सत्ता की होड़, विरोधियों का गठजोड़

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सभी दलों द्वारा उम्मीदवारों की अंतिम सूची जारी करने के साथ ही तेलंगाना विधानसभा के चुनावी समर में सेनाएं सज चुकी हैं, युद्धघोष हो चुका है। एक तरफ ‘महाकुटुम्बी’ के नाम से कांग्रेस-टीडीपीसी पीआई-टीजेएस का गठबंधन है तो दूसरी ओर सत्ताधारी टीआरएस है। उसे ओवैसी की एमआईएम का समर्थन प्राप्त है। बीजेपी लड़ाई को त्रिकोणीय बनाने में जोर-शोर से लगी है। बड़ी तादाद में बागी भी चुनावी मैदान में ताल ठोक रहे हैं और दलीय उम्मीदवारों की पेशानी पर बल ला रहे हैं। तेलंगाना के 119 सदस्यों वाली विधानसभा के लिए आगामी 7 दिसम्बर को मतदान होना है। नतीजे 11 दिसम्बर को आएंगे। सारे प्रत्याशी और उनके समर्थक जनता के बीच दिन-रात एक किये हुए हैं।

शहर से लेकर सुदूर गांव तक में चुनावी सरगर्मी साफ महसूस की जा रही है। पहली बार मुख्य विपक्षी दल कांग्रेस ने अपने धुर विरोधी तेलुगू देशम पार्टी यानी टीडीपी से हाथ मिलाकर राजनीति की नई पटकथा लिख दी है। उसे सीपीआई और नवगठित तेलंगाना जन समिति का साथ मिला है। महाकुटुम्बी में शामिल चारों दलों में कांग्रेस-94, टीडीपी-14, टीजेएस-8 और सीपीआई-3 सीटों पर उम्मीदवार उतारे हैं। लेकिन कई सीटों पर किचकिच अभी कायम है और वहां दोस्ताना संघर्ष की संभावना बनी हुई है। महाकुटुम्बी के घटक दलों में जमीनी गतिरोध से टीआरएस नेताओं का खुश होना स्वाभाविक है। बीजेपी सभी 119 सीटों पर अकेले दम पर मैदान में है। एमआईएम ने केसीआर की टीआरएस के साथ गठबंधन कर हैदराबाद शहरी इलाके की केवल आठ सीटें अपने खाते में ली हैं, जिसमें सात सीटों पर पिछली बार उसके प्रत्याशी जीते थे। राजनीति के जानकार भी मानते है कि तेलंगाना में इस बार विचित्र गठजोड़ बना है।

आंध्र प्रदेश के बंटवारे के विरोधी रहे नायडू उस कांग्रेस के साथ हुए हैं जो तेलंगाना बनाने का श्रेय अपनी झोली में डालती रही है। चुनाव प्रचार के दौरान भी कांग्रेस के नेता इस बात को पुरजोर तरीके से उठा रहे हैं। 23 नवंबर को हैदराबाद से सटे मेडचल में सोनिया-राहुल की संयुक्त चुनावी सभा में भी यह मुद्दा सबसे ऊपर रहा। तेलंगाना बनने के बाद विधानसभा के लिए हो रहे दूसरे चुनाव में सत्ताधारी तेलंगाना राष्ट्र समिति और उसके मुखिया के. चंद्रशेखर राव की प्रतिष्ठा दांव पर लगी है। उनको दोतरफा चुनौती मिल रही है। एक तरफ महाकुटुम्बी है तो दूसरी ओर बीजेपी। कांग्रेस के नेता तेलंगाना बनाने का श्रेय अपने खाते में डालते हुए केसीआर की सरकार पर वादों से मुकरने और बेरोजगारों को छलने का आरोप जड़ रहे हैं। वे किसानों की कर्जमाफी और आत्महत्या के सवालों को उछाल रहे हैं।

बता रहे हैं कि साढ़े चार साल के भीतर तेलंगाना में साढ़े चार हजार किसानों ने आत्महत्या कर ली। तेलंगाना आंदोलन के सूत्रधार रहे टीजेएस नेता प्रोफेसर कोदंडरामम केसीआर पर वादाखिलाफी का आरोप लगाते हुए छात्रों-नौजवानों की बेरोजगारी का मुद्दा उठा रहे हैं। उनका आरोप है कि तेलंगाना आंदोलन के दौरान दर्ज हुए मुकदमे अब तक खत्म नहीं हुए और बेरोजगारी भत्ता देने का वादा भी केसीआर ने पूरा नहीं किया। एक आंकड़े के मुताबिक स्रातक पास बेरोजगारों की संख्या के मामले में तेलंगाना शीर्ष के तीन राज्यों में है। महाकुटुम्बी नेताओं को विश्वास है कि केसीआर विरोधी मतों के सहारे वे तेलंगाना की सत्ता को पाने में कामयाब हो जाएंगे। उधर केसीआर और उनका कुनबा इस बार भी जीत के लिए आश्वस्त है। पार्टी सौ सीट से ज्यादा जीतने का लक्ष्य लेकर चल रही है। चुनाव पूर्व के सारे सर्वे और मीडिया रिपोर्टें भी टीआरएस के फिर से सत्ता में वापसी के संकेत दे रहे हैं। हाल में हुए एक सर्वे ने केसीआर को 80 सीट और कांग्रेस-टीडीपी को क्रमश: 20 और 2 सीट मिलने का अनुमान जताया है। केसीआर अपनी साढ़े चार साल की उपलब्धियों के सहारे जनादेश मांग रहे हैं। उनके निशाने पर कांग्रेस और टीडीपी गठजोड़ है जिसे वो सिद्धांतहीन और दिलजलों की जमात बता रहे हैं। टीआरएस के नेता सभाओं में कहते सुने जा रहे हैं कि सदा से तेलंगाना हितों की अनदेखी करने वाली टीडीपी ने स्वार्थ के लिए बेमेल गठजोड़ किया है। चंद्रबाबू नायडू कांग्रेस के कंधे पर सवार होकर फिर से तेलंगाना के हितों की बलि चढ़ाना चाहते हैं।

आंध्र प्रदेश के बंटवारे के विरोधी रहे चंद्रबाबू नायडू ने उस कांग्रेस के साथ गठजोड़ किया है जो तेलंगाना बनाने का श्रेय अपनी झोली में डालती रही है। चुनाव प्रचार के दौरान भी कांग्रेस के नेता इस बात को पुरजोर तरीके से उठा रहे हैं। 23 नवंबर को हैदराबाद से सटे मेडचल में सोनिया- राहुल की संयुक्त चुनावी सभा में भी यह मुद्दा सबसे ऊपर रहा।

चुनावी समर में टीआरएस का पलड़ा भारी होने का गणित समझना बहुत मुश्किल नहीं है। 2014 में तेलंगाना के पहले चुनाव में इस दल को 63 सीटें मिली थीं। लेकिन सरकार बनने के बाद केसीआर के साथ दूसरे दलों के विधायक जुटते गये। सबसे ज्यादा नुकसान टीडीपी को हुआ था जिसके 17 में 12 विधायक पार्टी छोड़ टीआरएस में शामिल हो गये थे। इसी तरह कांग्रेस के भी 21 में 7 विधायकों को सत्ताधारी दल ने अपने पाले में करके विधानसभा में अपनी संख्या को 90 से ऊपर कर लिया था। तेलंगाना बनने के बाद से हुए सभी चुनाव (एमएलसी) और उपचुनाव के नतीजे भी टीआरएस के पक्ष में गये हैं। राजनीतिक समीक्षक संतोष पांडेय कहते हैं- ‘अलग राज्य आंदोलन के समय जिस टीआरएस का आधार कुछ जिलों में सीमित था, वह सरकार बनने के बाद पूरे सूबे में फैल गया है। पार्टी के कैडर और संसाधनों में भी अप्रत्याशित वृद्धि हुई है। लोकप्रियता के मामले में भी केसीआर तेलंगाना के बाकी नेताओं पर बहुत भारी हैं।’

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