रहस्य खोलती तस्वीर

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सीबीआई नए सबूत हासिल करने का दावा कर रही है, इसलिए उसने सुप्रीम कोर्ट का दरवाजा खटखटाया है। वह 2005 में ही जाना चाहती थी। लेकिन मनमोहन सिंह सरकार ने उसे सुप्रीम कोर्ट जाने से रोक दिया। तब से बोफोर्स मामला ठंडा पड़ा था।

सीबीआई ने उसे एक बार फिर गरमा दिया है। वह पूरे मामले की दोबारा जांच करना चाहती है। इसकी वजह अमेरिकी निजी जांच एजेंसी फेयरफैक्स के मालिक माइकल हर्शमैन का बयान है। माइकल ने एक टीवी साक्षात्कार में कहा है ‘उनके पास बोफोर्स सौदे में रिश्वत देने के सबूत हैं।’

उनका दावा है कि घोटाले में बहुत शक्तिशाली लोग शामिल हैं। इस वजह से मामले को नतीजे तक पहुंचने नहीं दिया गया। यह सीबीआई की विशेष अनुमति याचिका में दर्ज है, जो पिछले दिनों सुप्रीम कोर्ट में दायर की है।

इसके जरिए एजेंसी ने हाईकोर्ट के फैसले को चुनौती दी है। यह वह फैसला था, जिसने सबको चौंका दिया था। सीबीआई समेत पूरा देश सकते में था। होता भी क्यों न, हाईकोर्ट के इस फैसले से भारतीय राजनीति के सबसे बड़े और ताकतवर घराने को बेनकाब होने से बच गए थे। कोर्ट ने तब हिन्दुजा बंधुओं और बोफोर्स कंपनी को बरी कर दिया था।

यह फैसला 31 मई 2005 को आया था। उन पर बोफोर्स सौदे में दलाली लेने का आरोप था। कोर्ट ने एक ही झटके में सभी आरोपों को खारिज कर दिया। सीबीआई के मुताबिक हाईकोर्ट ऐसा नहीं कर सकती थी।

एजेंसी ने याचिका में विस्तार से इसकी वजह बताई है। उसका दावा है कि आपराधिक मामले में  हाईकोर्ट अपने फैसले को ‘रिकाल या रिव्यू’ नहीं कर सकता।

बावजूद इसके दिल्ली हाईकोर्ट ने ऐसा किया। उसने हिन्दुजा बंधुओं के मामले में दिए गए निर्णय  को उलट दिया। हाईकोर्ट ने 2004 में हिन्दुजा बंधुओं की अपील पर फैसला दिया था कि सीबीआई कोर्ट सभी आरोपियों पर आरोप  तय करे।

“ बोफोर्स घोटाला फिर जिंदा हो गया है। इसे खत्म मान लिया गया था। पर सीबीआई की विशेष अनुमति याचिका ने हलचल पैदा कर दी है। ”

 

इसके खिलाफ हिन्दुजा बंधुओं और बोफोर्स कंपनी ने हाईकोर्ट में अपील की। उसमें 2004 के फैसले पर दोबारा सुनवाई करने की मांग हुई। हाईकोर्ट मान गया। वह भी तब जबकि उसे पता था कि यह उसके अधिकार क्षेत्र से बाहर है।

उसने अपने निर्णय पर पुनर्विचार किया और बोफोर्स के अरोपियों को आरोपमुक्त कर दिया। जब सीबीआई ने इसके खिलाफ अपील करने के लिए संप्रग सरकार से अनुमति मांगी तो मना कर दिया गया। अपनी याचिका में एजेंसी ने इस बात का जिक्र किया है। उसने कहा ‘हाईकोर्ट के फैसले के खिलाफ अपील करने के लिए भारत सरकार और कानून मंत्रालय ने अनुमति नहीं दी।’

अब सवाल है कि तत्कालीन कांग्रेस सरकार अपील के लिए तैयार क्यों नहीं हुई?  इसका जवाब सीबीआई की याचिका के साथ ही सार्वजनिक मंचों पर उपलब्ध दस्तावेजों में मौजूद है।

याचिका के मुताबिक बोफोर्स घोटाले में राजीव गांधी की भी भूमिका थी। जब स्वीडन रेडियो ने बोफोर्स घोटाले की खबर जारी की थी, तब वे भारत के प्रधानमंत्री थे। इसलिए मामले को दबाना चाहते थे। उसकी कोशिश भी हुई।

स्वीडन में मौजूद भारत के तत्कालीन राजदूत जो छुट्टी पर थे, उन्हें बुलाया गया। उनको निर्देश दिया गया कि वे स्वीडन के प्रधानमंत्री से मिलें और खंडन करने को कहे। स्वीडन सरकार ने खबर का खंडन करने से मना कर दिया।

तब राजीव गांधी ने स्वीडन के प्रधानमंत्री से बात की और उनसे कहा कि वे खबर का खंडन करें। इसके बाद स्वीडन सरकार ने बयान जारी किया। उसने कहा कि बोफोर्स सौदे में कोई हेराफेरी नहीं हुई है। लेकिन इससे बात बनी नहीं।

बोफोर्स सौदे को लेकर संदेह बना रहा। इसी दरमियान स्वीडन की जांच रिपोर्ट भी आ गई। जांच रिपोर्ट में कहा गया कि बोफोर्स सौदे में हेराफेरी हुई है। वह रिपोर्ट भारत सरकार को भेजी गई। इसके आधार पर तत्कालीन प्रधानमंत्री राजीव गांधी को सलाह दी गई कि वे बोफोर्स सौदे को रद्द कर दें।

पर उन्होंने किसी की नहीं सुनी। सौदा रद्द करने की बजाय जांच के लिए संयुक्त संसदीय समिति का गठन कर दिया। उसने तत्कालीन कांग्रेस सरकार को क्लीन चिट दे दी। समिति ने कहा कि कोई घोटाला हुआ ही नहीं।

लेकिन तब तक बोफोर्स घोटाले से जुड़े इतने तथ्य सामने आ गए थे कि राजीव गांधी खुद को पाक-साफ साबित करने में विफल हुए। लिहाजा 1990 में मामला सीबीआई को सौंप दिया गया। उसने प्राथमिकी दर्ज की और छानबीन शुरू कर दी।

1999 में चार्जशीट फाइल की। उसमें राजीव गांधी, क्वात्रोची, हिन्दुजा बंधु और बोफोर्स कंपनी समेत कई लोगों के नाम थे। एजेंसी को उन लोगों के खाते की भी जानकारी मिली, जिन्हें बतौर रिश्वत पैसा भेजा गया था।

याचिका में हिन्दुजा बंधुओं को भेजे गए पैसे का पूरा ब्यौरा मौजूद है। उसमें मांट ब्लांक खाते का भी जिक्र है। यह खाता प्रकाश पी. हिन्दुजा के कहने पर खुला था।

इसमें हिन्दुजा की कंपनी, इंत्रे कॉरपोरेशन ने 11,774,925 क्रोन (स्वीडन की मुद्रा) मुद्रा भेजी थी। एजेंसी के पास इस बात की भी जानकारी है कि रिश्वत की रकम अंतत: किस खाते में गई।

हालांकि उसका पूरा विवरण एजेंसी की याचिका में नहीं है। लेकिन उसमें जो कुछ भी कहा गया है, उससे पता चलता है कि आरोपियों का आरोप साबित करने के लिए सीबीआई के पास पर्याप्त प्रमाण है।

इस तथ्य से कांग्रेस के नेतृत्व में बनी संप्रग सरकार भी परिचित थी। उसे मालूम था कि अगर सीबीआई मामले को जिंदा रखेगी तो उसकी आंच 10 जनपथ तक पहुंचेगी।

शायद इसलिए 2004 में आई कांग्रेस सरकार इस फिराक में थी कि कोई ऐसा मौका मिले, जिससे वह बोफोर्स की जांच को बंद कर दे। दिल्ली हाईकोर्ट ने वह अवसर कांग्रेस सरकार को दे दिया।

कोर्ट ने सीबीआई को डांटते हुए कहा कि बोफोर्स केस बंद करो। आरोपियों के खिलाफ कोई साक्ष्य एजेंसी के पास नहीं है। इस पर 250 करोड़ रुपए खर्च हो चुका है।

हासिल कुछ नहीं हो रहा है। कोर्ट इस निष्कर्ष पर कैसे पहुंची? यह पहेली बना हुआ है। जो भी हो, इस निर्णय से संप्रग सरकार को बोफोर्स केस बंद करने का बहाना मिला गया। वह घोटाले के मुख्य आरोपियों की कवच बन गई।

इसलिए सीबीआई को सुप्रीम कोर्ट में अपील नहीं करने दिया गया। कोशिश इतनी भर थी कि बोफोर्स घोटाले को दफन कर दिया जाए ताकि 10 जनपथ को बचाया जा सके। यह सभी आरोपियों को दोषमुक्त कराए बिना संभव नहीं था।

हिन्दुजा बंधुओं का बरी होना, उस मुहिम की शुरुआत थी। इसके बाद तो कांग्रेस सरकार खुलकर आरोपियों का बचाव करने लगी। क्वात्रोची इसकी मिसाल है। इसे बचाने के लिए तत्कालीन संप्रग सरकार ने देश की सबसे बड़ी अदालत और जनता को गुमराह किया।

वह भी तब जबकि हाईकोर्ट के आदेश से बस हिन्दुजा बंधु और बोफोर्स कंपनी का मामला बंद हुआ था, क्वात्रोची का नहीं। लेकिन मनमोहन सरकार क्वात्रोची को भी बचाने लगी।

कोर्ट में मामला लंबित होने के बाद भी एडिशनल सॉलिसिटर जनरल बी.दत्त लंदन पहुंच गए। उनके जाने का मकसद क्वात्रोची को लाभ पहुंचना था। जाहिर है इसके लिए आदेश सरकार ने दिया होगा। सरकार को किसने कहा होगा? यह खुला रहस्य है।

लिहाजा बीबी. दत्त लंदन पहुंचे। वहां सरकार को बताया कि क्वात्रोची के ऊपर कोई मामला भारत में चल नहीं रहा है। इसलिए उनके खाते को फ्रीज रखने का कोई मतलब नहीं है।

तस्वीरें बोफोर्स रिश्वत कांड को अंजाम तक पहुंचाने में अहम भूमिका निभा सकती हैं। उनमें जो कुछ है, वह इस हाईप्रोफाइल घोटाले की कहानी बयान करता है। लेकिन अभी तक वह दस्तावेज फाइलों में बंद है। संभव है कि इस याचिका से बाहर निकले। 

वहां की सरकार ने इस मुलाकात के बारे में सीबीआई को बाकायदा पत्र लिखकर बताया। वह पत्र 23 दिसंबर 2005 को सीबीआई ने प्राप्त किया।

सुनवाई के दिन उसने कोर्ट को नहीं बताया कि बीबी.दत्त लंदन में हैं और क्वात्रोची की सहायता कर रहे हैं। कोर्ट को इसकी सूचना अखबार से मिली। उसमें  लिखा था कि क्वात्रोची ने लंदन से अपना पैसा निकाल लिया।

ऐसा भारत सरकार के कहने पर हुआ है।  कोर्ट ने आदेश दिया कि खाते को तुरंत फ्रीज किया जाए। अगर उसने पैसे निकाल लिए हो तो उसे वापस लाने की व्यवस्था की जाए। पर इन दोनों में से कुछ करने का कोई फायदा नहीं होने वाला था।

वजह क्वात्रोची अपना काम कर चुका था। मनमोहन सरकार भी यही चाहती थी। इसलिए उसने हर कदम पर क्वात्रोची को बचाया। जब उसे अर्जेंटीना में पकड़ा गया तो भी सरकार का रवैया हैरान करने वाला रहा।

उसने ऐसे कोई कोशिश नहीं की, जिससे क्वात्रोची को वापस लाया जा सके। संप्रग सरकार बस इसमें लगी रही कि क्वात्रोची अर्जेंटीना से निकल जाए।  वह सफल भी रही। क्वात्रोची आराम से सीबीआई के चंगुल से निकल गया।

उसको अर्जेंटीना सरकार ने  8 फरवरी 2007 को ही गिरफ्तार कर लिया था। इसकी जानकारी सीबीआई को थी। पर वह चुप रही। उसने किसी को कानों-कान खबर नहीं होने दी कि क्वात्रोची वहां है। देश को जानकारी अखबार से हुई।

तब जाकर सरकार ने क्वात्रोची को भारत लाने की कवायद शुरू की। कोशिश आधे मन से हुई। भारत सरकार ने अर्जेंटीना की कोर्ट में पहले तो सबूत पेश नहीं किया। इस वजह से प्रत्यर्पण की अपील को निचली अदालत ने खारिज कर दिया।

इसके खिलाफ अर्जेंटीना के सुप्रीम कोर्ट में अपील की गई। लेकिन पेशी से पहले भारत सरकार ने अपील वापस ले ली। इसकी तस्दीक क्वात्रोची के वकील का बयान करता है। उन्होंने कहा ‘भारत के राजदूत अर्जेंटीना की सरकार से मिले और अपील करने से मना कर दिया।’

वे आगे कहते है कि इस वजह से मेरे मुवक्किल को पासपोर्ट वापस मिल गया। उसने कहा ‘अब वे आजाद हैं।’ सुप्रीम कोर्ट के वकील अजय अग्रवाल कहते है कांग्रेस ने बोफोर्स मामले को दफन करने की पूरी कोशिश की थी। उनका दावा है कि अब उसी ढर्रे पर सीबीआई भी चल रही है।

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