’ का निर्माण करना था। अवैध बांग्लादेशी घुसपैठियों की बड़ी संख्या इसी मिशन का हिस्सा थी।
भारत और बांग्लादेश के बीच सम्बंधों में नया उत्साह तब आया जब प्रधानमंत्री मोदी की ढाका यात्रा सम्पन्न हुयी।

बांग्लादेशी प्रधानमंत्री शेख हसीना के साथ सम्पन्न हुयी बातचीत के पश्चात 6 जून, 2015 को ‘नोतुन प्रोजोन्मो’ यानि ‘नई दिशा’ नाम से संयुक्त घोषणा जारी किया गया जिसमें 22 समझौतों पर हस्ताक्षर किए गये थे। इनमें सबसे महत्वपूर्ण था – भारत तथा बांग्लादेश के बीच भूमि सीमा समझौता, 1974 और भूमि-सीमा समझौता संबंधी प्रोटोकॉल, 2011 के बारे में अनुसमर्थन के साधन के आदान-प्रदान के लिए प्रोटोकॉल। इसके अतिरिक्त ढाका-शिलांग-गुवाहाटी बस सेवा पर समझौता और सम्बंधित प्रोटोकॉल, कोलकाता-ढाका-अगरतला बस सेवा पर समझौता और सम्बंधित प्रोटोकॉल, अंतर्देशीय जलमार्ग ट्रांजिट और व्यापार पर प्रोटोकॉल (नवीनीकरण), 2 अरब डॉलर की नई क्रेडिट लाइन और भरत से माल की आवाजाही के लिए चिटगांग (चटगांव), मोंगला बंदरगाहों के इस्तेमाल पर भारत और बांग्लादेश के बीच समझौता तथा बंगाल की खाड़ी और हिंद महासागर में समुद्री सहयोग पर भारत और बांग्लादेश के बीच एमओयू हुआ।

इसके बाद जब बांग्लादेश की प्रधानमंत्री शेख हसीना भारत आयीं तो प्रधानमंत्री मोदी ने उनका जिस तरह से स्वागत किया, वह वास्तव में ‘सबसे अहम पड़ोसी’ जैसा था। इस दौरान भारत-बांग्लादेश सुरक्षा संबंधों को और मजबूत करने के भी प्रयास हुए। शेख हसीना ने निर्णायक भूमिका निभायी है विशेषकर भारत के खिलाफ आतंकी व अलगाववादी गतिविधियां चलाने वाले कैम्पों के विरुद्ध कार्रवाई करके। यही वजह है कि दोनों देशों की सुरक्षा संस्थाओं के बीच विभिन्न स्तरों पर संतोषजनक संयोजन स्थापित हुआ है। लेकिन चीन लगातार इन सम्बंधों में सेंध लगाने की कोशिश कर रहा है।
अब भारत के लिए आवश्यक है कि वह बांग्लादेश में चीनी हितों को काउंटर करने के लिए कुछ मूलभूत कदम उठाए। चूंकि प्रधानमंत्री मोदी ट्रांस-रीजनल सहयोग, अर्थात बीबीआइएन (बांग्लादेश-भूटान-भारत-नेपाल) और बिम्सटेक (बहु क्षेत्रीय तकनीकी और आर्थिक सहयोग के लिए बंगाल की खाड़ी वाले देशों की पहल) के तहत सार्क को पुनर्जीवित करने की इच्छा रखते हैं। इसलिए भारत से ऐसी अपेक्षाएं बढ़ जाती हैं। ध्यान रहे कि हमारा पूर्वोत्तर क्षेत्र बीबीआइएन का प्रमुख घटक और ग्रिड कनेक्टिविटी के जरिए बीबीआइएन के देश बिजली के मामले में अपेक्षित सहयोग कर रहे हैं। इसके बदले बांग्लादेश भारत के पूर्वोत्तर क्षेत्र में इस्तेमाल के लिए 10 जीबीपीएस इंटरनेट बैंडविथ प्रदान करने पर सहमत है। इसी प्रकार से ये देश सड़क और रेल कनेक्टिविटी की ओर बढ़ रहे हैं जिससे पूर्वोत्तर में एक नयी गतिकी देखने को मिल सकती है और प्रधानमंत्री की एक्ट ईस्ट नीति सार्थक परिणामों की ओर बढ़ सकती है।

लेकिन अभी तीस्ता नदी जल बंटवारे सम्बंधी मुद्दा दोनो के देशों के सम्बंधों में एक दीवार की तरह खड़ा है। दरअसल नदी जल विवाद की बुनियाद इतिहास में निहित है, इसलिए इतना जल्दी इस मामले में किसी हल तक पहुंचना मुश्किल है। तीस्ता गंगा, ब्रह्मपुत्र और मेघना (जीबीएम) नदी तंत्र के बाद भारत-बांग्लादेश के बीच में बहने वाली चौथी सबसे बड़ी ट्रांसबाउंड्री नदी है। 414 किमी लम्बी यह नदी सिक्किम से निकलती है जिसका 151 किमी हिस्सा सिक्किम में, 142 किमी हिस्सा पश्चिम बंगाल होते हुए सिक्किम-पश्चिम बंगाल सीमा पर है और 121 किमी बांग्लादेश में है। 1971 के बाद ही भारत और बांग्लादेश ने ट्रांसबाउंड्री वाटर मुद्दे पर वार्ता शुरू की।

इस उद्देश्य से 1972 में भारत और बांग्लादेश ने संयुक्त नदी आयोग का गठन किया गया। आरम्भ में गंगा पर फरक्का बांध, मेघना और ब्रह्मपुत्र पर अच्छी पहलें हुयीं। गंगा जल संधि 1996 में सम्पन्न होने के बाद तीस्ता दोनों देशों के मध्य जल बंटवारे के मुख्य नदी बन गयी। हालांकि 1983 में एक तदर्थ (एडहॉक) समझौता हुआ था जिसके तहत बांग्लादेश को 36 प्रतिशत और भारत को 39 प्रतिशत पानी मिलना था जबकि शेष 25 प्रतिशत मुक्त बहाव के लिए रहना था।
वर्ष 2000 में बांग्लादेश ने तीस्ता पर एक ड्राμट पेश किया जिसे भारत और बांग्लादेश ने वर्ष 2010 में स्वीकार भी किया। वर्ष 2011 में भारतीय प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह की ढाका यात्रा के दौरान जल साझेदारी का नया फार्मूला पेश किया गया। नरेन्द्र मोदी सरकार ने भी नये फार्मूले को स्वीकार किया है लेकिन ममता बनर्जी ने इसे पहले की तरह अस्वीकार कर दिया। फिलहाल बांग्लादेश एक ऐसा राष्ट्र है जो संक्रमण से स्थायित्व की ओर बढ़ रहा है। ऐसी स्थिति में उसे आर्थिक, कूटनीतिक और रक्षा सम्बंधी सहयोग की आवश्यकता है।

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