लोकोपकारी योजनाओं सेभी तौबा

सी तमाम योजनाएं जो पिछली सरकार में सालों तक लोकोपकारी मानी जाती रहीं, क्या राजनीतिक नेतृत्व बदलते ही अपनी उपयोगिता खो बैठी हैं? यह एक बड़ा सवाल है जो इन दिनों मध्य प्रदेश के सत्ता गिलयारे मेंं गुंजायमान है। पंद्रह साल बाद बेहद महीन बहुमत से सत्ता संभालते वक्त मुख्यमंत्री कमलनाथ ने वायदा किया था कि वे पुरानी सरकार की जनकल्याण कारी योजनाओं से छेड़खानी नहीं करेंगे लेकिन वास्तव में हुआ इसके विपरीत।
सरकार बनते ही पिछली सरकार की कुछ योजनाओं को बंद करना या उनका नाम बदलना प्राथमिकता में पहले क्रम पर रहा। मसलन, पं. दीनदयाल उपाध्याय के नाम पर वंचित वर्ग के लिए प्रारंभ की गई आधा दर्जन योजनाओं पर सबसे पहले कमलनाथ सरकार की गाज गिरी। पं. दीनदयाल उपाध्याय के नाम पर शुरू की गई वनांचल योजना को फिजूलखर्ची बताकर रोक दिया गया। यह योजना आदिवासी अंचलों में स्वास्थ्य सुविधाओं के लिए वर्ष 2016 में शुरू की गई थी। पूर्व मंत्री डॉ. गौरी शंकर शेजवार की पत्नी किरण शेजवार इस योजना की पर्यवेक्षक थीं। यही बात योजना के खिलाफ गई। भाजपा ने इस योजना को बंद किए जाने पर भले कोई प्रतिक्रिया न दी हो लेकिन मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान ने यह जरूर कहा है कि जनकल्याण की कोई योजना बंद नहीं होनी चाहिए।
जिन योजनाओं पर गाज गिरी है, उनमें मीसा बंदियों को मिलने वाली पेंशन योजना भी शामिल है। मध्य प्रदेश में आपातकाल के दौरान जेल जाने वाले मीसा बंदियों को राज्य सरकार ने लोकतंत्र सेनानी का दर्जा देते हुए सन 2008 में उनके लिए पेंशन योजना शुरू की थी। तीन हजार रुपये प्रतिमाह से प्रारंभ यह पेंशन वर्ष 2017 तक बढ़ाकर 25 हजार रुपये कर दी गई थी। लगभग दो हजार से अधिक लोग इसका लाभ ले रहे थे। योजना पर राज्य सरकार सालाना 75 करोड़ रुपये व्यय कर रही थी। कांग्रेस की मीडिया प्रभारी शोभा ओझा का आरोप था कि वास्तविक स्वतंत्रता सेनानियों को समय पर पेंशन नहीं मिल पा रही है और लोकतंत्र सेनानी हजारों रुपये प्रतिमाह यूं ही ले रहे हैं। कांग्रेस सरकार के मंत्री सज्जन सिंह वर्मा ने तो यहां तक आरोप लगा डाला कि उस दौर में जेल में किसी अन्य कारण से बंद रहे ‘चोर-उचक्के’ भी योजना की मलाई छान रहे हैं। वंदे मातरम गायन बंद करने का किस्सा भी कम विवादों में नहीं रहा। मध्य प्रदेश सचिवालय में महीने की पहली तारीख को वंदेमातरम का सामूहिक गान करने की परंपरा तेरह साल पहले डाली गई थी। लेकिन राज्य में नई सरकार बनते ही जब गान नहीं हुआ तो भाजपा ने इसे राष्ट्र का अपमान बताया। पूर्व मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान की प्रतिक्रिया थी ‘ कांग्रेस भूल गई है कि सरकारें आती हैं, जाती हैं लेकिन देश और देशभक्ति से ऊपर कुछ भी नहीं है। मैं मांग करता हूं कि यह सिलसिला जारी रहना चाहिए।’ वंदेमातरम को लेकर शिवराज सिंह की चोट निशाने पर बैठी थी। कमलनाथ को संभवत: अंदाजा भी नहीं था कि वंदेमातरम को लेकर इतना बड़ा वितंडावाद भी खड़ा हो सकता है। कमलनाथ ने यू टर्न लिया और चीफ सेक्रेटरी एसआर मोहंती से सफाई मांगी। पता लगा कि वंदेमातरम गान में अधिकारियों-कर्मचारियों द्वारा रुचि नहीं ली जाती है। कमलनाथ ने ऐलान किया वंदेमातरम का गायन पुलिस बैंड के साथ होगा। आमजन की भी इसमें भागीदारी होगी और न सिर्फ मंत्रालय में अपितु संभाग व जिला मुख्यालयों में भी राष्ट्रगान जन गण मन तथा राष्ट्रीय गीत वंदेमातरम गाया जाएगा।
नई सरकार ने शिवराज सिंह की सरकार द्वारा प्रारंभ ‘आनंद मंत्रालय’ को बदल कर अध्यात्म मंत्रालय कर दिया। आनंद मंत्रालय हालांकि एक शिगूफा ही बन कर रह गई थी। इसके लिए बनाई गईं नेकी की दीवारें महज रस्म अदायगी बन कर रह गईं थीं। अब देखना होगा कि आनंद मंत्रालय को आध्यत्म मंत्रालय में बदलना कितना कारगर साबित होता है।कमलनाथ सरकार जिन योजनाओं का नाम बदलने जा रही है, उनमें संबल योजना सबसे ऊपर है। यह योजना 2018 में शिवराज सिंह चौहान चुनाव से कुछ पहले लेकर आए थे। योजना के तहत 200 रुपये महीने के μलैट रेट पर बिजली देने की व्यवस्था के अलावा पुराने बिजली बिलों को माफ किया गया था। इसी तरह संबल योजना की श्रेणी में आने वाले बच्चों की पूरी फीस सरकार उठाती थी और नि:शुल्क चिकित्सा सुविधा भी मुहैया कराने का प्रावधान योजना में था नई सरकार योजना का नाम बदलने की तैयारी में है तो इसे लेकर विवाद उठने लगे हैं।

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