चीन के विरुद्ध अमेरिका का तीसरा मोर्चा

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चीन में अल्पसंख्यक मुसलमानों पर होने वाला अत्याचार अमेरिका का तीसरा मोर्चा है। यह सिलसिला संयुक्त राष्ट्र
मानवाधिकार आयोग की रिपोर्ट आने के बाद शुरू हुआ था। उससे सूत्र लेकर अमेरिका के सीनेटर मार्को रूबियो ने
इस मुद्दे को जोर-शोर से उठाया। उन्होंने अमेरिकी सीनेट की विदेशी मामलों से संबंधित समिति की बैठक के दौरान
अपने विदेश मंत्री माइक पोंपियो से पूछा कि चीन के शिनजियांग प्रांत में मुसलमानों के साथ जिस तरह का अमानवीय
व्यवहार किया जा रहा है, उसे देखते हुए अमेरिका चीन पर आर्थिक प्रतिबंध और कड़े क्यों नहीं करता?

अमेरिका ने चीन के विरुद्ध अब एक तीसरा मोर्चा खोल दिया है। अब तक उनके बीच सारा विवाद या तो दोनों देशों के बीच होने वाले परस्पर व्यापार को लेकर था या दक्षिणी चीन सागर के कुछ द्वीपों के चीन द्वारा किए जा रहे सामरिक उपयोग को लेकर। लेकिन अब अमेरिका ने चीन में अल्पसंख्यकों विशेषकर मुसलमानों पर किए जा रहे उत्पीड़न को लेकर एक नया मोर्चा खोल दिया है। कुछ दिन पहले संयुक्त राष्ट्र के मानवाधिकार आयोग की एक रिपोर्ट प्रकाशित हुई थी। इस रिपोर्ट में कहा गया था कि चीन ने अपने शिनजियांग प्रांत में दस लाख उईगर मुसलमानों को जेलनुमा कैंपों में रखा हुआ है। उसके मुख्य प्रांत में बसे हुए हुई मुसलमानों पर आए दिन होने वाले अत्याचारों का भी इस रिपोर्ट में विस्तार से वर्णन था। चीन अपने अल्पसंख्यकों पर ही नहीं, अपने सामान्य नागरिकों पर भी कड़ा नियंत्रण रखता है। कम्युनिस्ट शासन ने चीन को अपने सभी नागरिकों के लिए एक खुली जेल ही बना रखा है।

संयुक्त राष्ट्र के मानवाधिकार आयोग की रिपोर्ट कुछ अतिरंजित लगती है। शिनजियांग प्रांत चीन के मुख्य भाग से काफी दूर है और उसके लिए यह व्यावहारिक रूप से संभव नहीं है कि वह दस लाख लोगों को जेलनुमा कैंपों में रखे। फिर भी इस रिपोर्ट को असत्य बताते हुए चीन ने उसे पूरी तरह खारिज नहीं किया था। अपनी सफाई में उसने यही कहा था कि चीन केवल आपराधिक वृत्ति वाले लोगों को सुधारने और कोई उपयोगी कौशल सिखाने के लिए ही सुधार केंद्रों में रखता है। चीन में शासन से असहमत सभी लोगों को अपराधी ही माना जाता है।

इसलिए शिनजियांग प्रांत के उईगर मुसलमानों के साथ ज्यादती होना आश्चर्य की बात नहीं है। पर अब तक अमेरिकियों ने उसे मुद्दा नहीं बनाया था। अब उन्होंने न केवल चीन पर आक्षेप लगाए हैं और अमेरिका के कुछ सांसदों ने इसी आधार पर उसके खिलाफ आर्थिक प्रतिबंध लगाने की मांग भी की है। अमेरिका के विदेश विभाग ने चीन के इस व्यवहार की तीखी आलोचना करते हुए यह संकेत दे दिया है कि अमेरिका चीन पर और कड़े आर्थिक प्रतिबंध लगा सकता है। चीन में इस समय मुसलमानों की संख्या सवा दो करोड़ के आसपास है। चीन में तीन तरह के मुसलमान हंै। शिनजियांग के उईगर मुसलमानों की संख्या एक करोड़ से कुछ अधिक है। चीन के आंतरिक क्षेत्रों में रहने वाले हुई मुसलमानों की सख्या एक करोड़ के आसपास ही है। कजाक मुसलमानों की संख्या डेढ़-दो लाख से अधिक नहीं है।

चीन बहुलता या विविधता में न पहले विश्वास रखता था, न अब विश्वास रखता है। चीन हमेशा एकरूपता पर जोर देता रहा है। चीन नौवीं शताब्दी से 1912 तक बीच के पौने तीन साल के मिंग शासन को छोड़कर उत्तरी क्षेत्रों से आए कबीलाई योद्धाओं की अधीनता में ही रहा था। उनमें भी मंगोल और मांचू शासकों का शासन काफी कठोर था। लेकिन मंगोल शासकों को छोड़कर बाकी सभी शासकों ने शासन और जीवनशैली से संबंधित चीनी परंपराओं को ज्यों का त्यों स्वीकार कर लिया था। लेकिन चीन के मुख्य भाग में रहने वाले हुई मुसलमानों ने अपनी जीवनशैली को इस्लाम के अनुसार ढाले रखा। इस्लाम में सुअर का मांस खाना वर्जित है। जबकि चीनी भोजन में सुअर का मांस होना आम बात है।

हुई मुसलमान सुअर का मांस नहीं खाते। अपने सिर पर भी वे उसी तरह की टोपी पहनते हैं, जो अन्यत्र मुसलमानों की पहचान रही है। इसी तरह अपने बच्चों को मजहबी शिक्षा देने के लिए वे उन्हें मदरसों में भेजते रहे हैं। अपनी घनी आबादी वाले इलाकों में उन्होंने मस्जिदें भी बनवाई है। चीनी शासकों को यह कभी पसंद नहीं आया। इतिहास में चीनी हुई मुसलमानों को एक जगह से दूसरी जगह खदेड़ते रहे। इसके इतिहास में अनेक वर्णन मिलते हैं कि उन पर हान जीवनशैली अपनाने के लिए अनेक तरह के दबाव डाले जाते रहे। चीन के मुख्य भाग के इन हुई मुसलमानों ने चीन की मुख्य आबादी के अनुरूप अपनी जीवनशैली में कुछ परिवर्तन भी किए। लेकिन अपनी मुस्लिम पहचान को उन्होंने पूरी तरह नहीं छोड़ा। चीन के हुई मुसलमानों में अनेक तरह के लोग हैं। मूलत: वे चीन के रेशम के व्यापार के दौरान मुस्लिम देशों के संपर्क में आने के कारण अस्तित्व में आए। चीनियों की ही तरह मुस्लिम समाज भी उन सब लोगों पर इस्लाम स्वीकार करने का दबाव बनाता रहता है और अपनी जीवनशैली स्वीकार करने का जोर डालता है, जो उसके साथ सैनिक या व्यापारिक संबंधों से बंधते हैं। इस तरह चीन के जो व्यापारी रेशमी वस्त्रों के व्यापार के लिए अरब या फारसी इलाकों में गए, उन्हें इस्लाम स्वीकार करना पड़ा। उन्होंने भी इसे अपने आर्थिक लाभ के लिए उपयोगी समझा।

दूसरी तरफ मुस्लिम देशों के बहुत से व्यापारी चीन आए और यहां आकर उन्होंने चीनी महिलाओं से विवाह किए। फिर वे यही बस गए। इस तरह के लोग हमारे यहां के एंग्लो-इंडियन की तरह है। चीन के भीतर बसे मुसलमानों ने अपनी संख्या बढ़ाने के लिए धर्मांतरण का सहारा भी लिया। 1949 में चीन में कम्युनिस्ट शासन की स्थापना के बाद सभी तरह के धार्मिक वर्गों पर कड़े प्रतिबंध लगा दिए गए। हुई लोगों को अपने आपको राष्ट्रवादी साबित करने के लिए अनेक उपक्रम करने पड़े। उन्हें सुअर का मांस खाने, इस्लामी वेशभूषा छोड़ने और मदरसे बंद करने के लिए भी कहा गया। माओ की मृत्यु के बाद चीनी शासन कुछ उदार हुआ, हुई मुसलमानों को मजहबी दायित्व निबाहने की थोड़ी सी छूट मिल गई। शिनजियांग के उईगर मुसलमान अपने आपको एक सामान्य चीनी के रूप में नहीं देख पाते।

शिनजियांग के मुसलमानों पर होने वाले अत्याचारों का सवाल उठाकर ही अमेरिकी सांसद शांत नहीं हुए। उन्होंने मुस्लिम देशों को उलाहना देते हुए उनसे पूछा कि वे चीन में जो कुछ हो रहा है, उसे देखकर चुप क्यों बैठे हैं? यह सवाल विशेषकर पाकिस्तान और तुर्की से पूछा गया है। इन दोनों देशों में ही उईगर आतंकी संगठनों को सबसे अधिक शह मिलती रही है।

शिनजियांग कभी चीन का भाग नहीं रहा था। उसे मंचूरिया और मंगोलिया के कुछ भागों और समूचे तिब्बत की तरह चीन के कम्युनिस्ट शासकों ने जबरन 1949 में अपने अधिकार में ले लिया था। शिनजियांग पर चीन के अधिपत्य जमाने पर भारत या रूस ही आपत्ति कर सकते थे। भारत के नेताओं को अपनी सीमाओं के बाहर क्या हो रहा है, इसे जानने की फुरसत ही नहीं थी। जवाहर लाल नेहरू ने चीन द्वारा तिब्बत हड़पे जाने पर ही आपत्ति नहीं की तो उसके शिनजियांग पर कब्जा जमाने पर क्या आपत्ति करते? असल में शिनजियांग पर चीन तिब्बत को तीन ओर से घेरे रखने के लिए ही अधिपत्य जमाए रखना चाहता था। तिब्बत के बौद्धों के मुकाबले शिनजियांग के मुसलमान अधिक मुश्किल साबित हुए। उन पर नियंत्रण बनाए रखने के लिए चीन को इस प्रांत का जनभूगोल ही बदल देना पड़ा।

उसने बड़े पैमाने पर मुख्य चीन से लाकर हान लोगों को यहां बसाया और अपने ही क्षेत्र में उईगर अल्पसंख्यक बना दिए गए। उईगरों पर नियंत्रण के लिए चीन ने एक और कुटिल नीति अपनाई। उसके शासकों ने हुई मुसलमानों को अपनी राष्ट्रभक्ति साबित करने के लिए सेना और दूसरे सशस्त्र बलों में शामिल होने के लिए कहा। फिर उन्हें शिनजियांग में उईगरों का विद्रोह दबाने के लिए इस्तेमाल किया गया। हुई अपने आपको उईगरों से अलग समझते हैं इसलिए वे चीनी शासकों की चाल में आ गए। जो नीतियां कभी यूरोपीय अपने उपनिवेशों में बरतते थे वही नीतियां चीन ने बरती और हुई मुसलमानों को उईगर मुसलमानों से लड़ा दिया। फूट डालो राज करो चीनी शासकों का भी मंत्र बन गया। अरब देशों में जब सलाफी आंदोलन शुरू हुआ और जेहाद के नाम पर आतंकवादी संगठन पैदा हो गए तो चीन को भी आशंका हुई। वास्तव में उईगर और हुई दोनों तरह के मुसलमानों पर सलाफी आंदोलन का असर पड़ा था।

चीन में मुसलमानों के साथ क्या हो रहा है, यह आने वाले समय में अमेरिका में एक बड़ा मुद्दा बन सकता है। अमेरिकी विदेश मंत्रालय इस बारे में अपनी चिंता जाहिर कर चुका है। भारत में भी आम मुसलमानों को उन परिस्थितियों से अवगत करवाया जाना चाहिए, जिनके बीच चीनी मुसलमान रह रहे हैं।

लेकिन शिनजियांग चीन की मुख्य भूमि से दूर है, इसलिए वहां इस्लामी आतंकवाद अधिक बड़ी चुनौती पैदा कर पाया। उईगर विद्रोहियों को सीरिया और इराक के इलाके में तो प्रशिक्षण मिला ही था, अफगानिस्तान और पाकिस्तान की स्वात घाटी में भी उन्हें प्रशिक्षित किया जा रहा था। चीन ने पाकिस्तान पर दबाव डाला कि वह उईगर आतंकवादियों को चीन के हवाले करे। पाकिस्तान ख्ुाले तौर पर तो ऐसा नहीं कर सकता था। क्योंकि तब उसे आतंकवादी संगठनों का कोप झेलना पड़ता। उसने उईगरों को अफगानिस्तान की ओर धकेलना शुरू कर दिया। चीन पूरी तरह से पाकिस्तान की कार्रवाई से संतुष्ट नहीं हुआ है, लेकिन वह पाकिस्तान की अराजक स्थिति के कारण अधिक आशा भी नहीं बांध सकता।

इसलिए उसने शिनजियांग पर अपना नियंत्रण और कड़ा कर दिया है। चीन शिनजियांग को एक समस्याग्रस्त प्रांत समझता है। वहां के लोगों के साथ उसका व्यवहार औपनिवेशिक शासनों जैसा ही है। कम्युनिस्ट देशों में राजनैतिक स्वतंत्रता वैसे भी नहीं होती। शिनजियांग प्रांत में तो किसी तरह की स्वतंत्रता नहीं है। मामूली संदेह में ही किसी भी मुसलमान को जेल की हवा खानी पड़ सकती है। इन इलाकों के लोगों पर होने वाले राजनैतिक दमन के समाचार हमेशा आते रहे थे। लेकिन 1970 के बाद अमेरिका और चीन एक-दूसरे से निकटता बढ़ा रहे थे। इसलिए विषय को तूल नहीं दिया गया। अब डोनाल्ड ट्रम्प के सत्ता में आने के बाद अमेरिका और चीन एक-दूसरे के प्रतिद्वंद्वी हो गए हैं। चीन को नियंत्रित करने के लिए अमेरिका अनेक मोर्चे खोल रहा है। अल्पसंख्यक मुसलमानों पर होने वाला अत्याचार उसका तीसरा मोर्चा है। यह सिलसिला संयुक्त राष्ट्र मानवाधिकार आयोग की रिपोर्ट आने के बाद शुरू हुआ था।

उससे सूत्र लेकर अमेरिका के सीनेटर मार्को रूबियों ने इस मुद्दे को जोर-शोर से उठाया। उन्होंने अमेरिकी सीनेट की विदेशी मामलों से संबंधित समिति की बैठक के दौरान अपने विदेश मंत्री माइक पोंपियो से पूछा कि चीन के शिनजियांग प्रांत में मुसलमानों के साथ जिस तरह का अमानवीय व्यवहार किया जा रहा है, उसे देखते हुए अमेरिका चीन पर आर्थिक प्रतिबंध और कड़े क्यों नहीं करता? अमेरिका चीन पर कुछ आर्थिक प्रतिबंध तो रूस से उसके द्वारा हथियारों की खरीद किए जाने पर पहले ही लगा चुका है। इसके अलावा चीन से आयातित होने वाले सामान पर अतिरिक्त सीमा शुल्क की घोषणा की जा चुकी है। सीमा शुल्क के मामले में चीन ने जवाबी कदम उठाए हैं। रूस से हथियारों की खरीद को लेकर लगे प्रतिबंधों की उसने निंदा की है। लेकिन शिनजियांग के मुसलमानों के जेलनुमा कैंपों में रखे जाने पर उसकी ओर से केवल यह टिप्पणी की गई है कि वे अपराधी प्रवृत्ति के लोगों को सुधारने और उनकी राष्ट्रीय निष्ठा सुनिश्चित करने की जगह है। अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रम्प चीन पर तरह- तरह से दबाव बढ़ाते ही जा रहे हैं। अभी हाल में दक्षिणी चीन सागर में एक अमेरिकी सामरिक पोत की चीनी पोत से भिड़ंत होते-होते बची। अमेरिका ने ताइवान को सैनिक मदद बढ़ा दी है। वह उत्तरी कोरिया को भी चीन से अलग करने की कोशिश कर रहा है।

अमेरिका जिस तरह चीन पर दबाव बढ़ा रहा है, उससे लगता नहीं कि दोनों के बीच निकट भविष्य में संबंध सामान्य हो पाएंगे। शिनजियांग के मुसलमानों पर होने वाले अत्याचारों का सवाल उठाकर ही अमेरिकी सांसद शांत नहीं हुए। उन्होंने मुस्लिम देशों को उलाहना देते हुए उनसे पूछा कि वे चीन में जो कुछ हो रहा है, उसे देखकर चुप क्यों बैठे हैं? यह सवाल विशेषकर पाकिस्तान और तुर्की से पूछा गया है। इन दोनों देशों में ही उईगर आतंकवादी संगठनों को सबसे अधिक शह मिलती रही है। अपने आपमें यह कम आश्चर्य की बात नहीं है कि अरबों का सलाफी आंदोलन यूरोप और अमेरिका को तो अपना निशाना बनाता रहा है जबकि वे अपने यहां के मुसलमानों के प्रति अपेक्षाकृत उदार नीतियां बरतते हैं, लेकिन उसने कभी चीन को अपना निशाना नहीं बनाया, जिसमें मुसलमानों पर हमेशा अत्याचार होते रहे हैं। शी के चीन का राष्ट्रपति बनने के बाद चीन के मुसलमानों की स्थिति और बिगड़ी है। शी प्रशासन किसी भी तरह की राजनैतिक असहमति बर्दाश्त नहीं करता। शी के काल में मुसलमानों पर पड़े इस्लामी प्रभाव को रोकने की अधिक कोशिश हुई है। मुसलमानों को जबरन सुअर का मांस खिलाना, रमजान के दिनों में रोजे न रखने देना, उनके जुम्मे की नमाज के लिए इकट्ठा होने पर रोक लगाना और इस्लाम की पहचान बनी टोपी न पहनने देना अब शी प्रशासन की नीति ही बन गई है। चीन में मुसलमानों के साथ क्या हो रहा है, यह आने वाले समय में अमेरिका में एक बड़ा मुद्दा बन सकता है।

अमेरिकी विदेश मंत्रालय इस बारे में अपनी चिंता जाहिर कर चुका है। भारत में भी आम मुसलमानों को उन परिस्थितियों से अवगत करवाया जाना चाहिए, जिनके बीच चीनी मुसलमान रह रहे हैं। हमारे तथाकथित सेक्यूलर लोग भारत सरकार पर तो बात-बेबात बरसते रहते हैं। लेकिन चीन में जो कुछ हो रहा है, उस पर उनका मुंह कभी नहीं खुलता। भारत में आज भी समाजवाद और माओवाद को एक प्रगतिशील या क्रांतिकारी विचारधारा के रूप में देखा जाता है। इन विचारधाराओं के आधार पर कम्युनिस्ट देशों में आम नागरिकों के साथ किस तरह का व्यवहार हुआ है, इसकी कभी चर्चा नहीं होती।

आज कम्युनिस्ट देशों में आम नागरिकों की लगभग वैसी ही स्थिति है, जैसी मध्यकाल के सामंती यूरोप में भूदासों की थी। भारत के मुसलमानों को चीन के मुसलमानों के साथ जो व्यवहार हो रहा है, इसकी व्यापक जानकारी दी जानी चाहिए। यह भी कम आश्चर्य की बात नहीं है कि मुस्लिम देशों के संगठन कश्मीर को लेकर तो प्रस्ताव पारित करते रहे हैं, लेकिन उईगरों की स्थिति पर वे मौन साधे रहे हैं। अगर अमेरिका इसे मुद्दा बनाता है तो आगे जाकर अरब देशों में भी चीन विरोधी आवाजें उठ सकती हैं। चीन इस समस्या को अपना आंतरिक मामला कहते हुए दूसरों को उसमें हस्तक्षेप न करने की चेतावनी देता रहा है। उसने अमेरिकी सांसदों से भी यही कहा है कि वे चीन के मामलों में दखल देकर अपने नागरिकों के टैक्स के पैसे का अपव्यय ही कर रहे हैं। इस स्थिति में दोनों देशों के बीच तनातनी बनी ही रहने वाली है।

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