राफेल आ मुझे मार

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राफेल का मुद्दा कांग्रेस पर उलटा पड़ गया है। यह बात सामने आई है कि कांग्रेस पार्टी ने ही राफेल सौदे से रिलायंस को जोड़ा था। उसी वक्त दासॉल्ट ने तय कर लिया था कि इस सौदे में वह रिलायंस को अपना साझीदार बनाएगा। तत्कालीन संप्रग (संयुक्त प्रगतिशील गठबंध) सरकार की जानकारी में यह बात थी। स्वयं तत्कालीन रक्षा मंत्री एके. एंटनी को भी पता था कि दासॉल्ट हिन्दुस्तान एरोनॉटिक्स लि. (एचएएल) को मुख्य साझीदार नहीं बनाना चाहती है। उसे एचएएल की क्षमता पर भरोसा नहीं था।

एके. एटंनी ने दासॉल्ट की शंका को दूर करने का प्रयास किया था, लेकिन वे  विफल रहे! और सौदा लटक गया। भाजपा की सरकार ने उसे अंजाम तक पहुंचाया। इसका स्वागत करने के बजाय कांग्रेस राफेल सौदे में घोटाले का आरोप लगा रही है।

“राफेल को लेकर बहुत शोर है। राहुल गांधी उसके सहारे राजनीति चमकाने की कोशिश में  लगे हैं। उन्हें किसी ने समझा दिया है कि बोफोर्स की तरह राफेल भी मसला बन सकता है।”

भाजपा का दावा है कि राफेल सौदे में गांधी परिवार को कुछ नहीं मिला है, इसलिए वह बौखला गई और प्रधानमंत्री पर आरोप लगा रही है। उनकी मानें तो गांधी परिवार ने तरकीब बहुत लगाई थी। बाकायदे कांग्रेस के डीलर रॉबर्ट वाड्रा को ‘दलाली’ का काम सौंपा गया था। उन्होंने संजय भंडारी को लगाया। वे दासॉल्ट से साझीदारी करने की कोशिश करने लगे।

पार्टी का दावा है कि तत्कालीन संप्रग सरकार ने संजय भंडारी के साथ समझौता करने के लिए दासॉल्ट पर दबाव बनाया। पर वे तैयार नहीं हुए। उसने संजय भंडारी की कंपनी के साथ समझौता करने से इनकार कर दिया। भाजपा के मुताबिक इससे संप्रग सरकार खफा हो गई और उसने राफेल समझौते पर फ्रांस सरकार से पुनर्विचार करने के लिए कहा। लिहाजा बातचीत अधर में लटक गई।

भाजपा के मुताबिक यह सौदा कांग्रेस की वजह से 10 साल पीछे चल गया। पहली बार इसकी जरूरत 2001 में महसूस हुई।

“कांग्रेस जो आरोप सरकार पर लगा रही है, वह सही है या कांग्रेस की राजनीति का हिस्सा है, यही सवाल खड़ा हो रहा है। पिछले पांच साल में राफेल पर देश-विदेश में जो खबरें आई हैं, उन पर गौर किया जाये तो तस्वीर कांग्रेस के दावे से अलग नजर आती है।”

 

वायु सेना ने तत्कालीन एनडीए सरकार को लड़ाकू विमानों की आवश्यकता से अवगत कराया। सरकार ने सेना की जरूरत को पूरा करने का काम शुरू किया। लेकिन बीच में सरकार चली गई। 2004 में कांग्रेस के नेतृत्व वाली सप्रंग सरकार सत्ता में आई। सेना ने सरकार से गुहार लगाई। उसने बताया कि विमान सुरक्षा के लिहाज से कितना आवश्यक है।

सप्रंग सरकार ने सेना की बात और उस पर पहल की। 2007 में लड़ाकू विमान के बाबत निविदा निकाली। पांच साल बाद यानी 2012 में सरकार ने तय किया कि विमान की खरीद फ्रांस से होगी।

कंपनी के तौर पर दासॉल्ट को चुना गया। यही वह कंपनी है, जिससे मिराज 2000 को लेकर समझौता हुआ था। इससे ही राफेल की खरीद को लेकर बातचीत शुरू हुई। तय हुआ कि भारत 126 राफेल विमान खरीदेगा। 18 सीधे दासॉल्ट से लिया जाएगा। बाकी 108 दासॉल्ट भारत में ही बनाएगा।

साझीदार के तौर पर हिन्दुस्तान एरोनॉटिक्स लि. (एचएएल) को चुना गया। लगा कि सब कुछ ठीक चल रहा है। लेकिन ऐसा था नहीं। राफेल खरीद को लेकर अचानक घोटाले की खबर आने लगी। आरोप सीधा कांग्रेस की तत्कालीन अध्यक्ष सोनिया गांधी पर लगा। इससे रक्षामंत्री एके.एंटनी घबरा गए। उन्हें लगा कि अगर कुछ गड़बड़ हुआ तो उनकी छवि खराब हो जाएगी। इसलिए वे फूंक-फूक कर कदम रखने लगे। किसी भी फाइल पर दस्तखत करने से बचने लगे। इसी बीच दासॉल्ट और एचएएल को लेकर खबरें आने लगी।

कहा जाने लगा कि एचएएल के साथ काम करने के लिए दासॉल्ट तैयार नहीं है। वह रिलायंस को साझीदार बनाने के पक्ष में है। खबरों में यह भी आने लगा कि जो विमान एचएएल बनाएगा, उसकी जिम्मेदारी दासॉल्ट नहीं लेगा। इन्हीं खबरों के बीच रक्षामंत्री फ्रांस गए। लेकिन 126 राफेल विमान को लेकर अंतिम निर्णय नहीं हो पाया। समझौते के लिए बातचीत चलती रही।

भाजपा का दावा है कि समझौता इसलिए नहीं हो पाया क्योंकि दलाली की रकम तय नहीं हुई। जो भी रहा हो, राफेल समझौते तक नहीं पहुंच पाया। बस वार्ता ही होती रही। इसी बीच 2014 में सत्ता परिवर्तन हो गया। नरेन्द्र मोदी के नेतृत्व में एनडीए सत्ता में आई। वार्ता का नया दौर चला। सरकार ने रक्षा सौदे के लिए निविदा निकालने के बजाए, ‘गवर्मेंट टू गवर्मेंट’ रास्ते को चुना।

2015 में फ्रांस और भारत के बीच राफेल को लेकर समझौता हुआ। उसमें तय हुआ कि सरकार 36 राफेल विमान सीधे फ्रांस से खरीदेगा। उसकी कीमत 60 हजार करोड़ रुपये बताई जा रही है। समझौते के मुताबिक 30 हजार करोड़ रुपये ‘मेक इन इंडिया’ के तहत भारत में निवेश किया जाएगा। उसके लिए दासॉल्ट ने रिलायंस और एचएएल समेत 72 कंपनियों को साझीदार बनाया है।

कांग्रेस राफेल सौदा पर सवाल उठा रही है। उसका दावा है कि सौदा में लेन-देन हुआ है। उसका दावा है कि दासॉल्ट का मुख्य साझीदार रिलायंस को सरकार ने बनवाया है। सरकार की ही पहल पर एचएएल को दासॉल्ट ने मुख्य साझीदार नहीं बनाया। कांग्रेस जो आरोप सरकार पर लगा रही है, वह सही है या कांग्रेस की राजनीति का हिस्सा है, यही सवाल खड़ा हो रहा है। पिछले पांच साल में राफेल पर देश-विदेश में जो खबरें आई हैं, उन पर गौर किया जाये तो तस्वीर कांग्रेस के दावे से अलग नजर आती है।

हिन्दुस्तान एरोनॉटिक्स लिमिटेड विवाद

हिन्दुस्तान एरोनॉटिक्स लिमिटेड (एचएएल) के मामले में कांग्रेस सरकार को कठघरे में खड़ा कर रही है। लेकिन अगर खबरों पर गौर करें तो पता चलता है कि एचएएल पर विदेशियों को भरोसा नहीं था। उन्हें एचएएल की तकनीकी क्षमता पर संदेह रहा है। इस तरह की पहली खबर फरवरी 2011 में आई थी। वह ‘फाइनेंशियल टाइम्स’ में छपी थी।

उसके मुताबिक अमेरिकी राजदूत टिमोथी रोमर एचएल को तकनीकी रूप से दक्ष नहीं मानते थे। उन्होंने इस बाबत अमेरिका को रिपोर्ट भेजी थी। उसमें कहा था कि एचएएल इस काबिल नहीं है कि बोइंग और लाकहीड मार्टेन के साथ साझेदारी करे। ‘द क्विंट’ लिखता है कि इसी को आधार बनाकर दासॉल्ट एविएशन ने एचएएल पर शंका जाहिर की। तब की तत्कालीन यूपीए सरकार ने दासॉल्ट की शंका दूर करने का प्रयास किया।

रक्षा मंत्री एके एंटनी, दासॉल्ट के अधिकारियों को लेकर एचएएल की नासिक फैक्टरी गए। यहीं पर सुखोई-30 जेट फाइटर बन रहा था। उसे देखकर दासॉल्ट के अधिकारी खुश नहीं हुए। उन्होंने अपनी नाखुशी जाहिर कर दी।  सरकार को बताया कि एचएएल के साथ जुड़कर कंपनी अपनी वैश्विक साख’ खत्म नहीं करना चाहती। यह सुनकर एंटनी काफी नाराज हो गए थे। उन्होंने कहा था कि फ्रांस सरकार अपना निर्णय नहीं बदल सकती। लेकिन दासॉल्ट अपने निर्णय पर अड़ा हुआ था। वह किसी भी कीमत पर एचएएल के साथ सौदा करने को तैयार नहीं था।

5 अप्रैल 2013 में ‘रायटर’ ने एक रिपोर्ट की। रायटर दासॉल्ट के हवाले से लिखता है ‘एचएएल’ के पास एयरक्राफ्ट को एसेंबल करने की न योग्यता है और न क्षमता। यही वजह है कि दासॉल्ट 108 राफेल लडाकू विमान की गारंटी देने के लिए तैयार नहीं है। जबकि भारत सरकार चाहती थी कि सभी लड़ाकू विमानों की गारंटी दासॉल्ट ले। पर दासॉल्ट बस 18 विमानों की गारंटी देने को तैयार है।

उसका कहना है कि 108 विमानों के लिए सरकार अलग से समझौता करे। रायटर के मुताबिक दासॉल्ट चाहता है कि  भारत सरकार से दो अलग-अलग समझौता करे। पहला उन विमानों के लिए जो भारत सीधे फ्रांस से खरीदेगा और दूसरा उन 108 विमानों के लिए जो एचएएल में बनेगा। मगर भारत सरकार इसके लिए तैयार नहीं थी।

हालांकि सरकार ने इसे जाहिर नहीं किया। कई बार लोकसभा में रक्षा मंत्री एके एंटनी से समझौते के बारे में पूछा गया, पर उन्होंने कोई जवाब नहीं दिया। जब वे जुलाई 2013 में फ्रांस की तीन दिवसीय यात्रा से लौटे तो मानसून सत्र में उनसे एक बार फिर सवाल पूछा गया। उन्होंने 13 अगस्त 2013 को बताया- फ्रांस से राफेल को लेकर बातचीत चल रही है।

मगर एटंनी ने वह नहीं बताया जो 25 दिसंबर 2013 को ‘द हिन्दू बिजनेस लाइन’ ने छापा।  वह लिखता है कि दासॉल्ट, एचएएल के साथ काम करने के लिए तैयार नहीं है। वह एचएएल को मुख्य साझीदार बनाने के पक्ष में नहीं है। 2014 में सत्ता बदलने के बाद वार्ता का नया दौर चला। लेकिन बात एचएएल पर आकर लटक जाती थी।

मोदी सरकार इस पक्ष में थी कि दासॉल्ट और एचएएल की बीच समझौता हो। या यूं कहा जाए कि मोदी सरकार चाहती थी कि मुख्य साझीदार एचएएल बने। यह बात फ्रांस के रक्षा खरीद मुखिया लॉरेंट कोलेट बिल्लोन ने 9 फरवरी 2015 की वार्षिक प्रेस वार्ता में कही। अमेरिका के प्रतिष्ठित पोर्टल ‘एविएशन वीक’ ने इस पर लंबी रिपोर्ट लिखी है।

पोर्टल कमारेंट कोलेट के हवाले से लिखता है ‘भारत सरकार एचएएल को लेकर लाचीला रुख नहीं अपना रही है। वह चाहती है कि एयरक्रॉफ्ट एचएएल ही एसेंबल करे।’ इन खबरों से जाहिर होता है कि नरेन्द्र मोदी सरकार हर हाल में यही चाहती थी कि मुख्य साझीदार एचएएल को बनाया जाए। फिर सवाल यह है कि एचएएल के बजाय दासॉल्ट ने रिलायंस को मुख्य साझीदार क्यों बनाया?

रिलायंस मुख्य साझीदार कैसे बना?

रिलायंस से दासॉल्ट का समझौता 2012 में हो गया था। पर भारत सरकार और दासॉल्ट के बीच समझौता न हो पाने के कारण दासॉल्ट और रिलायंस की बात आगे नहीं बढ़ पाई। लेकिन दासॉल्ट  चाहता था कि उसका मुख्य साझीदार रिलायंस बने। यह सब चल ही रहा था कि रिलायंस घराने में फेरबदल रक्षा क्षेत्र से मुकेश अंबानी निकल गए और उसे अनिल अंबानी को सुपुर्द कर दिया। मगर इससे दासॉल्ट का रिलायंस पर भरोसा कम नहीं हुआ।

25 दिसंबर 2013 को ‘द हिंदू बिजनेस लाइन’ में छपी खबर इसका प्रमाण है। खबर के मुताबिक दासॉल्ट, रिलायंस को अपना मुख्य साझीदार बनाना चाहती है। पर वह सरकार के रवैए से दुखी है क्योंकि सरकार का जोर एचएएल को लेकर है। इसी तरह की एक रिपोर्ट अमेरिकन वेबसाइट ‘एविएशन वीक’ ने 12 फरवरी 2015 को की।

खबर की मानें तो दासॉल्ट 75 बिलियन डॉलर वाले रिलायंस से खासा प्रभावित है। उसका कहना है कि रिलायंस एरोस्पेस और रक्षा क्षेत्र में कामकाज करना चाहता है। दासॉल्ट के मुताबिक रिलायंस ने नया होने के बावजूद रक्षा क्षेत्र में बेहतर काम किया है। ‘इकोनोमिक्स टाइम्स’ के मुताबिक दासॉल्ट ने रिलायंस से जो समझौता पहले किया था, उसने अनिल अंबानी के साथ जुड़ने में बड़ी भूमिका अदा की।

दूसरा दासॉल्ट को इकाई स्थापित करने के लिए जिस तरह के जगह की जरूरत थी, वह भी रिलायंस के पास मौजूद थी।

इसी वजह से दासॉल्ट ने रिलायंस को चुना थ। दासॉल्ट एविएशन के मुख्य कार्यकारी अधिकारी एरिक ट्रैपियर ने ‘इंडिया टुडे’ को दिए गए साक्षात्कार में इसे स्वीकार किया है। वह 10 मार्च 2018 का है। उसमें पूछा गया कि क्या भारत सरकार ने रिलायंस को साझीदार बनाने के लिए कहा था? तो उनका सीधा जवाब था ‘रिलायंस का चयन दासॉल्ट एविएशन ने किया है।’ वे आगे कहते हैं कि नियम के मुताबिक हम अपना साझीदार चुनने के लिए स्वतंत्र हैं। इसलिए बतौर साझीदार रिलायंस और एचएएल समेत कई कंपनियां को चुना गया है।

राफेल मूल्य विवाद

कांग्रेस का आरोप है कि राफेल को दोगुनी कीमत में खरीदा गया है। सरकार कह रही है कि कांग्रेस जितने में राफेल खरीद रही थी, उससे सस्ता और ज्यादा अच्छा है। ‘इंडिया टुडे’ में छपा दासॉल्ट एविएशन के मुख्य कार्यकारी अधिकारी इरिक ट्रैरेपे का साक्षात्कार, इसकी पुष्टि करता है जो 10 मार्च 2018 का है। उनसे कहा गया कि राफेल की कीमत आपके दस्तावेज में 7.4 बिलियन यूरो यानि तकीबन 60 हजार करोड़ रुपये बताई गयी है।

वे कहते हैं कि जिस राशि की बात आप कर रहे हैं वह राफेल की नहीं है, बल्कि राफेल और मिराज की है। इरिक कहते हैं ‘वार्षिक रिपोर्ट’ में जो कीमत बताई जा रही है, वह बाजार की जरूरत है।’ लेकिन मैं यह नहीं कह रहा हूं कि सौदा 60 हजार करोड़ रुपये का है। राफेल के लिए कितना लिया जा रहा और मिराज के लिए कितना, इसकी जानकारी मेरे पास है, लेकिन मैं उसे जाहिर नहीं कर सकता। वे यहीं नहीं थमे। उन्हेंने कहा कि मिस्र या कतर को जो राफेल दिया गया है उसकी तुलना भारत को दिए जा रहे राफेल से करना गलत है।

राफेल की कीमत सबके लिए एक है। अंतर सुविधा को लेकर है। एरिक कहते हैं कि भारत से जो समझौता हुआ है, वह मिस्र से अलग है। कांग्रेस यह दावा करती रही है कि दासॉल्ट ने मिस्र को राफेल, भारत से आधी कीमत पर दिया है। अपने दावे को प्रमाणित करने के लिए उसने दासॉल्ट की वार्षिक रिपोर्ट का हवाला भी दिया। उन सारे दावों और प्रमाणों को एरिक के साक्षात्कार ने खारिज कर दिया है।

 

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