वसुंधरा को संघ का साथ

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मुख्यमंत्री वसुंधरा राजे के खिलाफ जिस तरह की हवा देखी जा रही थी, अब वैसी नहीं दिख रही है। संघ और भाजपा संगठन से पूरा जोर लगा दिया है। लेकिन यह भी सही है कि राजनीतिक दलों को अब उनके दांव और पैंतरे ही चुनाव जिताएंगे। इसमें भी भाजपा कांग्रेस पर भारी पड़ रही है।

सात दिसम्बर को होने वाले राजस्थान विधानसभा चुनावों के लिए पिछले एक पखवाड़े तक अगर कोई मुद्दा था भी, तो अब नहीं है। मुख्यमंत्री वसुंधरा राजे के खिलाफ जिस तरह की हवा देखी जा रही थी, अब वैसी नहीं दिख रही है। संघ और भाजपा संगठन से पूरा जोर लगा दिया है। लेकिन यह भी सही है कि राजनीतिक दलों को अब उनके दांव और पैंतरे ही चुनाव जिताएंगे। इसमें भी भाजपा कांग्रेस पर भारी पड़ रही है। दोनों दलों ने चुनावी अखाड़े में 11 दल-बदलू उतारे हैं। कांग्रेस ने हरीश मीणा, हबीबुर्रहमान, मानवेन्द्र सिंह और सोना देवी को मौका दिया। भाजपा ने कल्पना सिंह, अशोक शर्मा, ममता शर्मा, अभिनेश महर्षि, राजेन्द्र मामू, रामकिशोर सैनी और महेश प्रताप को टिकट दिए। दोनों ही दलों ने डेढ़ दर्जन से ज्यादा ‘पैराशूट’ प्रत्याशियों को चुनावी रण में उतार दिया। इनमें ऐसे भी नेता हैं जिन्होंने एक जिले से दूसरे जिले की उड़ान भरी। चुनावी रण में भाजपा ने सभी 200 सीटों पर उम्मीदवार उतारे हैं। कांग्रेस ने 195 सीटों पर उम्मीदवार उतारे और 5 सीटों पर गठबंधन किया है। पांच सीटें गठबंधन को देने के पीछे कांग्रेस की मंशा आगामी लोकसभा चुनाव में देशव्यापी महागठबंधन के लिए सहयोगी दलों के लिए जमीन तैयार करना है।

कांग्रेस ने प्रदेश में दो सीटें चौधरी अजीत सिंह के राष्ट्रीय लोकदल. दो सीटें शरद यादव के लोकतांत्रिक जनता दल और एक सीट राष्ट्रवादी कांग्रेस पार्टी के शरद पवार को तालमेल के तहत दी है। प्रदेश की सबसे ‘हॉट सीट’ झालरापाटन और टोंक हैं। झालरापाटन से मुख्यमंत्री वसुंधरा राजे चुनाव लड़ रही हैं। कांग्रेस ने उनके सामने जसवंत सिंह के पुत्र मानवेन्द्र को प्रत्याशी बनाया है। लेकिन विश्लेषकों का कहना है,‘राजे का किला ढहाना एक हसीन ख्वाब से ज्यादा कुछ नहीं है। गुर्जर बहुल मतदाताओं को अपने पाले में लेना भी मानवेन्द्र के लिए मुश्किल होगा। इसकी वजह है प्रहलाद गुंजल की जबरदस्त पकड़ है। गुंजल वसुंधरा राजे के भरोसेमंद हैं और फिलहाल कोटा (उत्तर) से भाजपा के प्रत्याशी है। टोंक से कांग्रेस के प्रदेश अध्यक्ष सचिन पायलट चुनाव लड़ रहे हैं। भाजपा ने उनके सामने यूनुस खान को उम्मीदवार बनाया है। यूनुस खान भाजपा के इकलौते मुस्लिम उम्मीदवार हैं। आरएसएस पहले दिन से यूनुस खान को टिकट देने के खिलाफ था। हालांकि भाजपा को अपना तुरुप का पत्ता चलने के लिए अपने घोषित प्रत्याशी अजीत मेहता का टिकट काटना पड़ा। यूनुस खान के समर्थन में वसुंधरा राजे अड़ गयीं तो आरएसएस को पीछे हटना पड़ा।

लाख टके का सवाल है कि, नामांकन के तुरंत बाद आयोजित एक जनसभा में सचिन पायलट ने यह तो कह दिया कि,‘आप लोग टोंक संभालिए। मैं अकेला प्रदेश में भाजपा से कबड्डी खेल लूंगा।’’ लेकिन विश्लेषकों का कहना है कि,‘संघ प्रभावी क्षेत्र क्या केसरिया पैंतरों से अछूता रह जाएगा? टोंक में मुसलमान 55 हजार की आबादी में हैं। इन्हें देसवाली मुस्लिम कहा जाता है। इनकी ज्यादा बसावट पुराने टोंक में है। इनका रोजगार बीड़ी बांधने और नमदे बनाने तक ही सीमित है। मुस्लिम आबादी काफी गुरबत की हालत में है। उस पर कोढ़ में खाज है कि गुर्जरों की आंखों की किरकिरी भी बने हुए हैं? विश्लेषकों का कहना है कि आरएसएस इनकी नई पीढ़ी को अपनी ढाल बनाकर कोई भी पैंतरा खेल सकता है। इसे रोक पाने में सचिन की स्थानीय नेताओं पर निर्भरता के कितनी टिकेगी, देखना बाकी है। उधर भाजपा ने मंदिर,मठ और सियासत का एक और दांव खेल दिया है। तारातरा मठ के महंत प्रतापपुरी के बाद भाजपा ने आई माता सम्प्रदाय के धर्मगुरू कांग्रेस के नेता माधो सिंह दीवान को भी पाले में कर लिया है।

तारातरा मठ का जैसलमेर और बाड़मेर में खासा असर माना जाता है। आरएसएस की शह पर भाजपा जब इस चुनाव को हार्ड हिन्दुत्व के एजेंडे पर लड़ रही है तो क्या राम मंदिर मुद्दा नहीं उछलेगा? भाजपा ने जब पोकरण सीट से तारातरा मठ के महंत प्रतापपुरी को खड़ा किया है तो इसका मतलब क्या हुआ? उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ की राजस्थान यात्रा में ‘हिन्दू मुद्दा’ कितना उछलेगा? कहने की जरूरत नहीं है। प्रदेश में तीसरा मोर्चा नहीं बनने से भले ही भाजपा और कांग्रेस ने राहत की सांस ले ली। लेकिन अभी कई सीटें ऐसी है, जहां अन्य दलों ने समीकरण बिगाड़ दिए हैं। इसके चलते कहीं त्रिकोणीय तो कहीं चतुष्कोणीय मुकाबले बनते दिख रहे हैं। हाड़ोती संभाग में सबसे बड़ा उलटफेर लाड़पुरा सीट पर रहा। भाजपा ने तीन बार के विधायक भवानीसिंह राजावत का टिकट काटकर कांग्रेस से भाजपा में आये पूर्व सांसद इज्यराज सिंह की पत्नी कल्पना सिंह को दिया। लेकिन आरएसएस के वरिष्ठ पदाधिकारी भाजपा के इस पैंतरे को पचा नहीं पा रहे हैं ? सूत्रों की मानें तो वसुंधरा राजे ने यह तर्क देकर आरएसएस पदाधिकारियों को निरुत्तर कर दिया कि,‘इससे राजपूत मतदाताओं की नाराजगी को दूर किया जा सकेगा।

राजे का यह पैंतरा क्षेत्रीय सांसद ओम बिरला की ठसक को ठेस लगाने के उनके मंसूबे को भी पूरा करेगा। राजे के बारे में कहा जाता है कि ‘अपने विरोधियों को उन्होंने कभी पनपने का अवसर नहीं दिया। जयपुर के पूर्व राजघराने की सदस्या और वर्तमान में सवाई माधोपुर से भाजपा विधायक दीया कुमारी का टिकट कटना इस बात को हवा देता लगता है। अटकलें हैं कि जयपुर स्थित राजमहल पैलेस होटल विवाद को लेकर दोनों के संबधों में खटास आ गई थी। उनके टिकट कटने की यही वजह रही। उधर दीया कुमारी इन अटकलों को हवाबाजी बताती हैं। उनका कहना है कि,‘वसुंधराजी ही मुझे राजनीति में लेकर आई। इसलिए वो मेरा टिकट क्यों काटेंगी ?’’ उधर जयपुर पहुंचे भाजपा के राष्ट्रीय अध्यक्ष अमित शाह के युवाओं के कार्यक्रम को वसुंधरा राजे ने यह कहकर गरमा दिया कि,‘जनवरी में मीडिया कह रहा था, भाजपा तो गई। लेकिन अब कहा जा रहा है कि, थोड़ी कोशिश करेगी तो सरकार बन जाएगी। इस मौके पर अमित शाह का कथन कई सवाल खड़े कर गया कि,‘लोकसभा चुनाव जातिवाद के खिलाफ होगा ।’’ विश्लेषकों ने यह कहकर इस मुद्दे को खदबदा दिया है कि,‘…..तो फिर भाजपा हिन्दू कार्ड के साथ चुनावों में क्यों उतरी ? बाड़मेर-जैसलमेर में भाजपा ने मौजूदा तीन विधायकों के टिकट काटकर उन चेहरों को तवज्जो क्यों दी, जो हिन्दूवादी नेता के रूप में जाने जाते हैं। चैहटन सीट से भी आरएसएस की पसंद आदूराम मेघवाल को प्रत्याशी बनाया गया है। श्री गंगानगर में भाजपा ने विनीता आहूजा को चुना है। उनेक पति दर्शन आहूजा संघ से जुड़े रहे हैं। खाजूवाला में भाजपा प्रत्याशी विश्वनाथ मेघवाल भी संघ की पसंद हैं?

 

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