ईरान के पीछे क्यों पड़े हैं ट्रम्प

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अमेरिका ने आठ देशों को छह महीने के लिए छूट दी है कि वे ईरान से तेल खरीदते रह सकते हैं, लेकिन उन्हें निरंतर अपनी खरीद घटानी होगी और अंतत: ईरान से तेल खरीदना बंद करना होगा। इन आठ देशों में भारत के अलावा चीन, जापान, इटली, यूनान, दक्षिण कोरिया, ताइवान और तुर्की का नाम है। इनमें अनेक देश अमेरिकी खेमे के ही हैं। लेकिन भारत और चीन अंतत: क्या करेंगे, अभी कहना मुश्किल है। भारत के लिए ईरान तेल की खरीद के लिहाज से तो महत्वपूर्ण है। इराक और सऊदी अरब के बाद भारत सबसे अधिक तेल ईरान से ही खरीदता है।

ईरान पर अमेरिकी आर्थिक प्रतिबंध लागू हो गए हैं। बराक ओबामा के कार्यकाल में ईरान से हुए नाभिकीय समझौते के डोनाल्ड ट्रम्प शुरू से ही खिलाफ थे। उनकी नीति से अमेरिका में भी कम ही लोग सहमत हैं। अमेरिका के बाहर तो अधिकांश देशों ने उनकी ईरान संबंधी नीति का विरोध ही किया है। यूरोपीय संघ ईरान पर आर्थिक प्रतिबंध लगाए जाने के विरुद्ध है। चीन और रूस तो खुलेआम आर्थिक प्रतिबंधों का विरोध कर चुके हैं। भारत पर इन प्रतिबंधों का विशेष असर पड़ने वाला है। इसलिए राजनयिक स्तर पर इस बात की कोशिश होती रही कि भारत की विशेष परिस्थितियों को देखते हुए अमेरिका भारत को प्रतिबंधों के दायरे के बाहर रखे। अमेरिकी कांग्रेस और सीनेट दोनों जगह भारत को राहत दिए जाने की मांग की जाती रही। राष्ट्रपति डोनाल्ड की ओर से भी मिश्रित संकेत मिलते रहे। कभी कहा गया कि अमेरिका ऐसी कोई राहत नहीं देने वाला। अन्य अवसरों पर कहा गया कि भारत की स्थिति पर विचार किया जा सकता है। भारत ने अनेक बार घोषणा की कि वह केवल संयुक्त राष्ट्र द्वारा लगाए जाने वाले आर्थिक प्रतिबंधों को स्वीकृति देता है। इसका अर्थ यह था कि भारत अमेरिकी प्रतिबंधों को मानकर ईरान से तेल खरीदना बंद नहीं करेगा। लेकिन अपनी यह नीति घोषित करना एक बात है। पर उसके परिणाम इतनी आसानी से अनदेखे नहीं किए जा सकते। अमेरिका का अंतरराष्ट्रीय वित्तीय संस्थाओं पर नियंत्रण है। कोई भी बैंक ईरान से व्यापार के भुगतान का माध्यम बनने का जोखिम नहीं उठाएगा। पिछली बार जब प्रतिबंध लगे थे तो ईरान रुपये में तेल के भुगतान पर सहमत हो गया था। पर कई कठिनाइयां आई थीं।

इस बार स्थिति पहले से भी विकट है। इसलिए भारत अपने विकल्पों पर भी विचार करता रहा है। फिलहाल उसे अमेरिकी प्रतिबंधों से राहत दे दी गई है। अमेरिका ने आठ देशों को छह महीने के लिए यह छूट दी है कि वे ईरान से तेल खरीदते रह सकते हैं, लेकिन उन्हें निरंतर अपनी खरीद घटानी होगी और अंतत: ईरान से तेल खरीदना बंद करना होगा। जब तक कि ईरान अमेरिका से किसी नए समझौते के लिए तैयार नहीं हो जाता। इन आठ देशों में भारत के अलावा चीन, जापान, इटली, यूनान, दक्षिण कोरिया, ताइवान और तुर्की का नाम है। इनमें अनेक देश अमेरिकी खेमे के ही हंै। लेकिन भारत और चीन अंतत: क्या करेंगे, अभी कहना मुश्किल है। भारत के लिए ईरान तेल की खरीद के लिहाज से तो महत्वपूर्ण है ही। इराक और सऊदी अरब के बाद भारत सबसे अधिक तेल ईरान से ही खरीदता है। लेकिन सवाल तेल की उपलब्धि का ही नहीं है। अमेरिका भारत को तेल प्राप्त करने के वैकल्पिक स्रोत उपलब्ध करवाने के लिए तैयार है। पर भारत ईरान से अपने कूटनीतिक संबंधों के प्रति भी संवेदनशील है। पाकिस्तान से हमारे संबंध खराब हंै। इसलिए अफगानिस्तान तक पहुंचने का रास्ता ईरान से ही होकर हो सकता है। मध्य एशिया और यूरोप तक जाने के स्थल मार्ग के निर्माण में भारत, रूस और ईरान सहयोग कर रहे हैं। ये तीनों देश जिस तरह का उत्तर-दक्षिण कॉरिडोर बना रहे हैं, वह एक तरह से चीन के वन वेल्ट-वन रोड का जवाब भी है। अमेरिका इस पहल की क्यों बाधा बन रहा है, इसे समझना मुश्किल है। ऐसा करके अमेरिका अपने हितों को भी नुकसान पहुंचा रहा है।

इस अमेरिकी नीति का अब तक सऊदी अरब और उसके सहयोगी सुन्नी अरब देशों ने समर्थन किया है। उनके अलावा इस्राइल ही अमेरिकी प्रतिबंधों के समर्थन में आगे आया है। सभी देश ईरान की बढ़ती हुई शक्ति से चिंतित हैं। मध्य-पूर्व में लगभग 40 प्रतिशत आबादी शिया है। इराक शिया बहुल है। सीरिया में बहुसंख्या सुन्नियों की है, लेकिन सत्ता शियाओं के पास है। इसीलिए ईरान सीरिया के राष्ट्रपति असद की पीठ पर है। असद को केवल ईरान का ही समर्थन प्राप्त नहीं है। रूस भी उनकी मदद कर रहा है। अमेरिका ने शुरू में रूस को असद से अलग करने की कोशिश की। लेकिन रूस को लेकर राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रम्प ने जो सकारात्मक रवैया दिखाया था, उसे अमेरिकी सत्ता प्रतिष्ठान का समर्थन नहीं मिला। इसलिए ट्रम्प की रूस से मिलकर एक नई धुरी बनाने की योजना लटक गई। हालांकि अभी उन्होंने उम्मीद नहीं छोड़ी और यहां तक कहा गया है कि रूस के राष्ट्रपति पुतिन को ह्वाइट हाउस में आमंत्रित किया जाएगा। इससे यह निष्कर्ष नहीं निकाला जा सकता कि रूस अमेरिका के कहने पर मध्य-पूर्व में अपनी रणनीति बदल लेगा। उस्मानी साम्राज्य की समाप्ति के बाद से रूस मध्य-पूर्व में निरंतर एक बड़ी उपस्थिति बना रहा है। शुरू में ब्रिटेन, फ्रांस और रूस ने इस पूरे क्षेत्र को अपने प्रभाव वाले इलाकों में बांट लिया था। अब फ्रांस उतना सक्रिय नहीं है। लेकिन अमेरिका सऊदी अरब के सहारे अपनी गहरी पैठ बनाए हुए हैं। पर मध्य-पूर्व को लेकर अमेरिका का लक्ष्य क्या है, यह कहना बड़ा मुश्किल है।
अमेरिका की एक नीति तो स्पष्ट है कि वह मध्य-पूर्व में कोई बड़ी चुनौती नहीं उभरने देना चाहता। अरबों और यूरोपीयों के बीच पुरानी प्रतिद्वंद्विता है। इस्लाम के उदय के बाद अरब यूरोप से बड़ी शक्ति बन गए थे। वह समय रोम साम्राज्य के बिखरने और इस्लाम के विस्तार का समय था। स्पेन तो लंबे समय तक मुस्लिम अधिपत्य में रहा। यूरोप ने दरअसल 1000 ईस्वी में स्वरूप लेना शुरू किया था। उसके बाद उसे अरबों से निरंतर चुनौती मिलती रही। अब ईसाई-मुस्लिम प्रतिद्वंद्विता और भी कठिन स्वरूप ले चुकी है। जेहाद के नाम पर आतंकवादी संगठनों का उदय हुआ। लेकिन उनसे भी पहले अमेरिका इराक के सद्दाम हुसैन और लीबिया के कज्जाफी को लेकर परेशान था। उसे लगता था कि उनमें समूचे अरब देशों की शक्ति संगठित करके यूरोप-अमेरिका के लिए चुनौती बनने की क्षमता है। 2003 में सद्दाम हुसैन को समाप्त करने के लिए अमेरिका ने इराक पर आक्रमण किया। बाद में लीबिया को भी कज्जाफी के शासन से मुक्त करवाया गया। लेकिन इस प्रक्रिया में अमेरिका ने इस पूरे क्षेत्र को अराजकता में पहुंचा दिया। इस अराजकता में स्वयं अमेरिका फंसा हुआ है। इस्लामिक स्टेट की चुनौती समाप्त करने में अमेरिका को काफी पसीना बहाना पड़ा है। इराक को सद्दाम हुसैन से मुक्त करके अमेरिका ने अनचाहे ईरान को मजबूत कर दिया है। क्योंकि अब ईरान अधिक बड़े क्षेत्र में शिया आबादी के संपर्कों के सहारे अपना प्रभाव बढ़ाने की स्थिति में है।

अमेरिका भारत को तेल प्राप्त करने के वैकल्पिक स्रोत उपलब्ध करवाने के लिए तैयार है। पर भारत ईरान से अपने कूटनीतिक संबंधों के प्रति भी संवेदनशील है। पाकिस्तान से हमारे संबंध खराब हंै। इसलिए अफगानिस्तान तक पहुंचने का रास्ता ईरान से ही होकर हो सकता है। मध्य एशिया और यूरोप तक जाने के स्थल मार्ग के निर्माण में भारत, रूस और ईरान सहयोग कर रहे हैं। ये तीनों देश जिस तरह का उत्तर-दक्षिण कॉरिडोर बना रहे हैं, वह एक तरह से चीन के वन वेल्ट-वन रोड का जवाब भी है।

ईरान में हुई इस्लामी क्रांति के बाद अमेरिका ने उसे अपना शत्रु मान लिया था। शुरू में सद्दाम हुसैन को उकसाकर इराक-ईरान युद्ध करवाया गया। वह अनिर्णित रहा और जब सद्दाम हुसैन ने कुवैत पर आक्रमण करके सऊदी अरब के लिए खतरा पैदा कर दिया तो अमेरिका ने उसे समाप्त करने का निर्णय ले लिया। ईरान के शिया इस्लाम की बागडोर अपने हाथ में लेने के लिए आरंभिक खलीफाओं के जमाने से प्रयासरत रहे हैं। इस्लामी क्रांति के बाद उन्होंने फिर से यह दावा किया कि उन्होंने इस्लाम के अनुरूप राज्य स्थापित कर दिया है। यही सुन्नी सऊदी अरब और शिया ईरान के बीच तनातनी का बड़ा कारण है। दोनों देश यमन से लगाकर सीरिया तक कई जगह एक-दूसरे से उलझे हुए हैं। अमेरिका सदा सऊदी अरब की पीठ पर रहा है। लेकिन पिछले दिनों वह जिस तरह का समझौता फिलीस्तीनी और इस्राइलियों के बीच करवाने में लगा है। उससे स्थिति और जटिल हो सकती है। अमेरिका सऊदी अरब पर दबाव डालकर कोई भी समझौता उससे स्वीकार करवा सकता है, लेकिन इससे आईएस जैसा कोई नया संगठन उभरकर आ सकता है। ईरान को लेकर अमेरिका की सबसे बड़ी चिंता यह है कि वह नाभिकीय हथियार बनाने की क्षमता रखता है। उसी आशंका को समाप्त करने के लिए ईरान पर आर्थिक प्रतिबंध लगाए जाते रहे हैं। बराक ओबामा ने बीच का रास्ता निकालने की कोशिश करते हुए ईरान से समझौता किया था। लेकिन उस समझौते के आलोचकों का कहना है कि इससे ईरान का नाभिकीय कार्यक्रम टल जरूर गया है पर समाप्त नहीं हुआ। दस वर्ष बाद फिर से वह नाभिकीय हथियार बनाने के लिए स्वतंत्र हो जाएगा।
ईरान के नाभिकीय कार्यक्रम को लेकर अमेरिका जिस तरह की चिंता दिखाता रहा है, वैसी चिंता उसने पाकिस्तान के नाभिकीय कार्यक्रम को लेकर नहीं दिखाई थी। उसका एक कारण तो यह था कि उस समय पाकिस्तान अमेरिकी खेमे में था, जबकि भारत अपनी स्वतंत्र नीति पर चल रहा था। भारत के नाभिकीय परीक्षण के बाद अमेरिका को अपने खेमे के पाकिस्तान पर सख्ती बरतने की जरूरत नहीं लगी। दूसरे सऊदी अरब का मानना है कि पाकिस्तान के नाभिकीय हथियार आवश्यकता पड़ने पर उनके और अन्य सुन्नी देशों के काम भी आएंगे। अगर ईरान नाभिकीय शक्ति बनता है तो पाकिस्तान सुन्नी होने के नाते सुन्नी अरब शक्तियों के साथ ही खड़ा होगा। हालांकि इस आशावादिता का आधार बहुत कमजोर है। पाकिस्तान अपने पड़ोसी ईरान से दुश्मनी का जोखिम उठाने के लिए आसानी से तैयार नहीं होगा। बहरहाल पाकिस्तान के नाभिकीय हथियार अब और भी बड़ा खतरा हो गए हैं। पाकिस्तानी राज्य सत्ता सेना के बल पर टिकी हुई है और सेना में जेहादी तत्वों की कमी नहीं है। यह आशंका आरंभ से व्यक्त की जाती रही कि नाभिकीय हथियार आतंकवादियों के हाथ में पड़ गए तो स्थिति बहुत खतरनाक हो जाएगी। अमेरिका को लगता है कि वह पाकिस्तान के नाभिकीय प्रतिष्ठान को कभी भी अपने नियंत्रण में ले सकता है। लेकिन यह खुशफहमी अधिक है। इस समय पाकिस्तान का नाभिकीय कार्यक्रम चीन से सहयोग के आधार पर फल-फूल रहा है। इसलिए अमेरिका को पाकिस्तान की नाभिकीय शक्ति को हल्के तरीके से नहीं आंकना चाहिए। भारत के लिए तो वह बड़ी चुनौती है ही।
ईरान पर कड़े आर्थिक प्रतिबंध लगाकर डोनाल्ड ट्रम्प क्या हासिल करना चाहते हैं, यह अभी किसी को स्पष्ट नहीं है। ईरान की आर्थिक कठिनाइयां बढ़ाकर उसे एक नए नाभिकीय समझौते के लिए मजबूर किया जा सकता है, यह सोचना नादानी होगी। डोनाल्ड ट्रम्प ने अपने आक्रामक व्यवहार से सभी को नाराज कर रखा है। उसके आर्थिक प्रतिबंध कितने लागू हो पाएंगे, अभी कहना मुश्किल है। स्वयं यूरोपीय संघ इन प्रतिबंधों पर अपनी अप्रसन्नता उजागर कर चुका है। अमेरिका ने इन प्रतिबंधों से इटली और यूनान को छह महीने की छूट दी है। लेकिन अन्य देश अमेरिकी नीति के पीछे चलने को आसानी से तैयार नहीं हो जाएंगे। ईरान के तेल का भारत के साथ-साथ चीन भी बड़ा खरीददार है। वह भी प्रतिबंधों को लांघने का कोई न कोई तरीका निकाल लेगा। फिलहाल उसे भी छह महीने की छूट दी गई है। निश्चय ही ट्रम्प को यह गलतफहमी नहीं हो सकती कि वे ईरान को छह महीने में घुटने टेकने के लिए विवश कर देंगे। ईरान अपनी टेक पर अड़ा हुआ है। वह आशा कर रहा है कि अमेरिका के साथ-साथ जिन अन्य शक्तियों ने 2015 में हुए नाभिकीय समझौते पर दस्तखत किए थे, वे इसे तोड़ने में अमेरिका का साथ नहीं देंगे। यह सही है कि ईरान की अर्थव्यवस्था काफी कुछ तेल की बिक्री पर टिकी हुई है। लेकिन ईरान के पास भी विकल्प हैं और वे इतनी आसानी से अमेरिका के सामने घुटने टेकने के लिए तैयार नहीं होगा।
ईरान के खिलाफ मध्य-पूर्व में एक नया शक्ति समीकरण बन रहा है। इस्राइल को लगता है कि ईरान का बढ़ता हुआ प्रभाव उसके लिए अधिक बड़ी चुनौती है। इसलिए वह ईरान के खिलाफ सऊदी अरब और उसके सहयोगी देशों से सहयोग करने के लिए तैयार हो गया है। यह पहली बार हो रहा है कि सुन्नी अरब इस्राइल को व्यापक स्वीकृति देने के लिए तैयार दिखाई दे रहे हैं। अरब देशों के बदले हुए रुख ने फिलीस्तीनियों को भी कमजोर किया है और वे अमेरिकी दबाव में आ सकते हैं। लेकिन इस क्षेत्र की राजनीति का एक सिरा तुर्की भी है। तुर्की अब तक उदार नीतियों पर चलकर इस्लाम की कट्टर शक्तियों के खिलाफ खड़ा था। उसे आशा थी कि उसे यूरोपीय बिरादरी में शामिल कर लिया जाएगा। जब यह स्पष्ट हो गया कि यूरोपीय देश उसे साथ लेने के लिए तैयार नहीं है तो तुर्की में कट्टरपंथी इस्लाम ने जड़ें जमाना शुरू किया। आज तुर्की अपना पुराना रास्ता छोड़कर कट्टर इस्लाम के रास्ते पर जाता दिखाई दे रहा है। इस क्षेत्र की एक और समस्या कुर्द है। वे अधिकांशत: सुन्नी हैं और कई देशों में फैले हुए हैं। वे सीरिया से लगाकर तुर्की तक सबका सर दर्द बने हुए हैं। अमेरिका चाहता है कि इस्लाम की शक्ति बिखरी रहे। लेकिन वह अपनी नीतियों से नित नई कट्टरपंथी शक्तियां पैदा कर रहा है। ईरान के बारे में उसकी नीति के परिणाम भी इससे भिन्न नहीं होंगे। शियाओं के बीच अमेरिका विरोधी धारणाएं बढ़ेंगी और अब उनके आतंकवादी संगठनों का सिलसिला शुरू हो जाएगा। ट्रम्प के पास इन सभी प्रश्नों का जवाब नहीं है, लेकिन वे आक्रामक नीति छोड़ने वाले नहीं हैं।

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