विपक्षी गठबंधन अपना-अपना राग

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विपक्षी गठबंधन में कई और रोड़े हैं। बिहार में महागठबंधन के भागीदारों के बीच सीटों के बंटवारे के लिए रस्साकसी जारी है। विवादों को टालने के लिए खरमास को बहाना बनाया गया है। लेकिन इस बीच एक सवाल और है, जिसकी तरफ या तो मीडिया का ध्यान नहीं जा रहा है या फिर वह मोदी विरोध में इस कदर तक डूब गया है कि इस तरफ उसका ध्यान नहीं जा रहा है। सवाल है कि मोदी का विकल्प कौन बनेगा, राहुल गांधी, समाजवादियों की अगुआई वाला वह कथित महागठबंधन, जिसे भानुमति का कुनबा कह सकते हैं…या फिर तेलंगाना राष्ट्र समिति के अध्यक्ष के चंद्रशेखर राव जिस मोर्चा की कोशिश कर रहे हैं, वह फेडरल फ्रंट (संघीय मोर्चा)।

दिलचस्प बात यह है कि महागठबंधन और फेडरल फ्रंट के विचारों और कार्यक्रमों में भी अंतर। फेडरल फ्रंट जहां प्रधानमंत्री पद के लिए नामों के विकल्प को खुला रखना चाहता है तो महागठबंधन तकरीबन स्वीकार कर चुका है कि राहुल गांधी नेता होंगे। लेकिन महागठबंधन में भी एक मोर्चा उत्तर प्रदेश में समाजवादी पार्टी और बहुजन समाजपार्टी का है, जिसने अभी तक प्रधानमंत्री पद को लेकर अपनी राय नहीं रखी है। दिलचस्प यह है कि महागठबंधन हो या फेडरल फ्रंट या राहुल गांधी की कांग्रेस, तीनों एक बिंदु पर एक हैं, वह बिंदु है केंद्र से भारतीय जनता पार्टी सरकार और खासकर प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की विदाई। दिलचस्प यह है कि भारतीय राजनीति में निस्तेजावस्था को प्राप्त कर चुका वामपंथी मोर्चा भी मोदी को हटाने की राय में शामिल है। 1996 में जो वाममोर्चा प्रधानमंत्री तय कर रहा था, 22 साल बाद उसकी हालत यह है कि उसकी राय की चाहे महागठबंधन हो या फिर फेडरल फ्रंट, परवाह ही नहीं कर रहा है। यह बात और है कि शामिल बाजा की तरह मोदी हटाओ राग में उसका भी सुर शामिल है। फेडरल फ्रंट हालांकि अभी बना नहीं है, लेकिन इस विचार में मोटे तौर पर पश्चिम बंगाल की मुख्यमंत्री ममता बनर्जी, उड़ीसा के मुख्यमंत्री नवीन पटनायक और तेलंगाना के के. चंद्रशेखर राव रहे हैं। इसे तीन मुख्यमंत्रियों का क्लब भी कह सकते हैं। हालांकि पटनायक के अलग चुनाव लड़ने के एलान से यह बनने से पहले बिखर गया। के.चंद्रशेखर राव अपने मोर्चे में दिल्ली के मुख्यमंत्री अरविंद केजरीवाल को शामिल करने की कोशिश में उनसे मुलाकात कर चुके हैं।

दिलचस्प यह है कि इस क्लब के सदस्य प्रधानमंत्री के तौर पर राहुल गांधी के नेतृत्व को स्वीकार करने को तैयार नहीं हैं। इसकी वजह यह है कि अपने-अपने राज्यों में इन तीनों का अब तक के हिसाब से व्यापक आधार है। कम से कम ममता बनर्जी को ऐसा लगता है कि अगर उनके ज्यादा सांसद आए, और विवाद हुआ तो वे प्रधानमंत्री भी बन सकती हैं। के चंद्रशेखर राव और नवीन पटनायक की मजबूरी यह है कि अगर उन्होंने राहुल गांधी को प्रधानमंत्री पद का दावेदार मान लिया तो अपने-अपने राज्यों में उन्हें जनता को समझाना भारी पड़ेगा, क्योंकि स्थानीय स्तर पर उनका मुख्य राजनीतिक मुकाबला राहुल गांधी की कांग्रेस से ही है। ममता जैसी स्थिति मायावती और अखिलेश की भी है। उन्हें लगता है कि अगर उनके ज्यादा सांसद जीते तो प्रधानमंत्री पद का छींका उनके भाग्य से टूट भी सकता है। फिर वे उत्तर प्रदेश में कांग्रेस को ताकतवर नहीं मानते। वे सोनिया गांधी की रायबरेली और राहुल गांधी की अमेठी सीट के अलावा तीसरी सीट के लायक भी राज्य में कांग्रेस को नहीं मानते, जबकि कांग्रेसी खुद को उत्तर प्रदेश में कम से कम दस सीटों लायक मानते हैं।
उत्तर प्रदेश के महागठबंधन के भागीदार भी राहुल गांधी को नेता नहीं मानते। बेशक कांग्रेस ने तीन राज्यों में भारतीय जनता पार्टी को अपदस्थ करके सत्ता छीन ली है, लेकिन मध्य प्रदेश में उसकी ताकत ज्यादा नहीं है। राजस्थान में भी भारतीय जनता पार्टी उससे ज्यादा पीछे नहीं है। असम, गुजरात, छत्तीसगढ़, उत्तराखंड, हिमाचल, तेलंगाना, कर्नाटक और उड़ीसा को छोड़ दें तो बाकी राज्यों में उसकी धमक नहीं है। कांग्रेस का दावा है कि वह अगले आम चुनाव में कम से कम 125 सीटें जीत लेगी। लेकिन सवाल यह है कि वह अपने छीन चुके आधार के साथ यह कामयाबी कैसे हासिल कर पाएगी? यह बात महागठबंधन के दल हों या फिर फेडरल फ्रंट के, वे समझते हैं, इसीलिए वे राहुल गांधी की अगुआई को स्वीकार करने से हिचक रहे हैं।
फिर भी राहुल के पक्ष में दक्षिण भारत के दो राज्य हैं, जिनके ताकतवर नेताओं ने राहुल गांधी को अभी से ही प्रधानमंत्री के विकल्प के तौर पर देखना शुरू कर दिया है। आंध्र प्रदेश के मुख्यमंत्री नारा चंद्रबाबू नायडू और तमिलनाडु के द्रविड़ मुनेत्र कषगम के महासचिव स्टालिन राहुल गांधी को तकरीबन नेता मान चुके हैं। एन चंद्रबाबू नायडू दरअसल मोदी से चिढ़े हुए हैं। उन्होंने 1996 से लेकर 1998 तक देवेगौड़ा और गुजराल सरकारों को एक तरह से ब्लैकमेल किया तो बाद में वाजपेयी सरकार को। तीनों सरकारों को वे अपनी उंगली पर नचाते रहे और आंध्र प्रदेश के लिए भारी फंड जुटाते रहे। शायद उन्होंने नरेंद्र मोदी से भी ऐसी ही उम्मीद रखी, लेकिन वे नाकाम रहे। राज्य की अलग राजधानी अमरावती में बनाने के लिए उन्हें छह हजार करोड़ चाहिए, इसके लिए उन्होंने केंद्र से उम्मीद लगाई, राज्य को विशेष दर्जा दिलाने का अभियान चलाया, लेकिन मोदी उनके सामने नहीं झुके। फिर चिढ़कर उन्होंने मोदी के खिलाफ अभियान ही चला दिया। स्टालिन के पिता करूणानिधि गुजर चुके हैं, तो उनकी प्रतिद्वंद्वी जयललिता का भी निधन हो चुका है। लगता है कि बदले हालात में स्टालिन को खुद पर भरोसा नहीं है, इसलिए वे राज्य में कांग्रेस के छीजते ही सही, आधार को अपना सहयोगी बनाने की उम्मीद पाल बैठे। इसलिए वे राहुल के साथ हैं।
राहुल के साथ महबूबा मुμती और उमर अब्दुल्ला भी बन सकते हैं। लेकिन उनकी राय स्पष्ट नहीं है। जम्मू-कश्मीर सरकार से भाजपा के अलग होने से महबूबा चिढ़ी हुई हैं तो उमर अब्दुल्ला मोदी के कट्टर आलोचक हैं। इसलिए वे भाजपा के विरोध में किसी भी तरह का कदम उठा सकते हैं। लेकिन यह भी तय मानिए कि अगर केंद्र में फिर से भाजपा की सरकार बनेगी तो वे पाला बदलने में भी देर नहीं लगाएंगे। यानी वे भारतीय जनता पार्टी के साथ भी जा सकते हैं, बशर्ते कि उनके अहं को थोड़ा सहला दिया जाए।
अब महागठबंधन के प्रमुख गढ़ बिहार की तरफ ध्यान देते हैं। आर्थिक रूप से पिछड़े वर्ग के लिए दस फीसद आरक्षण के मोदी सरकार के फैसले के बाद बिहार के महागठबंधन दलों में भी खींचतान शुरू हो गई है। जीतन राम मांझी तो कह रहे हैं कि यह आरक्षण दस नहीं, पंद्रह प्रतिशत होना चाहिए। जबकि राष्ट्रीय जनता दल नेता तेजस्वी यादव इसका विरोध कर रहे हैं। ऐसे में महागठबंधन में रार बढ़ सकती है और बनने से पहले ही यह कम से कम बिहार में कमजोर हो सकता है। बहरहाल इस पूरी चर्चा में एक तथ्य पर और ध्यान दिया जाना चाहिए। राहुल गांधी अपने रौ में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी का हर मंच से विरोध कर रहे हैं। इसको मीडिया हाथोंहाथ ले भी रहा है। लेकिन अति उत्साह में उनका विरोध अब निंदात्मक अभियान लगने लगा है। प्रधानमंत्री बनने की आकांक्षा रखने वाले नेता से देश ऐसी उम्मीद नहीं करता। एक यह भी वजह है कि फेडरल फ्रंट के नेता राहुल से एक निश्चित दूरी बनाकर चल रहे हैं। अगर हालात ऐसे बने कि विपक्षी गठबंधन सरकार बनाने लायक आंकड़ों के नजदीक पहुंच सका तो तय है कि प्रधानमंत्री पद के लिए सिर फुटौव्वल जैसे हालात होंगे। हालांकि आपसी खींचतान, स्थानीय राजनीति की उलटबांसियों की वजह से ऐसा होता नजर नहीं आता।

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