..लेकिन यह वाजिद अली का शतरंज नहीं है

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जम्मू कश्मीर में सरकार बनाने का दावा करने वाले हवा में तलवारें भांज रहे थे, तीर मार रहे थे। वास्तव में यह शतरंज दोतरफा नहीं, तितरफा खेल बन गया जहां मुकाबला केवल राज्यपाल या केंद्र और कथित गठबंधन के बीच ही नहीं था अपितु गठबंधन के बीच के दलों में आपस में भी था। खेल अभी समाप्त नहीं हुआ है लेकिन अगर किसी को इसमें शह मिली है तो केवल महबूबा को। अप्रांसगिक बनने का सबसे बड़ा खतरा तो उन्हीं को है।

सत्यपाल मलिक के जम्मू कश्मीर में राज्यपाल बनते ही शतरंज का नया खेल शुरू हो गया है। बरसों से कश्मीरी भूल ही गए थे कि राजनीति भी कोई खेल होता है। आतंकवादियों ने ऐसा माहौल बना दिया था कि सुरक्षा बलों को भी अपना दबदबा दिखाने की आवश्यकता पड़ी। दोनों ओर से गोलियों की गूंज में किसी को फुर्सत ही नहीं थी कि चिर परिचत खेल राजनीति का भी अभ्यास करें। केंद्र सरकारें मानती थीं कि जम्मू कश्मीर को या तो पूर्व सैनिक अधिकारी सम्भाल सकते हेंै या नौकरशाह। स्थानीय राजनैतिक दलों को भी यही रास आता था। राजनीति ऐसा खेल है जिसमें नित नई चालें चलने की आवश्यकता होती है, नवीकरण इसका स्वभाव होता है। नेशनल कांफ्रेंस हो या कांग्रेस या फिर महबूबा की पीडीपी, अपने-अपने तरकस में जितने भी तीर थे, कई कई बार चला चुके हैं।

बार-बार एक ही तरह की प्रतिस्पर्धा से लोग भी ऊब गए हैं। इसलिए राजनैतिक दलों को ऐसे माहौल में क्या आपत्ति होती जिसमें उन्हें तो कुछ भी नहीं करना, केवल अपने-अपने घरों या कार्यालयों से बयान जारी करना है, निंदा प्रस्ताव पारित करना है और लोगों को मैदान में टिके रहने के लिए उकसाना भर है। यह कोई नई बात नहीं है, जम्मू कश्मीर के लिए पुराना दस्तूर है। यहां तो जब भी किसी राज्यपाल ने राजनीति करने की कोशिश की, उसके विरुद्ध सच या झूठ के आरोप लगा कर चलता करने के हालात पैदा कर दिए गए। जगमोहन थे तो नौकरशाह ही, लेकिन उन्हें लगा कि राजनैतिक दलों को सही मार्ग पर लाने के लिए कुछ राजनीति की जाए। तो क्या हुआ- यह जगजाहिर है। अब बरसों बाद एक शुद्ध राजनीतिज्ञ को दिल्ली से, या यूं कहें पटना से श्रीनगर भेजा गया राज्यपाल बनाकर तो बहुतों को चिंता होने लगी कि क्या करेंगे मलिक साहब कश्मीर में। उन्हें तो जम्मू कश्मीर की राजनीति, वहां की सुरक्षा समस्याओं का कोई अनुभव नहीं है। लोगों का हैरान होना स्वाभाविक था लेकिन लगता है कि राजनीति के खेल के नियम- कायदे सब जगह के लिए एक ही होते हैं। बस मैदान को देखकर थोड़ा बदलाव करना पड़ता है। वही राज्यपाल मलिक ने किया।

राजनैतिक दलों को किसी चुनाव की जल्दी नहीं थी, वे 2019 के लोकसभा चुनावों की तैयारी कर रहे थे, क्योंकि उनका मानना था कि केंद्र सरकार जम्मू कश्मीर विधान सभा के चुनाव भी तभी कराएगी। नेशनल कांफ्रेंस सबसे कम परेशान थी और पीडीपी सबसे अधिक। इनमें से किसी दल को किसी मिली जुली सरकार में कोई रुचि नहीं थी। ऐसी समझौता सरकारों का अनुभव इन सबको था। खास कर पीडीपी के साथ गठबंधन सरकार बनाना कितना जोखिम का काम है, यह वे जानते थे। नेशनल कांफ्रेंस तो 2019 में बहुमत का लक्ष्य लेकर चल रही थी। वास्तव में पीडीपी सबसे परेशान इसलिए थी कि बाकी सभी दल उसी से समर्थन छीनने की कोशिश कर रहे थे। महबूबा को एहसास था कि दिन प्रतिदिन उनका समर्थन आधार कम होता जा रहा था। घाटी के किनारे पर सज्जाद लोन भी अपना जनाधार बढ़ाने की फिराक में थे। लोन हर माहौल में कुपवारा और हंदवारा का अपना आधार बचाए रखने में कामयाब हो गए थे और अब वे इस आधार को विस्तार देने का प्रयास करने लगे थे। लोन, अन्य दो दावेदारों उमर और महबूबा के लिए भी चिंता पैदा करने लगे थे। ऐसे में महबूबा को लगा कि अगर अपने दुश्मनों की मदद से भी 2019 की तलवार सर से हट जाए तो आगे की समरनीति बनाई जा सकती है। अगर नेशनल कांफ्रेंस और कांग्रेस सरकार बनाने के लिए मदद कर सकते हैें तो इस विधान सभा को भंग करने की आवश्यकता ही नहीं पड़ेगी ।

गठबंधन की बात आरम्भ ही हुई थी कि राज्यपाल को अपनी चाल चलने की सूझी। उन्होंने गठबंधन का आधार समाप्त करने के लिए विधानसभा को ही भंग कर दिया। तर्क दिया कि दल बदल की आशंका बढ़ गई थी, पार्टियां एक दूसरे के विधायकों को छीनने का प्रयास कर रही थीं और इस बात का कोई आश्वासन ही नहीं था कि जो सार्वजनिक तौर पर दावा किया जा रहा है, वह तथ्यों पर आधारित है? प्रश्न उठता है कि क्या सचमुच कोई गठबंधन बन गया था। उमर और आजाद के बयानों से तो बस इतना ही पता चलता है कि गठबंधन बनाने की कोई बातचीत आरम्भ हुई थी। न तो कोई शर्त तय हुई थी और न नीतियों को बारे में कोई सहमति हुई। यहां तक कि पीडीपी के अतिरिक्त और किसी दल ने आधिकारिक रूप से गठबंधन बनाने के बारे में अपना फैसला भी नहीं जारी किया था।

लेकिन इस गठबंधन की संभावना की चर्चा से ही राजनैतिक रूप से लगभग सोए हुए राज्य में अचानक हरकत आ गई। सज्जाद लोन राज्यपाल से मिलने चले आए कि मेरे पास विधायकों का बहुमत है। मेरे अपने दो और भाजपा के 25 विधायकों के अतिरिक्त 18 अन्य विधायक भी मेरा साथ देने को तैयार हंै। ये अतिरिक्त विधायक कौन हैं और किस पार्टी के हैं, यह विवरण नहीं दिया। लेकिन वैसा ही दावा स्वयं महबूबा ने भी किया था। उन्होंने राज्यपाल को जो पत्र दिया, उसमें अपने दल के अतिरिक्त नेशनल कांफ्रेंस और कांग्रेस के विधायकों के समर्थन का भी दावा किया था लेकिन इन दलों के सहमति पत्र नही थे। अगर गठबंधन था तो राज्यपाल के सामने ऐसा दावा किया जाना चाहिए था। यानी सब हवा में तलवारें भांज रहे थे, तीर मार रहे थे। वास्तव में यह शतरंज दोतरफा नहीं, तितरफा खेल बन गया, जहां मुकाबला केवल राज्यपाल या केंद्र और कथित गठबंधन के बीच ही नहीं था, अपितु गठबंधन के बीच के दलों में आपस में भी था। खेल अभी समाप्त नहीं हुआ है लेकिन अगर किसी को इस में शह मिली है तो केवल महबूबा को क्योंकि अप्रांसगिक बनने का सबसे बड़ा खतरा तो उन्हीं को है। कश्मीर में कांग्रेस और नेशनल कांफ्रेंस के बीच काफी जगह खाली रही है, जिसे भरने का प्रयास पीडीपी ने किया था। मुफ़्ती सईद ने कई गुटों को अपने पक्ष में कर लिया था।

 

कश्मीर में कांग्रेस और नेशनल कांफ्रेंस के बीच काफी जगह खाली रही है, जिसे भरने का प्रयास पीडीपी ने किया था। मुफ़्ती सईद ने कई गुटों को अपने पक्ष में कर लिया था। इनमें अधिकतर जमायते इस्लामी के प्रभावी कार्यकर्ता थे। उनकी मौत के पश्चात उनकी बेटी न तो सर्मथकों को संभाल पाई और न ही विरासत में पाई अपनी हकूमत को।

इनमें अधिकतर जमायते इस्लामी के प्रभावित कार्यकर्ता थे। उनकी मौत के पश्चात उनकी बेटी न तो सर्मथकों को संभाल पाई और न ही विरासत में पाई अपनी हकूमत को। इसलिए उनके पीछे वह राजनीतिक खालीपन अब सबकी छीना झपटी का मुद्दा बन गया है। इसे भरने में कौन सफल होगा, यह आने वाले कुछ ही महीनों में दिखने लगेगा । अगर कश्मीरी जनमत का कोई तीसरा पक्ष भी उभर कर आए तो वहां की राजनीति में यह बहुत महत्त्वपर्ण बदलाव होगा। शतरंज के इस खेल में सत्यपाल मलिक कहां तक जा सकते हैं, नहीं कहा जा सकता है। ध्यान रखना होगा कि कहीं यह वाजिद अली शाह का शतरंज न बने, जिसमें जीत खेल में मस्त खिलाडि़यों की नही, सब के साझे दुश्मन की हो जाती है। यह बात तो सच है कि इस हलचल में कश्मीर की जनता को अपने और अपनी राजनीति के बारे में सोचने का मौका अवश्य मिलेगा, जिसे वह बंदूकों के शोर में बहुत हद तक भूल ही गयी थी।

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