घुटनाटेक इमरान

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इमरान ने नए पाकिस्तान का नारा दिया था। पक्ष शुरुआत में मान रहा था कि इमरान स्वयं को अंतरराष्ट्रीय फलक पर अलग तरह से पेश करने की कोशिश करेंगे, लेकिन वे शायद यह निष्कर्ष निकालते समय जिन्ना एवं जनरल जिया की उस सोच को दरकिनार कर गये थे कि पाकिस्तान का अस्तित्व इस्लाम के बिना संकट में पड़ जाएगा। इमरान इस रास्ते से हट नहीं सकते, इसलिए पाकिस्तान सेना और इस्लाम की छाया में ही चलेगा।

21वीं सदी के इन दशकों में जहां मानव मूल्यों को विज्ञान के साथ जोड़ने की कोशिश हो रही हो, वहां यदि किसी राष्ट्र में ईश निंदा पर मौत की सजा दी जाए या फिर न्यायपालिका माफी दे और उस देश के लोग बगावत कर दें और सरकार उनके आगे घुटने टेक दे, तो ऐसे राष्ट्र को किस श्रेणी में रखा जाए, यह समझ में नहीं आता। हां, मैं पाकिस्तान की बात कर रहा हूं जो शायद आज तक इन दो मान्यताओं के बीच आत्मसंघर्ष कर रहा है कि वह एक राष्ट्र है भी या नहीं?
अभी कुछ दिन पहले ही एक ईसाई महिला आसिया बीबी को वहां के सर्वोच्च न्यायालय ने इस आरोप से बरी कर दिया गया कि उसने पैगम्बर-ए-इस्लाम की निंदा की थी।

यह मान लिया कि उसे ईश निंदा कानून में फंसाया गया था। इसके बाद एक राष्ट्र के रूप में पाकिस्तान का और नागरिकों के रूप में उसकी अवाम का सिर यह सोच कर फख्र से उठ जाना चाहिए था कि पाकिस्तान अब मध्यकाल के उस युग से बाहर आ चुका है जहां दूसरे धर्मों के अनुयाइयों को काफिर करार देकर सिर कलम कर दिया जाता था या हाथी के पैर के नीचे डालकर उसके सिर को कुचलवा दिया जाता था। लेकिन ऐसा हुआ नहीं। पाकिस्तान के लोगों ने बगावत कर बता दिया कि वे कट्टरपंथ की खोह से बाहर नहीं आ सकते। हालांकि शुरू में प्रधानमंत्री इमरान ख़ान ने चेतावनी दी थी कि राष्ट्र को चुनौती देने वालों से सख्ती से निबटा जाएगा। लेकिन सिर्फ तीन दिन बाद ही सरकार ने यू-टर्न लेते हुए तहरीक-ए-लब्बैक जैसे संगठन के सामने ठीक उसी तरह से घुटने टेक दिए जिस तरह से वह प्राय: तालिबान के आगे झुकती रही है। नतीजा यह हुआ कि जजों को धमकियां एवं गालियां दी जा रही हैं, आसिया का वकील देश छोड़कर चला गया है और आसिया बीबी का पता नहीं कि वह कहां है। जहां देश के सर्वोच्च न्यायालय के आदेश को लागू न कराया जा सके, क्या वास्तव में यह माना जा सकता है कि उस देश में कोई संविधान या सरकार है? स्पष्टत: नहीं। फिर तो जिन्ना के ‘इस्लाम खतरे में है’ की बुनियाद पर खड़े किए गये एक कृत्रिम राष्ट्र से लेकर जिया उल हक (वर्दी वाला मुल्ला) के धर्मतांत्रिक पाक या इमरान के नए पाक में कोई अंतर ही नहीं हुआ।

एक अंग्रेजी वेबसाइट न्यूयॉर्क पोस्ट में छपे एक किताब के हिस्से के रूप में आसिया द्वारा लिखे ये शब्द-‘‘मैं आसिया बीबी हूं जिसे प्यास लगने की वजह से मौत की सज़ा दी गई है। मैं जेल में हूं क्योंकि मैंने उसी कप से पानी पिया जिससे मुस्लिम महिलाएं पानी पीती थीं। क्योंकि एक ईसाई महिला के हाथ से दिया हुआ पानी पीना मेरे साथ काम करने वाली महिलाओं के मुताबिक हराम था।’ वास्तव में उस राष्ट्र के बारे में ही हो सकते हैं जो आज तक संविधान और कानून के अनुसार न चल पाया हो। जहां आज भी मध्यकाल की बर्बरता अवशेष संरक्षित और पोषित हो रहे हों। दरअसल यहां पर आसिया बीबी ने जो बात कह दी, वह दुनिया के कट्टरपंथी मुस्लिम (कम से कम पाकिस्तान के तो बिल्कुल ही नहीं) सुनने की क्षमता नहीं रखते।

ध्यान रहे कि जब उस पर धर्म परिवर्तन के लिए दबाव डाला गया तो उसने कह दिया कि ‘‘मैं धर्म परिवर्तन नहीं करूंगी क्योंकि मुझे ईसाई धर्म पर भरोसा है। ईसा मसीह ने मानवता के लिए सलीब पर अपनी जान दी। आपके पैगंबर मोहम्मद ने मानवता के लिए क्या किया है?’ यह अंतिम वाक्य शायद पाकिस्तान के कट्टरपंथियों को वहीं लेकर पहुंच गया जहां यह नारा बुलंद हो जाता है कि इस्लाम खतरे में है। उनका यही खतरा कभी सलमान तासीर अथवा शहबाज भट्टी जैसे उदारवादी राजनेताओं को मरवा देता है या फिर आसिया बीबी जैसी महिलाओं को।

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