संस्कृति, अध्यात्म और गणतंत्र की त्रिवेणी

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छह दिवसीय प्रवासी दिवस का मुख्य समारोह काशी में 21, 22 और 23 जनवरी को होगा। 24 जनवरी को मेहमान प्रयागराज के लिए रवाना होंगे जहां वे लाखों श्रद्धालुओं के साथ गंगा, यमुना और सरस्वती की त्रिवेणी में डुबकी लगाएंगे। 25 और 26 जनवरी को राजधानी दिल्ली पहुंचेंगे जहां वे राजपथ पर निकलने वाली भव्य परेड के साक्षी बनेंगे।

आदि शंकर ने अद्वैत दर्शन के व्यावहारिक रूप में वाराणसी की तुलना मेदिनी (समग्र पृथ्वी) से की थी। वीर सावरकर ने अपनी प्रसिद्ध कृति ‘हिंदुत्व’ में भारत के जगद्गुरू बनने के आदर्श को हासिल किये जाने पर विश्व की कल्पना ‘वाराणसी मेदिनी’ के रूप में की थी। अगले वर्ष के प्रवासी भारतीय दिवस पर दुनिया भर में फैले करीब 10 हजार प्रवासी भारतीयों को देश की सांस्कृतिक राजधानी काशी में विश्व की लघु प्रतिकृति को देखने और अनुभव करने का प्रत्यक्ष अनुभव मिलेगा। प्रधानमन्त्री नरेंद्र मोदी ने प्रवासी भारतीय दिवस को संस्कृति, अध्यात्म और गणतंत्र की त्रिवेणी बनाने की पहल की है। इस अर्थ में यह पहला अवसर है जब देश की भूमि से दूर भारतीयों को विकास यात्रा पर निकले भारत की समग्र छवि को देखने का मौका मिलेगा।

प्रधानमन्त्री ने अपनी कल्पनाशीलता और प्रयोगधर्मिता का परिचय देते हुए प्रवासी भारतीय दिवस की जो रूपरेखा तैयार की है, उसमें दुनिया भर के सहबन्धु मेहमान काशी, प्रयागराज और राजधानी दिल्ली के कार्यक्रमों में भाग लेंगे। इस छह दिवसीय आयोजन का मुख्य समारोह वाराणसी (काशी) में 21, 22 और 23 जनवरी को होगा। 24 जनवरी को मेहमान प्रयागराज के लिए रवाना होंगे जहां वे लाखों श्रद्धालुओं के साथ गंगा, यमुना और सरस्वती की त्रिवेणी में डुबकी लगाएंगे। 25 और 26 को राजधानी दिल्ली पहुंचेंगे जहां वे राजपथ पर निकलने वाली भव्य परेड के साक्षी बनेंगे। इसके पहले के आयोजनों में मेहमान केवल देश की तस्वीर के कुछ पहलु ही देख पाते थे। इस बार उन्हें भारत की सनातन छवि संग लोकतांत्रिक चेतना के साथ 21वीं सदी के विश्व नेता बनने की ओर पूरे संकल्प के साथ आगे बढ़ रहे भारत से रू-ब-रू होने का अवसर मिलेगा।

प्रवासी भारतीय दिवस को अविस्मरणीय अवसर बनाने के लिए विदेश मंत्रालय के साथ ही उत्तर प्रदेश सरकार ने कमर कस ली है। अभी पिछले दिनों आयोजन के 100 दिन पहले गंगा तट के अस्सी घाट पर ‘शंखनाद’ कार्यक्रम के जरिये मुख्य आयोजन की ओर क्रमबद्ध तरीके से अग्रसर होने की शुरुआत हुयी। इस कार्यक्रम में स्थानीय कलाकारों ने अपनी प्रतिभा का प्रदर्शन किया। सरकार और प्रशासन का लावलश्कर तो मुस्तैद है ही लेकिन मोदी इस पूरे आयोजन को बनारसियों और प्रवासी भारतीयों के बीच जीवंत और खुशनुमा संवाद बनाना चाहते हैं।

वास्तव में किसी भी शहर की अनुभूति फाइव स्टार होटलों में रुक कर या लक्ज़री बसों में तफरीह करके नहीं की जा सकती। काशी के बारे में तो यह और भी सच है। संकरी गलियों वाले इस पुराने शहर में ‘रांड, सांड़, सीढ़ी,सन्यासी’ से दो चार होते हुए ही विचरण किया जा सकता है। आधुनिक और सुविधायुक्त नगर की कल्पना लिए यदि कोई पर्यटक यहां आता है तो उसे भारी निराशा का सामना करना पड़ता है। लेकिन जिज्ञासुओं और खोज में लगे किसी व्यक्ति के लिए काशी का यही स्वरूप उसे अन्य नगरों से अलग करता है। जो यहां आता है, रम जाता है। काशी में देश के विभिन्न प्रांतों और भाषाभाषी समुदायों के अपने मोहल्ले हैं। पिछले कई दशकों के दौरान यहां दुनिया का अलग-अलग देशों के भी डेरे और बसेरे बन गए हैं। विश्व गांव की परिकल्पना काशी में साक्षात दिखाई देती है।

भारत की पहचान बनाने में काशी ने जितनी भूमिका निभाई है उतनी देश के किसी अन्य नगर ने नहीं। धर्म-दर्शन की मीमांसा हो या किसी विषय पर प्रामाणिक मत जानना हो तो लोग काशी के विद्वत समाज की ओर ही देखते हैं। आज कालक्रम में धार्मिक व्यवस्था देने के सन्दर्भ में काशी का वैसा एकाधिकार नहीं है। संस्कृति, साहित्य, संगीत, नृत्य और अन्य ललित कलाओं के महारथी आज काशी में बहुत कम रह गए हैं लेकिन उनकी शिष्य परंपरा ने काशी की सुगन्धि का प्रसार पूरी दुनिया में किया है। भारत की ‘सॉμट पावर’ की गंगोत्री काशी में प्रवासी भारतीयों को धर्म-संस्कृति की शाश्वत चेतना महसूस करने का अवसर मिलेगा।

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