नाभिकीय हथियारों की नई प्रतिस्पर्धा

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मेरिका का राष्ट्रपति बनने के बाद डोनाल्ड ट्रम्प ने अमेरिका की विदेश नीति में जो परिवर्तन किए हैं उनमें सबसे महत्वपूर्ण रूस से मध्यम दर्जे की नाभिकीय मिसाइलों को लेकर हुई संधि को निरस्त करना है। अमेरिका का रूस पर आरोप है कि वह संधि का पालन नहीं कर रहा था। रूस ने अमेरिका के इस आरोप को सरासर झूठ बताया है। अमेरिका की संधि निरस्त करने की घोषणा के अगले ही दिन रूस ने भी घोषित कर दिया कि उसके लिए अब इस संधि का कोई मतलब नहीं रह गया। उसके बाद रूस ने अपने नाभिकीय भंडार को बढ़ाने और अजेय नाभिकीय हथियार विकसित करने का भी संकल्प घोषित किया। अपने उसी संकल्प के अंतर्गत उसने ध्वनि से भी पांच गुनी गति से मार करने वाले मिसाइल विकसित करने का इरादा व्यक्त किया है, जो किसी के लिए भी अभेद्य होगी। अभी अमेरिकी विशेषज्ञ रूस की इस घोषणा को गंभीरता से नहीं ले रहे। उनका मानना है कि रूस के पास साधनों का अकाल है इसलिए वह नए अजेय नाभिकीय हथियारों के विकास की दिशा में बहुत आगे नहीं बढ़ सकता। रूस के पास साधनों की कमी है। यह स्वयं रूस के राष्ट्रपति पुतिन ने स्वीकार किया है। ध्वनि से पांच गुनी रμतार वाली मिसाइल विकसित करने की घोषणा करते हुए ही उन्होंने अपने रक्षा मंत्री को यह निर्देश दिए थे कि वे अपने बजट की सीमाओं में रहते हुए ही यह मिसाइल विकसित करके दिखाएं। रूस पहले ऐसा कर चुका है। रूस के पास साधनों की हमेशा किल्लत रही है, लेकिन अमेरिका के बराबर की सामरिक शक्ति बनने के संकल्प ने उसे सीमित साधनों में ही कई क्षेत्रों में अमेरिका से भी आगे पहुंचा दिया। आज वह संसार के सबसे उन्नत मिसाइल रक्षा कवच को विकसित कर लिए जाने का दावा करता है, जिसे भेदना अमेरिका के लिए भी आसान नहीं है। इसलिए उसकी घोषणा को हल्के ढंग से नहीं लिया जाना चाहिए।
ऐसा लगता है कि अमेरिका और रूस फिर से हथियारों की प्रतिस्पर्धा में पड़ गए हैं। दूसरे महायुद्ध तक दोनों देश एक ही खेमे में थे। उसके बाद उनमें एक नई अंतरराष्ट्रीय प्रतिस्पर्धा आरंभ हुई। अमेरिका पूंजीवादी खेमे का मुखिया था और सोवियत रूस साम्यवादी खेमे का। इन दोनों खेमों की प्रतिस्पर्धा के कारण सबसे बड़ा खतरा यूरोप की सुरक्षा को था। पूर्वी यूरोप के देश सोवियत खेमे में थे। अमेरिका ने यूरोपीय देशों की सुरक्षा के लिए नाटो का गठन किया था, जिसमें यूरोप के बाहर का एकमात्र देश तुर्की था। स्टालिन के जीवित रहते दोनों ही खेमों को एक-दूसरे से आशंकाएं बनी रहीं। लेकिन ब्रेझनेव के सोवियत रूस का राष्ट्रपति बनने के बाद इस तनातनी को कम करने और नाभिकीय प्रतिस्पर्धा पर कुछ लगाम लगाने के विचार से पृथ्वी से फेंकी जा सकने वाली मध्यम दूरी की मिसाइलों के उत्पादन और तैनाती को लेकर एक संधि हुई। इस संधि पर 1980 के आसपास बातचीत होना आरंभ हुई थी। लेकिन 1987 में जाकर ही संधि की सब बातों पर सहमति हो पाई। 1988 में वह संधि लागू हुई।

अमेरिका के राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रम्प ने रूस द्वारा नाभिकीय मिसाइलों को लेकर हुई संधि के उल्लंघन का कोई प्रमाण नहीं दिया। उन्होंने सिर्फ आरोप लगाया और अमेरिका को इस संधि से अलग कर लिया। उनके व्यवहार से यही लगा कि वे अमेरिका को इस संधि से अलग करना चाहते हैं, रूस पर लगाया गया आरोप एक बहाना मात्र है।

डोनाल्ड ट्रम्प के अमेरिकी राष्ट्रपति बनने से पहले किसी ने रूस पर मिसाइल संधि के उल्लंघन का आरोप नहीं लगाया था। डोनाल्ड ट्रम्प ने रूस द्वारा संधि के उल्लंघन का कोई प्रमाण नहीं दिया। उन्होंने सिर्फ आरोप लगाया और एकतरफा निर्णय करते हुए अमेरिका को इस संधि से अलग कर लिया। ट्रम्प के व्यवहार से यही लगा कि वे अमेरिका को इस संधि से अलग करना चाहते हैं, रूस पर लगाया गया आरोप एक बहाना मात्र है। अमेरिका और रूस द्वारा इस संधि को अमान्य कर देने के बाद से यूरोपीय देशों में असुरक्षा की भावना बढ़ गई है। हालांकि अभी किसी को किसी नए युद्ध के छिड़ने की आशंका नहीं है।

अब तक की डोनाल्ड ट्रम्प की घोषणाओं को देखकर ऐसा नहीं लगता कि उनकी असली चिंता रूस है। क्रीमिया विवाद को लेकर पश्चिमी देशों में जो प्रतिक्रिया हुई थी, वह एक तरह का प्रचार युद्ध ही थी। उससे बहुत पहले ही डोनाल्ड ट्रम्प ने यह कहना शुरू कर दिया था कि वे अमेरिका को न केवल एक अग्रणी सामरिक शक्ति देखना चाहते हैं बल्कि वे उसे एक अजेय और एक ऐसी शक्ति बनाना चाहते हैं, जो किसी भी शत्रु की पहुंच से परे हो। उन्होंने घोषणा की थी कि इस उद्देश्य को देखते हुए अमेरिका का अभी का नाभिकीय भंडार अपर्याप्त है। वे उसे बढ़ाकर इतना कर देना चाहते हैं कि कोई भी दूसरी शक्ति अमेरिका के उस स्तर तक पहुंच न पाए। डोनाल्ड ट्रम्प के लिए नाभिकीय हथियारों पर नियंत्रण की अंतरराष्ट्रीय संधियां तो कोई समस्या ही नहीं थीं। वे यह अवश्य चाहते हैं कि अब किसी नए देश को नाभिकीय शक्ति न बनने दिया जाए। इसी उद्देश्य से उत्तर कोरिया पर प्रतिबंध लगाए गए थे। उसके बाद उत्तर कोरिया ने अपना नाभिकीय कार्यक्रम समाप्त करने और अमेरिका से बातचीत की घोषणा की थी। दोनों के बीच एक दौर की बातचीत हो चुकी है। दूसरे दौर की बातचीत वियतनाम में प्रस्तावित है। इसी तरह अमेरिका ने ईरान के साथ बराक ओबामा के शासनकाल में हुआ नाभिकीय समझौता समाप्त कर दिया है। उसका आरोप था कि यह समझौता ईरान को अपना नाभिकीय कार्यक्रम समाप्त करने के लिए मजबूर नहीं करता। उसने अपना यह कार्यक्रम केवल कुछ समय के लिए स्थगित कर दिया है। अमेरिका, ईरान और उत्तर कोरिया के नाभिकीय कार्यक्रम को तो शैशव अवस्था में ही समाप्त करवाने के लिए दृढ़ प्रतिज्ञ है, पर वह अपना नाभिकीय भंडार इतना बढ़ाना चाहता है कि कोई नई शक्ति उसकी तरफ आंख उठाकर भी न देख सके।

अमेरिकी नीति में हुए इन परिवर्तनों को केवल डोनाल्ड ट्रम्प की सनक के रूप में नहीं देखा जाना चाहिए। अमेरिकी रक्षा विशेषज्ञों का एक वर्ग काफी पहले से यह कह रहा है कि अंतरराष्ट्रीय शक्ति संतुलन बदल रहा है। अब तक की अंतरराष्ट्रीय संधियां शीत युद्ध की परिस्थितियों को ध्यान में रखकर बनाई गई थीं। लेकिन 1990 में सोवियत संघ के विघटन के बाद शीत युद्ध समाप्त हो गया। रूस की सत्ता में पुतिन के उदय के बाद से रूस फिर संसार की दूसरी महाशक्ति बने रहने की कोशिश में लगा है। लेकिन अमेरिकी रक्षा विशेषज्ञों का मानना है कि आने वाले दिनों में रूस अपनी यह स्थिति बरकरार नहीं रख पाएगा। उसके साधन सीमित हंै और संसार में स्टालिन के जमाने में जो कम्युनिस्ट ब्लॉक बना था, वह अब इतिहास की बात हो गया है। हथियारों के अंतरराष्ट्रीय बाजार पर रूस अभी भी अपनी पकड़ बनाए हुए है। लेकिन दुनिया का अर्थतंत्र जिस तरह बदल रहा है, उसमें रूस अपनी आज की स्थिति बनाए नहीं रख पाएगा। उसकी अर्थव्यवस्था हथियारों और तेल की बिक्री पर निर्भर रही है। तेल का विश्व बाजार खस्ता हालत में है। तेल पर निर्भर रहने वाले सभी देश अपने भविष्य को लेकर चिंतित हैं। रूस जब तक अपना साम्यवादी ढांचा कायम रखता है, पश्चिमी देशों से उसका व्यापार बहुत नहीं बढ़ सकता। राष्ट्रपति पुतिन कुछ समय तक रूसी अर्थव्यवस्था को टिकाए रख सकते हैं। लेकिन आने वाले समय में रूस के पास अधिक विकल्प नहीं रह पाएंगे। अगले कुछ दशकों में नई सामरिक शक्तियां उभर सकती हैं। उनमें चीन और भारत दोनों की गिनती की जाती रही है। अमेरिका को इस नई उभरती अंतरराष्ट्रीय परिस्थिति के अनुरूप तैयार करना है।

इसकी ही झलक अमेरिकी सीनेट और कांग्रेस के संयुक्त सत्र को संबोधित करते हुए राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रम्प ने जो भाषण दिया, उसमें देखी जा सकती है। अपने इस भाषण में ट्रम्प ने मध्यम दूरी की मिसाइल की तैनाती से संबंधित संधि से हटने की अपनी घोषणा को सही ठहराते हुए कहा कि भविष्य में नई संधियां की जा सकती हैं और उनके दायरे में नई उभरती सामरिक शक्तियों को लाया जा सकता है। अमेरिका में रक्षा विशेषज्ञों के बीच यह मान्यता उभर रही है कि भविष्य में भारत और चीन संसार की बड़ी अर्थव्यवस्था होंगे। उनके साधन अमेरिका से भी अधिक हो सकते हैं। क्योंकि अपनी जनसंख्या के बूते वे अपने आंतरिक बाजार को काफी बढ़ाने में समर्थ हो सकते हैं। अमेरिका में भारत को लेकर वैसी आशंका नहीं है, लेकिन चीन को लेकर है। अमेरिकी रक्षा विशेषज्ञों का मानना है कि चीन कम्युनिस्ट बने रहते हुए भी अपनी अर्थव्यवस्था को तेज गति देने में सफल रहा है। आज वह दुनिया की दूसरी बड़ी आर्थिक महाशक्ति है और आने वाले दिनों में उसकी अर्थव्यवस्था अमेरिका से भी बड़ी हो जाएगी। वह अपने सामरिक भंडार के विस्तार में भी लगा है। उसकी आकांक्षा है कि 2049 तक कम्युनिस्ट शासन की एक शताब्दी में वह अमेरिका जैसी संपन्नता हासिल कर ले। उसके सामने कुछ समस्याएं अवश्य हैं, लेकिन वह जिस तेजी से अपनी अर्थव्यवस्था का विस्तार कर रहा है, 2049 से पहले भी वह संसार की सबसे अग्रणी महाशक्ति बन सकता है। अभी वह केवल एक आर्थिक चुनौती है। लेकिन आर्थिक दौर जीतने के बाद वह सामरिक दौड़ में भी आगे होना चाहेगा। उसी परिस्थिति के लिए अमेरिका तैयारी करना चाहता है।
अमेरिकी रक्षा विशेषज्ञ यह जानते हंै कि कोई देश अगर संपन्नता का एक स्तर छू ले तो सामरिक तंत्र के विस्तार पर होने वाला खर्च उसके लिए बोझ नहीं रह जाता। एक तो इसलिए कि उसके हथियारों को अंतरराष्ट्रीय बाजार मिलने लगता है और इस बाजार का मुनाफा उन्नत से उन्नत हथियारों को विकसित करने का खर्च वहन करने के काम आता है। दूसरे उन्नत हथियारों को विकसित करने की प्रक्रिया में प्रौद्योगिकी भी उन्नत होती रहती है। उसका इस्तेमाल भौतिक जीवन का कायाकल्प करते रहने के लिए किया जा सकता है। यह प्रौद्योगिकी दोहरे उपयोग की होती है। सामरिक उद्योगों के लिए तो उसकी उपयोगिता होती ही है, नागरिक जीवन की सुविधाएं बढ़ाने में भी उनका उपयोग किए जाने लगता है। इस तरह अति उन्नत हथियारों के विकास पर होने वाला खर्च उन उद्योगों द्वारा बांट लिया जाता है जो दोहरे उपयोग की प्रौद्योगिकी का इस्तेमाल नागरिक सुविधाओं को जुटाने के लिए करते हैं। चीन अभी संपन्नता के उस स्तर तक नहीं पहुंचा, लेकिन धीरे-धीरे वह उस दिशा की ओर बढ़ता ही जा रहा है। एक-दो दशक में वह इस स्थिति में आ जाएगा कि उसे बाहर से उन्नत शस्त्र प्रणालियां न खरीदनी पड़े। बल्कि वह अपनी विकसित शस्त्र प्रणालियों को अंतरराष्ट्रीय बाजार में बेच सके। इसी तरह दोहरे इस्तेमाल की उन्नत प्रौद्योगिकी विकसित करने में भी उसकी अब तक की प्रगति संतोषजनक है। अमेरिका चीन को अपने नए प्रतिस्पर्धी के रूप में देखने लगा है, यह बात स्वयं चीन की सफलता सिद्ध करती है। महाशक्तियों को केवल वर्तमान को ध्यान में रखकर नहीं, सुदूर भविष्य को ध्यान में रखकर रणनीति तैयार करनी पड़ती है। यही अमेरिका के बदलते रुख की पृष्ठभूमि है।

चीन को एक आर्थिक शक्ति के रूप में उभारने में मुख्य भूमिका अमेरिका की ही रही है। 1970 के आसपास जब पश्चिम के औद्योगिक देश दूसरे महायुद्ध की विभीषिका से उबरकर अपना कायाकल्प करने और समृद्धि के शिखर पर पहुंचने में सफल हुए थे, उनके सामने एक ही समस्या थी कि कहीं फिर कोई युद्ध छिड़ने की नौबत न आ जाए। उस समय पश्चिमी देशों के सामने सबसे बड़ी सामरिक चुनौती प्रतिस्पर्धी कम्युनिस्ट शक्तियां थीं। एक समय वे दुनिया के 40 प्रतिशत भूगोल पर अपना प्रभाव स्थापित करने में सफल हो गई थीं। उस समय अमेरिका की चिंता यह थी कि किसी तरह सोवियत रूस को कमजोर किया जाए और कम्युनिस्ट देशों के बीच में दरार डाल दी जाए। संयोग से स्टालिन की मृत्यु के बाद चीन के नेताओं में साम्यवादी खेमे का नेतृत्व करने की आकांक्षा पैदा हुई। माओ ने स्टालिन के बाद के नेताओं को संशोधनवादी घोषित कर दिया। इस तरह सोवियत रूस और चीन में दूरी पैदा हो गई। अमेरिका को लगा कि यह सोवियत रूस को कमजोर करने का सुनहरा मौका है। राष्ट्रपति निक्सन ने पाकिस्तान के प्रधानमंत्री जुल्फिकार अली भुट्टो की मदद से चीन से संपर्क बनाए और चीन व अमेरिका के बीच आर्थिक सहयोग का रास्ता खुल गया। अमेरिका ने अपने प्रदूषण फैलाने वाले बहुत से कारखाने और साधन संपन्न बहुराष्ट्रीय कंपनियों को चीन में प्रवेश दिलवा दिया। इस तरह चीन को अपनी अर्थव्यवस्था को आधुनिक बनाने का मौका मिल गया। अमेरिका उस समय यह नहीं देख पाया कि चीन की आबादी रूस से अधिक है, वह पुरानी सभ्यता है और उसके नेता बहुत महत्वाकांक्षी हैं। इसलिए आगे जाकर वह सोवियत रूस से बड़ी चुनौती साबित हो सकता है। इस समय अमेरिका के पास अपनी इस पिछली भूल को मुड़कर देखने की फुरसत नहीं है। वह चीन के आर्थिक शक्ति बनने में अपनी भूमिका स्वीकार करने के बजाय यह कह रहा है कि चीन उसके कल-कारखाने ले गया और अमेरिकी लोग बेरोजगार हो गए। यह कहना अमेरिकी लोगों में चीन के प्रति हिंसा भड़काने के लिए आवश्यक है। आज सामान्य अमेरिकी चीन को खलनायक के रूप में देखता है। चीन को उभरती हुई चुनौती बताकर अमेरिका अपना आयुध भंडार इतना बढ़ा लेना चाहता है कि चीन को यह दौड़ खर्चीली दिखने लगे।

अमेरिकियों को यह भी आशा है कि चीन अगर अमेरिकी संपन्नता का स्तर न छू पाया तो चीनियों का कम्युनिस्ट शासन से मोहभंग हो जाएगा और चीन आंतरिक विग्रह का शिकार हो जाएगा। ऐसा संभव है। लेकिन यह भी उतना ही संभव है कि अमेरिका जिस तरह के पुलिस स्टेट में बदलता जा रहा है उसके प्रति आम अमेरिकियों की हताशा विस्फोटक रूप ले ले। ये सब आशंकाएं अपनी जगह हैं और उनके आधार पर भविष्य की नीतियां नहीं बनाई जा सकतीं। उन्हें तो भविष्य की चुनौतियों को देखते हुए ही बनाना पड़ता है। पहले जिस तरह अमेरिका और सोवियत रूस पूरी दुनिया को दो खेमों में बांटकर युद्ध की परिस्थितियां पैदा करते रहते थे, वैसा ही आने वाले दिनों में अमेरिका और चीन करने वाले हैं। अमेरिका इस दौड़ में आगे रहने के लिए रूस को तो केवल एक बहाना बना रहा है। वास्तव में उसकी चिंता रूस नहीं, चीन है। हथियारों की यह नई होड़ दरअसल चीन को आगे न निकलने देने के लिए हो रही है। भारत को इन प्रतिस्पर्धी शक्तियों के बीच अपनी सुरक्षा सुनिश्चित करनी है। उसके लिए उसे भी अपनी आत्मरक्षा लायक एक विश्वसनीय सामरिक तंत्र खड़ा करना पड़ेगा।

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