‘पहले पड़ोसी’ की नीति सफल

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साल 2018 का अंत विदेश नीति के राडार पर सफल माना जाएगा। कई परिवर्तन हुए जिनसे भारत की छवि को बेहतर बनाने में मदद मिली। मोदी सरकार आने के बाद शुरू में ऐसा लगा था कि श्री लंका, नेपाल, मालदीव और अन्य पड़ोसी देश भारत से दूर हो रहे हैं लेकिन वर्षांत में श्री लंका, मालदीव और बांग्लादेश में जो राजनीतिक परिवर्तन हुए, उनसे भारत की स्थिति बेहतर हुई। ऐसा लगने लगा है कि चीन की चाल भारत के पड़ोसी देशों में सफल नहीं हो पा रही है।
भारत के लिए यह सब कुछ होना अत्यंत जरूरी था। हालांकि इमरान खान के पदारूढ़ होने के बाद पाकिस्तान में भारत विरोध की गूंज है। भारत ने स्पष्ट कह दिया है कि पाकिस्तान से किसी भी तरह की बातचीत संभव नहीं है जब तक पाकिस्तान आतंकी गतिविधियों पर रोक नहीं लगाता। चीन के साथ पाकिस्तान की धींगामुश्ती बढ़ती जा रही है।
अंतरराष्ट्रीय स्तर पर हो रहे परिवर्तनों के कारण भारत के लिए नई चुनौतियां मुंह बाए खड़ी हैं। रूस, चीन और पाकिस्तान एक सामरिक जोड़ तोड़ में हैं। भारत के साथ अमेरिका और जापान है लेकिन अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रम्प की अविश्वसनीय सोच से भी भारत तंग है। इसलिए भी भारत को शक्ति पर भरोसा करना होगा। प्रश्न यहां पर ‘पहले पड़ोसी’ की नीति को और दुरुस्त करने की जरूरत है। भारत की विदेश नीति कई दशकों से पड़ोसी देशों के बीच दो तत्वों से प्रभावित होती रही है। पहला, उस देश की राजनीतिक विचारधारा। दूसरा, भारत के संघीय समीकरण।
मसलन श्री लंका की समस्या तमिलनाडु की राजनीति से प्रभावित होती है तो बांग्लादेश देश के साथ संबंध पश्चिम बंगाल और उत्तर पूर्वी राज्यों के राजनीतिक कारकों से। नेपाल का मधेसी समीकरण बिहार और उत्तर प्रदेश की राजनीति से झुलसता है। अंतत: इसका असर भारत की विदेश नीति पर पड़ता है। प्रधानमत्री मोदी की ‘पहले पड़ोसी’ वाली सोच गुजराल सिद्धांत और नेहरू की सोच से अलग है। यहां पर न केवल सम्मान और यथोचित समानता की बात की जाती है बल्कि आर्थिक रूप से जोड़कर एक शक्ति पुंज तैयार करने की योजना भी है, जिसके द्वारा भारतीय उपमहाद्वीप के बाहर की शक्तियों को घुसने का अवसर नहीं प्रदान करे। शीत युद्ध के दौरान अमेरिका और उसके बाद चीन निरंतर भारत के पड़ोसी देशों के बीच घुसपैठ बनाने की जुगत में रहे हैं। इसके लिए भारत को और प्रयास करने होंगे।
कई गलतियां भी हुई हैं। उन्हें दुरुस्त करने की जरूरत है। 2016 के बाद से नेपाल की राजनीति दो समुदायों में बंट गयी। पहाड़ी और मधेसी के बीच। मधेसी मुख्यत: भारत समर्थक हैं, लेकिन सत्ता की बागडोर पहाड़ियों की पकड़ में है। ऐसा पहले नहीं था कि पहाड़ी समुदाय चीन के भक्त थे, उनका चीन के साथ न तो धार्मिक लगाव है और न ही सांस्कृतिक जुड़ाव।
नेपाली कांग्रेस को हमने अपना समझा और अन्य पार्टियों के साथ एक निश्चित दूरी बना ली। इसका फायदा चीन ने उठाया और पहाड़ी लोगों के बीच भारत विरोधी बीज बो दिए। उसके बाद से नेपाल की राजनीति को हम दलीय राजनीति के आईने से देखने लगे जो भारत की लिए उचित नहीं था। दूसरी गलती विभिन्न योजनाओं की गति बहुत ही धीमी रही है, जिसका त्वरित लाभ चीन को हुआ। भारत की सरकार ने 2018 में अपनी योजनाओं की रμतार बढ़ाई है। नेपाल में चीन के विस्तार को रोकने का एक मात्र रास्ता भी यही हो सकता है।
श्रीलंका की कहानी भी यही है। सिंघली समुदाय को भारत विरोधी मान लिया गया। तमिल उत्पीड़न की वजह से हम वहां के जातीय युद्ध का हिस्सा बन गए। अब जरूरत है इस सोच को बदलने की। चीन की कोशिश श्री लंका की राजनीतिक व्यवस्था को न केवल तोड़ना था बल्कि उसे पंगु बनाकर अपने हाथों की कठपुतली की तरह नचाना भी था। उस समीकरण पर कोर्ट ने रोक लगा दी है। श्री लंका में चीन के राजदूत ने सफाई देते हुए कहा था कि चीन किसी भी देश की अंदरूनी राजनीति में हस्तक्षेप नहीं करता। अब चीन की चाल दुनिया के देशों को समझ में आने लगी है।
श्रीलंका की अहमियत उसकी भौगोलिक स्थिति से जुड़ी हुई है। 1980 के दशक में भारत की शांति सेना श्रीलंका में इसलिए भेजी गयी थी कि कोई भी बाहरी शक्ति वहां अपनी पैठ न बना सके। चीन इस जुगत में है कि वहां की राजनीति को अपनी गिरμत में लेकर उनका सैनिक इस्तेमाल करे। चीन की सैनिक पनडुब्बी ने पिछले साल ही कोलंबो बंदरगाह पर अपना ठिकाना बनाने की कोशिश की थी जिसे प्रधानमत्री विक्रमसिंघे ने मना कर दिया था। भूटान, भारत का विशेष पड़ोसी देश है।
2008 के समझौते के अनुसार विदेश नीति और सुरक्षा के मसले पर भारत उसकी मदद करता है। दोकलाम विवाद के जख्म अभी भरे नहीं हंै कि भारत के विदेश विभाग द्वारा बौद्ध गुरु करमापा के सन्दर्भ में कुछ तीखे शब्दों का इस्तेमाल किया गया है जो भारत के लिए सुकूनदायक नहीं है। करमापा को न केवल दलाई लामा के बाद दूसरे सबसे महत्वपूर्ण धार्मिक गुरु का दर्जा मिला है बल्कि अरुणाचल से लेकर लद्दाख तक उनकी प्रतिष्ठा है। इस बात की भी उम्मीद है कि दलाई लामा के नहीं रहने की स्थिति में करमापा ही तिब्बतियों के सबसे बड़े गुरु होंगे। ऐसे में भारत को सोच विचार कर अपनी बातों को रखना होगा।
अफगानिस्तान में भी रूस और चीन की मिलीभगत के कारण समीकरण बदल रहे हैं। प्रधानमंत्री की पहले पड़ोसी की नीति ने चीन के जाल को कुतरने की कोशिश की है। उसे और जर्जर करने की जरूरत है। भारत का वैश्विक कद पिछले करीब 5 सालों में बढ़ा है। फ्रांस और जापान हमारे बेहतर सहयोगी बने हैं। भारत-प्रशांत में हमारी पहुंच मजबूती के साथ दर्ज हुई है। आसियान के कुछ देशों के साथ आर्थिक-सामरिक समीकरण और बेहतर हुआ है। लेकिन भारत की विदेश नीति की सफलता, विशेषकर मोदी की नयी सोच का मुआयना मुख्यत: पहले पड़ोसी के आधार पर ही होगा। चीन की शक्ति जितनी छिन्न भिन्न होगी, भारत की पकड़ उतनी मजबूत बनेगी।
जिस तरीके से श्रीलंका और बांग्लादेश ने चीन की पनडुब्बियों को अपने बंदरगाह में पनाह देने से मना कर दिया, वह भारत की सफलता का सूचक है। अगर पहले पड़ोसी की नीति आने वाले समय में इसी तरह चलती रही तो भारतीय उपमहाद्वीप की शक्ल बदल जाएगी। न केवल चीन की घुसपैठ थमेगी बल्कि भारत के साथ पड़ोसी देशों का आर्थिक सम्बन्ध भी सघन हो जाएगा। यही एक मात्र फार्मूला है विदेश नीति को सार्थक बनाने का।

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