चीन की गिरफ़्त से भारत ही बचा सकता है

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साम्राज्यवादी महत्वाकांक्षा रखने वाली सत्ताएं अपनी देशीय परिधि से बाहर निकलकर कुछ ऐसे खेल खेलती रहती हैं जिनका शिकार प्राय: छोटे देश अथवा क्षेत्र बनते हैं। ये खेल निरन्तर चलते रहते हैं बस समय और परिस्थिति के अनुसार इनके नाम और रणनीतियां बदल जाती हंै। इस समय चीन हिन्द महासागर से प्रशांत और अटलांटिक तक छोटे व गरीब देशों में कुछ ऐसे ही खेल-खेल रहा है। हालांकि इस खेल के परिणाम अभी से सामने आने लगे हैं लेकिन संभव है कि आगे इनकी शक्ल और भी भयावह होगी। इसका उदाहरण हिन्द महासागर के छोटे से द्वीपीय देश मालदीव में देखा जा सकता है जहां चीन ने ‘आधारभूत विकास’ के नाम पर बड़े-बड़े सपने दिखाए और अब मालदीव की सरकार को अपने कर्ज का पूरा ब्योरा थमा दिया। इस कर्ज की प्रकृति और आकार को देखने से तो मालदीव की स्थिति चीन के उपनिवेश जैसी बनती नजर आ रही है।

मालदीव में राष्ट्रपति मोहम्मद इब्राहिम सालिह की नई सरकार ने आते ही चीन के साथ मुक्त व्यापार समझौते को रद्द कर दिया और चीन के साथ इस समझौते को मालदीव की सबसे बड़ी गलती करार दिया। जाहिर सी बात है कि यह चीन को अखरता और अखरा भी। इन स्थितियों से सम्भवत: चीन इस निष्कर्ष पर अवश्य ही पहुंचा होगा कि यह भारत के प्रभाव का असर है।मालदीव में राष्ट्रपति मोहम्मद इब्राहिम सालिह की नई सरकार ने आते ही चीन के साथ मुक्त व्यापार समझौते को रद्द कर दिया और चीन के साथ इस समझौते को मालदीव की सबसे बड़ी गलती करार दिया। जाहिर सी बात है कि यह चीन को अखरता और अखरा भी। इन स्थितियों से सम्भवत: चीन इस निष्कर्ष पर अवश्य ही पहुंचा होगा कि यह भारत के प्रभाव का असर है।

अब प्रश्न यह उठता है कि क्या मालदीव की पुरानी सरकार ने ऐसा जानबूझ कर किया या फिर चीन ने यह सब इतना रणनीतिक तरीके से किया कि सरकार को समझ में ही नहीं आया? दूसरा सवाल यह उठता है कि चीन अब नई सरकार के खिलाफ इतना आक्रामक क्यों हो गया? क्या चीन की यह प्रतिक्रिया मालदीव में उसकी कूटनीतिक पराजय का परिणाम है? यदि हां, तो अब आगे चीन की रणनीति क्या होगी और भारत मालदीव में अपनी कूटनीतिक जीत को स्थायित्व कैसे देगा? अभी कुछ समय पहले ही मालदीव के शासन की कमान संभालने वाली राष्ट्रपति मोहम्मद इब्राहिम सालिह की सरकार और चीन के बीच इस समय में काफी कड़ुवाहट दिख रही है। मालदीव के पूर्व राष्ट्रपति मोहम्मद नशीद ने दावा किया है कि मालदीव पर चीन का कर्ज 3.2 अरब डॉलर (करीब 22,611 करोड़ रुपये) है। चूंकि मालदीव की आबादी लगभग 4 लाख है। इस दृष्टि से मालदीव के प्रत्येक नागरिक पर चीन का 8 हजार डॉलर अथवा लगभग 5,65,400 रुपये का कर्ज ठहरता है।

ध्यान रहे कि मोहम्मद नशीद मौजूदा राष्ट्रपति इब्राहीम सालिह के सलाहकार भी हैं। हालांकि चीन ने मोहम्मद नशीद के दावे को खारिज किया है और माना है कि मालदीव पर उसका कर्ज 1.5 अरब डॉलर (करीब 10,601 करोड़ रुपये) के आसपास है। अगर यह भी मान लिया जाए कि मालदीव पर चीन का कर्ज 1.5 अरब डॉलर ही है, वह भी मालदीव की अर्थव्यवस्था के हिसाब से बहुत ज्यादा है। यही कारण है कि सालिह प्रशासन का कहना है कि देश की आर्थिक स्थिति बेहद ही खराब है। राष्ट्रपति सालिह की मानें तो मालदीव पर चीन का वास्तविक कर्ज कितना है, ये उनकी सरकार को अभी तक सही से पता नहीं चल पाया है। तो क्या यह भी संभव है कि मालदीव आर्थिक आपातकाल की ओर भी जा सकता है।

 

खैर, इसके बावजूद सवाल यह उठता है कि चीन अकस्मात मालदीव का इतना तीव्र विरोधी क्यों हो गया? दरअसल मालदीव अपनी भौगोलिक स्थिति के कारण भारत और चीन दोनों के लिए बेहद अहम है। हिन्द महासागर में चीन और भारत के बीच चलने वाली सामरिक प्रतिद्वंद्विता का परिणाम बहुत हद तक अन्य देशों के साथ-साथ मालदीव पर भी निर्भर करता है। चीन यह कभी नहीं चाहता कि मालदीव की सत्ता किसी ऐसे नेता के हाथ में आए जो भारत का समर्थक हो। मोहम्मद नशीद का सत्ता से बाहर होना, अब्दुल्ला यामीन का सत्ता में आना और इसी वर्ष फरवरी में अब्दुल्ला यामीन द्वारा देश में आपातकाल लगाकर विपक्षियों के साथ-साथ जजों तक को गिरμतार कराने सम्बंधी नाटक की पटकथा के केन्द्र में यही था कि चीन मालदीव में कठपुतली शासक को बिठाने में सफल होता रहे। हालांकि अब्दुल्ला यामीन और चीन, दोनों ही अंतिम रूप से अपने मकसद में कामयाब नहीं हो पाए। ध्यान रहे कि वर्ष 2012 में मोहम्मद नशीद राष्ट्रपति पद से हटने के बाद जब भारतीय दूतावास में शरण लिए हुए थे तो उन्होंने हिन्द महासागर की सुरक्षा पर प्रश्न उठाया था। चूंकि अब्दुल्ला यामीन हिन्द महासागर की इतनी बड़ी ताकत नहीं थे जो खतरा बनते। फिर वह खतरा कौन था? स्पष्ट तौर पर चीन। चीनी कम्पनी को यामीन ने सत्ता पाते ही मारओ बंदरगाह लीज पर दे दिया (भारत की जीएमआर से वापस लेकर) था। यही नहीं, यामीन के आने के बाद चीन ने मालदीव की प्राकृतिक संपदा को हथियाने की रणनीतिक ढंग से कोशिश की। इसके लिए उसने मालदीव में भ्रष्टतंत्र को तैयार किया जिसमें न्यायपालिका, प्रशासन और सेना भी शामिल थी। इस बात का खुलासा कॉमनवेल्थ समर्थित न्यायिक आयोग की रिपोर्ट में किया गया था।

मालदीव को चीन ने एक ऐसी समस्या में उलझा दिया है, जो उसे एक तरफ चीन के खिलाफ संघर्ष की ओर ले जा सकती है और दूसरी तरफ औपनिवेशिक तंत्र में जकड़ने की ओर। अब भारत ही उसे इस स्थिति से उबारने में मदद कर सकता है लेकिन भारत की अपनी आर्थिक सीमाएं हैं। अब देखना है कि भारत ने मालदीव में जो कूटनीतिक विजय हासिल की है उसे स्थायित्व कैसे प्रदान करेगा?

बता दें, मालदीव को अपने पाले में करने के लिए चीन ने आधारभूत ढांचे के निर्माण के लिए जमकर कर्ज दिया और राजधानी माले को एयरपोर्ट से जोड़ने वाले सी ब्रिज, एयरपोर्ट के विस्तार और कुछ आवासीय टावर ब्लॉक बनाने के लिए चीन ने बड़ा कर्ज दिया। कुछ आवासीय टावर ब्लॉक बनाने के लिए चीन ने 60 करोड़ डॉलर का कर्ज दिया है। इसके अलावा चीन ने मालदीव की कुछ सरकारी कंपनियों को विभिन्न आधारभूत प्रॉजेक्ट के लिए 90 करोड़ डॉलर का वाणिज्यिक ऋण दिया। यही नहीं, यामीन ने चीन को मारओ बंदरगाह देने के पश्चात उसके साथ ‘मुक्त व्यापार समझौता’ पर हस्ताक्षर किया। इस समझौते के तहत जुलाई 2015 को मालदीव की संसद ने एक बिल पास किया जो विदेशी निवेशकों को जमीन पर अधिकार प्रदान करता है। यह सब चीन के लिए किया गया था क्योंकि इसी कानून के आधार पर चीन सामरिक महत्व वाले 16 द्वीपों को ठेके (लीज) पर प्राप्त कर चुका है। इसके दो परिणाम हुए। एक तरफ इन द्वीपों पर चीन की लाल सेना के अड्डे बनने का रास्ता साफ हो गया और दूसरी तरफ मालदीव के चीन के आर्थिक उपनिवेश बनने का। यह स्थिति आने वाले समय में भारत के लिए बेहद जटिल होगी। इन स्थितियों को शक्तिहीन बनाने या समाप्त करने के लिए आवश्यक था कि मालदीव में यामीन की सत्ता समाप्त हो।

सितम्बर माह में हुए चुनाव में चीन समर्थक अब्दुल्ला यामीन की हार और भारत समर्थक माने जाने वाले मोहम्मद इब्राहीम सालिह की जीत से भारत को पहली सफलता मिली। नई सरकार की ताजपोशी भारत के लिए इतनी अहम थी कि पीएम नरेंद्र मोदी एक बुलावे पर रातोंरात राष्ट्रपति पद के शपथ ग्रहण समारोह में माले पहुंच गए और वहां जाकर उन्होंने संदेश दिया कि, ‘हमारी इच्छा स्थाई, लोकतांत्रिक, संपन्न और शांतिपूर्ण मालदीव देखने की है।’ महत्वपूर्ण बात यह रही कि नई सरकार ने आते ही चीन के साथ मुक्त व्यापार समझौते को रद्द कर दिया और चीन के साथ इस समझौते को मालदीव की सबसे बड़ी गलती करार दिया। जाहिर सी बात है कि यह चीन को अखरता और अखरा भी। इन स्थितियों से सम्भवत: चीन इस निष्कर्ष पर अवश्य ही पहुंचा होगा कि यह भारत के प्रभाव का असर है। जाहिर है चीन बौखलाता। शायद इसी बौखलाहट में चीन ने मालदीव पर अरबों डॉलर का बम फोड़ दिया। कुल मिलाकर मालदीव को चीन ने एक ऐसी समस्या में उलझा दिया है, जो उसे एक तरफ चीन के खिलाफ संघर्ष की ओर ले जा सकती है और दूसरी तरफ औपनिवेशिक तंत्र में जकड़ने की ओर। अब भारत ही उसे इस स्थिति से उबारने में मदद कर सकता है लेकिन भारत की अपनी आर्थिक सीमाएं हैं। अब देखना है कि भारत ने मालदीव में जो कूटनीतिक विजय हासिल की है उसे स्थायित्व कैसे प्रदान करेगा?

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