चुनाव सुधार की धीमी रफ्तार

0
28

करीब 42 वर्ष पहले (1974-1975) में वीएम तारकुंडे समिति ने सिफारिश की थी कि एक ऐसा कानून होना चाहिए, जिसके तहत सभी मान्यता प्राप्त राजनीतिक दल अपने खातों, आय के स्रोतों और खर्च के ब्यौरे का पूरा हिसाब दें।

यदि खाते में गड़बड़ी पाई जाए तो इसे दंडनीय अपराध माना जाए। जयप्रकाश नारायण ने स्वतंत्र संस्था ‘सिटिजंस ऑफ डेमोक्रेसी’ की ओर से चुनाव सुधार के लिए इस समिति का गठन किया था।

असल में वर्ष 1967 तक लोकसभा और विधानसभा के चुनाव साथ-साथ हुए। पहली बार इंदिरा गांधी ने 1972 में होने वाले लोकसभा चुनाव को एक साल पहले 1971 में करवाया यानी लोकसभा चुनाव और विधानसभा चुनाव को अलग अलग कर दिया।

सत्तारूढ़ कांग्रेस ने 1971 के लोकसभा चुनाव में धन-बल का बेजा इस्तेमाल कर विपक्ष को बेहाल कर दिया।

इससे चिंतित जयप्रकाश नारायण ने बेंगलुरू के पास हरदनहल्ली में अपने 30-35 बुद्धिजीवी मित्रों की बैठक बुलाई और कई दिनों तक चर्चा की।

इस बैठक के मेजबान रामनाथ गोयनका थे। इस तरह जेपी ने पहली बार चुनाव सुधार का एजेंडा देश के सामने रखा। उस समय तारकुंडे समिति की सिफारिशों का सबसे ज्यादा समर्थन दो पार्टियों जनसंघ और भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी ने किया था।

फिर जेपी के कहने पर विपक्ष की हर पार्टी ने चुनाव सुधार पर काम किया। जनसंघ में लालकृष्ण आडवाणी, भाकपा में इंद्रजीत गुप्त और सोशलिस्ट पार्टी में मधु लिमये इस दिशा में आगे बढ़े।

 

“देश की चुनाव प्रणाली में आ रही विकृतियों को सबसे पहले जयप्रकाश नारायण ने महसूस किया और (1974-1975) में तारकुंडे समिति का गठन किया।”

 

यह अलग बात है कि धीरे-धीरे चुनावों में धन एवं बल का प्रभाव बढ़ता ही गया। इससे चुनाव सुधारों की आवश्यकता महसूस हुई एवं समय-समय पर इस दिशा में कई कदम भी उठाए गए।

इसी को ध्यान में रखकर जनप्रतिनिधित्व कानून के तहत ‘आदर्श आचार संहिता’ बनाई गई। इसके अलावा अनेक समितियों का गठन किया गया। इनमें गोस्वामी समिति (1990) व इंद्रजीत गुप्त समिति (1998) महत्वपूर्ण हैं।

समय-समय पर चुनाव आयोग की अनुशंसा भी सामने आईं। उम्मीदवारों के अपने संपत्ति के ब्यौरे के साथ-साथ आपराधिक पृष्ठभूमि के बारे में भी सूचना देने का प्रावधान किया गया।

किसी उम्मीदवार के चुनाव में किए जाने वाले व्यय की सीमा भी निर्धारित की गई। बाद में राजनीति में अपराधियों के बढ़ते प्रवेश पर रोक लगाने के लिए कानून भी बनाया गया।

चुनाव आयोग ने उम्मीदवारों के खर्च पर नियंत्रण व निगरानी रखने के लिए ‘व्यय पर्यवेक्षक’ अलग से नियुक्त करने की प्रथा प्रारंभ की।

दिनेश गोस्वामी समिति का गठन वर्ष 1990 में किया गया था। इस समिति ने भारत में होने वाले चुनावों के सम्बन्ध में कई महत्त्वपूर्ण सुझाव तथा सिफारिशें पेश की।

समिति की सबसे प्रमुख सिफारिश यह थी कि किसी भी व्यक्ति को दो से अधिक निर्वाचन क्षेत्रों में चुनाव लड़ने की अनुमति न दी जाए।

हालांकि गोस्वामी की प्रमुख सिफारिशों को क्रियान्वित नहीं किया गया। लेकिन समय-समय पर सरकार ने इनमें से कुछ महत्वपूर्ण सिफारिशों को स्वीकार भी किया।

निर्वाचन आयुक्त अधिनियम 1991 और लोक प्रतिनिधित्व (संशोधन) अधिनियम 1996 के जरिए समिति की अनेक सिफारिशें लागू हो गईं।

चुनाव आयोग ने वर्ष 1970 में पहली बार सरकार को चुनाव सुधार का अपना प्रस्ताव भेजा। आयोग ने दूसरा और तीसरा प्रस्ताव 1977 और 1982 में भेजा था।

वर्ष 1990 में पूर्व केंद्रीय कानून मंत्री दिनेश गोस्वामी समिति की रिपोर्ट आई। 1992 में तत्कालीन चुनाव आयुक्त टीएन शेषन ने गोस्वामी समिति की रिपोर्ट लागू करने के लिए पीवी नरसिंह राव सरकार को पत्र लिखा, लेकिन इन प्रस्तावों और आयोग के पत्रों पर कुछ खास नहीं हुआ।

 

“पहली बार इंदिरा गांधी ने 1972 में होने वाले लोकसभा चुनाव को एक साल पहले 1971 में करवाया यानी लोकसभा चुनाव और विधानसभा चुनाव को अलग अलग कर दिया।”

 

जब भी दबाव बढ़ा, सरकार ने कुछ तात्कालिक संशोधनों को पारित कर अपना पिंड छुड़ा लिया।

इसी कड़ी में 1989 में जनप्रतिनिधित्व कानून-1951 में संशोधन कर इलेक्ट्रॉनिक वोटिंग मशीन यानी ईवीएम के इस्तेमाल का रास्ता साफ हुआ।

अस्सी के दशक में ही मतदान की उम्र 21 वर्ष से घटाकर 18 वर्ष कर दी गई और दलबदल कानून को कठोर बनाया गया।

नब्बे के दशक में मतदान के लिए फोटो पहचान पत्र अनिवार्य कर दिया गया। यह भी तब हो पाया जब तत्कालीन चुनाव आयुक्त टीएन शेषन अड़ गए और कई राज्यों में पहचान पत्र बनने तक चुनावों को टाल दिया।

लेकिन सरकार ने सुधार के उलट कुछ ऐसे संशोधन भी किए जो चुनावी पारदर्शिता और राजनीतिक भ्रष्टाचार को बढ़ावा देने वाले थे।

उदाहरण के लिए जनप्रतिनिधित्व कानून की धारा 17(1) में सरकार ने संशोधन कर सगे-संबंधियों, परिचितों, कार्यकर्ताओं और पार्टी के चुनाव प्रचार में किए गए खर्च को प्रत्याशी के खाते से अलग कर दिया। इसके तहत किसी उम्मीदवार के चुनाव में उसकी पार्टी या समर्थक बेहिसाब धन खर्च करते हैं।

इसकी आलोचना की जाती रही है, लेकिन निहित स्वार्थों के चलते इसे हटाया नहीं जा सका है। सभी जानते हैं कि निर्धारित होने के बावजूद आज मुखिया के चुनाव में भी एक करोड़ खर्च किए जाते हैं।

प्रत्याशियों को खारिज करने के प्रस्ताव का जब कोई समाधान नहीं दिखा तब पीपुल्स यूनियन फॉर सिविल लिबर्टीज ने सर्वोच्च न्यायालय में याचिका दायर कर दी जिस पर सुप्रीम कोर्ट ने अहम फैसला सुनाया।

चुनाव नियमावली (1961) की धारा 49(ओ) के तहत मतदाता नकारात्मक वोटिंग पहले भी कर सकते थे, लेकिन तब मतदान की निजता गुप्त नहीं होती थी।

वर्ष 2004 में चुनाव आयोग ने विस्तृत प्रस्ताव भेजा था, लेकिन संप्रग सरकार के दोनों कार्यकाल के दौरान मनमोहन सरकार मौन रही।

लेकिन जब सुप्रीम कोर्ट का हस्तक्षेप हुआ, तब सरकार चेती। नकारात्मक मतदान पर अदालती फैसले से आने वाले समय में जो संवैधानिक दिक्कतें पेश होने वाली हैं, उसका समाधान संसद में नया विधेयक लाकर ही किया जा सकता है।

यदि किसी चुनाव क्षेत्र विशेष में सामूहिक नकारात्मक मतदान पड़े तो चुनाव रद्द होना चाहिए या नहीं, इसका फैसला कैसे होगा, क्योंकि अदालती आदेश में इसका उल्लेख नहीं है।

इसी तरह दागी नेताओं को अयोग्य ठहराने वाले प्रस्ताव पर अदालती फैसला आने के बावजूद इसे उलटने के लिए अध्यादेश लाया गया, हालांकि इसे बाद में वापस ले लिया गया।

वर्ष 1993 के जुलाई महीने की बात है। भारत सरकार ने गृह सचिव एनएन वोहरा के अधीन एक समिति का गठन किया था ताकि वह सरकारी मशीनरी और राजनेताओं पर अपराधियों के असर का जायजा ले।

वोहरा समिति ने अक्टूबर में अपनी रिपोर्ट पेश कर दी, लेकिन इसे कभी सार्वजनिक नहीं किया गया। हालांकि इसके कुछ हिस्से इंटरनेट पर उपलब्ध हैं।

यहां ध्यान देने वाली बात है कि एक गृह सचिव ने पद पर रहते हुए अपनी रिपोर्ट में लिखा, ‘आपराधिक गिरोहों, पुलिस, नौकरशाही और राजनेताओं के बीच की गिरोहबंदी देश के कई इलाकों में साफ देखी जा सकती है।

इतना ही नहीं, चुनाव लड़ने का खर्च इतना अधिक बढ़ चुका है कि उसने राजनेताओं को ऐसे तत्वों के पाले में कर दिया और सुरक्षा व खुफिया अधिकारियों ने इससे काफी हद तक समझौता कर लिए।’

यह रिपोर्ट 18 वर्ष पुरानी है। तब से अब तक चुनावों में पैसे और ताकत का इस्तेमाल बढ़ता ही गया है।

वोहरा समिति के इस पर्यवेक्षण के बाद कि चुनाव खर्च की जरूरत ने राजनेताओं को अपराधी तत्वों के नजदीक कर दिया है, सरकार ने जून 1998 में इंद्रजीत गुप्त समिति का गठन किया ताकि वह चुनाव कार्यों में राज्य की ओर से धन उपलब्ध कराए जाने की व्यवहार्यता का खासतौर पर अध्ययन करे।

देश के पूर्व गृहमंत्री रहे गुप्त की समिति में डॉ. मनमोहन सिंह और सोमनाथ चटर्जी जैसे सदस्य थे। समिति ने चुनाव और राजनीतिक दलों के खर्च को पूरी तरह सरकार के खाते में डालने की तगड़ी वकालत की।

उसके मुताबिक इससे खर्च पर लगाम लगेगी और विभिन्न उम्मीदवारों के बीच असमानता भी दूर होगी।

समिति की राय थी कि राज्य पोषित व्यवस्था लागू होने से उन राजनीतिक दलों को भी लाभ पहुंचेगा जो सामाजिक और आर्थिक रूप से पिछड़े तबके का प्रतिनिधित्व करते हैं और जिस कारण उन्हें चंदे में ठीक-ठाक राशि नहीं मिल पाती।

चुनाव की इस महंगी प्रक्रिया को राज्य पोषित बनाने के विचार को 1999 में आई विधि आयोग की रिपोर्ट तथा वर्ष 2000 में आई संविधान की कार्यप्रणाली की समीक्षा के लिए गठित राष्ट्रीय समिति में भी समर्थन मिला।

यही वजह थी कि वर्ष 2005 में मंत्रिमंडल ने चुनावों का खर्च राज्य द्वारा उठाए जाने के संबंध में एक विधेयक को संसद में पेश करने की अनुमति दे दी।

हालांकि यह विधेयक मतदान के लिए कभी पेश नहीं किया गया और 14वीं लोकसभा के साथ ही उसका अस्तित्व भी समाप्त हो गया।

LEAVE A REPLY

Please enter your comment!
Please enter your name here