पाक जेल से लौटे हामिद बोलेशुक्रिया भारत मां

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ठारह दिसंबर, 2018 को पूरे 2,232 दिन (हामिद की मां को यह आंकड़ा भलीभांति याद है) बाद अमृतसर स्थित ज्वाइंट चेक पोस्ट पर अटारी बीएसएफ के हवाले किए गए हामिद निहाल अंसारी और भारत स्थित उनके परिवार की खुशी का ठिकाना नहीं था। हामिद सहित पूरे परिवार ने झुककर भारत की धरती को चूमा। पूरा परिवार गले लगकर फूट-फूटकर रोया। क्योंकि छह साल तक पाकिस्तान की विभिन्न जेलों में रहे हामिद को अब बेहिसाब कष्टों से छुटकारा मिल चुका था। अब वह अपने घर आ चुका था। फिर अमृतसर से पूरा परिवार दिल्ली पहुंचा। वहां अपनी मां फौजिया के साथ विदेश मंत्री सुषमा स्वराज से मिलने गए हामिद की आंखों से फिर आंसू झरने लगे। सुषमा स्वराज से उसने ‘सॉरी’ (गलती मानी) बोला तो सुषमा ने उसे गले लगा लिया। हामिद सुषमा स्वराज का शुक्रिया अदा करते हुए कहते हैं कि उन्होंने मुझे भारत का बच्चा समझा, अपना बच्चा समझा, और भारत लाने में मदद की। हामिद तो उन्हें अपनी ओर से ‘मदर इंडिया’ का खिताब तक देने में नहीं हिचकते।

मुंबई के बैंकर पिता एवं एक स्कूल में वाइस प्रिंसिपल मां का बेटा हामिद निहाल अंसारी सॉμटवेयर इंजीनियर होने के साथ-साथ एमबीए भी है। तब उसकी उम्र 26 वर्ष रही होगी, जब इंटरनेट पर फेसबुक चैट करते हुए उसकी पहचान पाकिस्तान के खैबर पख्तून क्षेत्र के एक छोटे से शहर कोहट की रहनेवाली एक लड़की से हो गई। बात करते-करते दोनों के जज्बात जुड़ते गए। हामिद ने उससे शादी का फैसला भी कर लिया। लेकिन बात पारिवारिक माध्यमों से आगे बढ़ पाती, उससे पहले ही हामिद को पता चला कि उसकी माशूका की शादी उसके परिवार वाले कहीं और करना चाहते हैं। हामिद की इस फेसबुकिया चैट में पाकिस्तान के उसी क्षेत्र के रहनेवाले कुछ और लोग भी जुड़ गए थे। वे हामिद को लगातार पाकिस्तान आकर उस लड़की को बचाने के लिए उकसाने लगे। हामिद ने अपने परिवार को बताए बगैर दिल्ली स्थित पाकिस्तानी दूतावास में वीजा के लिए आवेदन कर दिया। लेकिन 10 माह तक न तो उसे वीजा मिला, न ही कोई संतोषजनक उत्तर। उधर पाकिस्तान स्थित उसके तथाकथित ‘दोस्त’ उसे बार-बार उकसाने में लगे थे, कि तुम नहीं आओगे तो लड़की की शादी उसकी मर्जी के बिना कहीं और कर दी जाएगी।

हामिद को पाकिस्तान आने के लिए उकसानेवालों ने ही उसे अफगानिस्तान के रास्ते वहां पहुंचने का रास्ता भी बताया। जैसे चूहेदानी में रोटी का एक सूखा टुकड़ा लटकाकर चूहे को फंसाया जाता है, बिल्कुल उसी तरह एक लड़की के बहाने उसे पाकिस्तान बुलाया जाता रहा। और हामिद फंस भी गया। परिवार को काबुल में नौकरी लगने की बात कहकर वह चार नवंबर 2012 को अफगानिस्तान जा पहुंचा। उसे फंसानेवालों ने उसे कोहट तक पहुंचने का सही रास्ता भी बता दिया । वह पाकिस्तान-अफगानिस्तान सीमा स्थित तोरखाम होते हुए सीमावर्ती कस्बे कोहाट पहुंच गया। वहां उसे पाकिस्तान का फर्जी परिचयपत्र भी उन लोगों ने ही मुहैया कराया। लेकिन जिस लड़की से मिलने के लिए वह गया था, उससे मुलाकात हो पाती, उसके पहले ही गुप्तचर एजेंसियों को उसके वहां होने की सूचना भी दे दी। कोहाट के एक गेस्टहाउस से हामिद को गिरμतार कर लिया गया।

हामिद का रोमांस और रोमांच यहीं से दर्द की दास्तान में बदल जाता है। पहले कुछ दिन तो उसे कोहट की ही एक जेल में रखा गया। फिर उसे पेशावर की एक खुफिया जेल में भेज दिया गया। यह जेल जमीन से करीब 15 फुट नीचे बनी है। जहां दिन और रात का पता ही नहीं चलता। हामिद के शब्दों में इसे ‘काल कोठरी’ ही कहा जा सकता है। इस काल कोठरी में हामिद को करीब सवा तीन साल रहना पड़ा। यहां उसे ऐसे-ऐसे जुल्म सहने पड़े, जिसकी कल्पना भी नहीं की जा सकती। पिटाई ऐसी कि की कई बार मुंह से खून निकल आया। बेहोश हो गए। यहां तक बाईं आंख का रेटिना तक फट गया। हामिद बताते हैं कि एक बार कड़कड़ाती सर्दियों में पूरे एक सप्ताह उसे आंखों में पट्टी बांधकर लगातार खड़ा रखा गया। जैसे ही झपकी आती, किसी भी तरफ से उसके किसी भी अंग पर प्रहार हो जाता। एक हμते बाद जब आंखों से पट्टी खुली तो शरीर चेतनाशून्य हो चुका था। उस काल कोठरी में भी उसे झरने, पहाड़ और चहकते परिंदे दिखाई दे रहे थे।
चेतना लौटी तो किसी अधिकारी ने उसे बताया कि अब तो उसकी मुसीबत समाप्त होनेवाली है। उसे दो-तीन माह की सजा सुनाई जाएगी। फिर वह अपने देश वापस जा सकेगा। लेकिन यह भी एक ख्वाब भर था। कुछ माह बाद फिर नए अधिकारी का आना, और जुल्म के नए अध्याय का शुरू होना पूरे सवा तीन साल तक जारी रहा। उस पर मुकदमा भी चला, तो किसी अदालत में नहीं। हामिद के अनुसार उसी कालकोठरी में मेज-कुर्सी लगाकर एक अदालत बना दी गई और उसे तीन साल की सजा सुना दी गई। उस पर आरोप था पाकिस्तान का फर्जी परिचयपत्र रखने का। यहां यह याद करना प्रासंगिक होगा कि 26 नवंबर, 2008 को मुंबई पर हुए आतंकी हमले के एकमात्र जिंदा पाकिस्तानी आतंकी अजमल कसाब को निचली अदालत से सर्वोच्च न्यायालय तक अपना बचाव करने का मौका दिया गया और हर अदालत में उसे वकील भी उपलब्ध कराया गया था। सजा सुनाए जाने के बाद उसे काल कोठरी नुमा खुफिया जेल से निकालकर पेशावर सेंट्रल जेल भेज दिया गया। वहां स्थिति थोड़ा बेहतर थी। पेशावर सेंट्रल जेल में उससे कभी सख्त काम लिए जाते, तो कभी हल्के-फुल्के। चूंकि वह पढ़ा-लिखा था, इसलिए कभी-कभी उससे लिखने-पढ़ने का भी काम लिया जाता था।

इधर हामिद के काबुल से गायब होने के बाद परिवारीजनों के लिए परेशानी का दौर शुरू हुआ। उसे पाकिस्तान से छुड़ाने में अहम भूमिका निभानेवाले वरिष्ठ पत्रकार जतिन देसाई बताते हैं कि जनवरी 2016 तक तो किसी को यही पता नहीं था कि वह कहां और किस हालत में है? चूंकि काबुल रवाना होने से पहले उसने मुंबई में अपने कुछ जाननेवालों से एक पाकिस्तानी लड़की से अपने प्रेम-संबंध की चर्चा भर की थी, और फिर अचानक काबुल निकल गया था। इसलिए यह अनुमान लगाया जा रहा था कि वह पाकिस्तान में हो सकता है। जतिन देसाई पाकिस्तान-इंडिया पीपुल्स फोरम फॉर पीस एंड डेमोक्रेसी से जुड़े हैं और यह संगठन दोनों देशों की जेलों में बंद एक-दूसरे के नागरिकों को छुड़ाकर उनके देश भेजने के लिए प्रयत्नशील रहता है। इसलिए वह लगातार अपने पाकिस्तानी संपर्कों से हामिद का पता लगाने का प्रयास कर रहे थे। उन्हीं के संपर्कों से पाकिस्तान में एडवोकेट काजी अनवर और रुक्सानंदा नाज भी हामिद का पता लगा रहे थे। हामिद को तीन साल की सजा होने के बाद पाकिस्तान ने माना कि वह उसके कब्जे में है।

तब भारत सरकार की तरफ से भी उसे कानूनी मदद मुहैया कराने और भारत लाने के प्रयास शुरू हुए। भारत सरकार की तरफ से पाकिस्तानी अधिकारियों को 95 पत्र लिखे गए। कुछ ही दिन पहले गुरुनानक देव की 550वीं जयंती के अवसर पर करतारपुर सीमा खोले जाने के समारोह में पाकिस्तान गई भारतीय पत्रकारों में टीम में शामिल रहे पत्रकार राजदीप सरदेसाई ने उस अवसर का लाभ उठाकर पाकिस्तानी प्रधानमंत्री इमरान खान से हामिद अंसारी की रिहाई के बारे में पूछा। इमरान को कोई जानकारी नहीं थी। लेकिन उन्होंने जानकारी हासिल कर जरूरी कदम उठाने का आश्वासन जरूर दिया। इसी बीच 16 दिसंबर, 2018 को हामिद की तीन साल की सजा भी पूरी हो गई। भारत की तरफ से उसकी रिहाई का दबाव पहले से बनाया जा रहा था। इसलिए एक सुबह अचानक पेशावर जेल के डिप्टी सुपरिंटेंडेंट अचानक हामिद के पास पहुंचे और उसे आधे घंटे में तैयार हो जाने की सूचना दी। उसकी रिहाई का फैसला हो चुका था।

हामिद की मां फौजिया बताती हैं कि हामिद के गायब होने के कुछ दिनों बाद ही उनका परिवार उमरा (मुस्लिमों का एक तीर्थ) करने गया था और वहां हामिद की वापसी की मन्नत मांगकर आया था। उन्हें उम्मीद थी कि बेटा वापस जरूर आएगा। संयोग देखिए कि खुफिया जेल की अपनी कैद के उन्हीं दिनों में परिवार के साथ उमरा जाने का स्वप्न हामिद को भी आया। हामिद उस स्वप्न को याद करते हुए कहते हैं कि जब हमें गिरμतार किया गया, तभी हमने वापसी की उम्मीद छोड़ दी थी। लेकिन जुल्म के उसी दौर में उन्हें एक स्वप्न आया कि वह अपने परिवार के साथ उमरा करने जा रहे हैं। तभी से उन्हें वापसी की उम्मीद बंध गई थी।

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