राजग की स्थिति मजबूत

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बिहार में यदि लालू प्रसाद के पक्ष में यादव-मुसलमान गोलबंद हैं तो दूसरी ओर राजद विरोधी वोट भी कम नहीं है। वह लालू विरोधी वोट नरेंद्र मोदी के पक्ष में जाने वाले ठोस वोट के अलावा है। यदि मोदी ‘सीन’ में नहीं भी होते तो भी लालू विरोधी वोट राजग को ही मिलता। पहले भी मिलता रहा है।

भाजपा बिहार को लेकर निश्चिंत हो सकती है। 2019 में होने वाले लोक सभा चुनाव में राजग 2014 को लगभग दोहरा सकता है। ऐसे संकेत मिल रहे हैं। जद यू से भाजपा के समझौते के बाद निश्चिंतता आई है। हां, राम विलास पासवान की लोजपा और उपेंद्र कुशवाहा की रालोसपा से अभी अंतिम बातचीत होनी है। लोजपा के साथ भाजपा को शायद कोई दिक्कत नहीं आएगी। पर महत्वाकांक्षी उपेंद्र कुशवाहा के साथ हल्की दिक्कतें आ सकती हैं। फिर भी बात बन सकती है।
बिहार में यदि लालू प्रसाद के पक्ष में यादव-मुसलमान लगभग गोलबंद हैं तो दूसरी ओर राजद विरोधी वोट भी कम नहीं है। वह लालू विरोधी वोट नरेंद्र मोदी के पक्ष में वाले ठोस वोट के अलावा है। यदि मोदी ‘सीन’ में नहीं भी होते तो भी लालू विरोधी वोट राजग को ही मिलता। पहले भी मिलता रहा है। वोट तो नीतीश कुमार के पक्ष में भी है। वह विकास के पक्ष वाला वोट है। महिलाओं व अति पिछड़ों के बड़े हिस्से का आकर्षण नीतीश के प्रति है। इस बात पर भी वोट है कि नीतीश कुमार के खिलाफ न तो नाजायज धन संग्रह का आरोप है और न ही परिवारवाद का। हालांकि ऐसे वोट कम हैं। लालू प्रसाद व उनके सहयोगियों के पास कितने वोट हैं, उसके प्रमाण 2014 के लोक सभा चुनाव व 2010 के बिहार विधान सभा चुनाव में मिल चुका है। लालू प्रसाद 2010 में राम विलास पासवान के साथ चुनाव लड़े थे। उन्हें 243 सीटों वाली विधान सभा में मात्र 25 सीटें मिलीं। 23 राजद और 2 लोजपा को।

2014 में लालू प्रसाद को बिहार में सिर्फ 4 सीटें मिलीं। यादव-मुस्लिम बहुल क्षेत्रों में ही उनके गठबंधन का निर्णायक असर रहा। इसी साल मार्च में हुए उप चुनावों के नतीजे भी लालू गठबंधन के लिए कोई उम्मीद नहीं बढ़ाते। लालू गठबंधन आठ में से तीन विधान सभा क्षेत्र में ही जीत पाया। अररिया लोक सभा और भभुआ तथा जहानाबाद विधान सभा क्षेत्रों के लिए 11 मार्च 2018 को उप चुनाव हुए थे। इस उप चुनाव में यह बात भी देखी गयी कि राजद के मुस्लिम -यादव समीकरण के मतों की एकजुटता पहले की अपेक्षा बढ गयी है। नरेंद्र मोदी की लहर के बावजूद सन् 2014 के लोक सभा चुनाव में मुस्लिम-यादव बहुल क्षेत्र अररिया से राजद के तसलीमुद्दीन विजयी हुए थे। इस बार तसलीमुद्दीन के पुत्र सरफराज आलम राजद के उम्मीदवार थे। उप चुनाव में सरफराज विजयी रहे। सरफराज हाल तक जदयू विधायक थे। उन्होंने विधान सभा की सदस्यता से इस्तीफा दिया। उसके बाद राजद की ओर अपने पिता की सीट पर उम्मीदवार बने। अररिया लोक सभा क्षेत्र के भीतर पड़ने वाले जोकीहाट और अररिया विधान सभा चुनाव क्षेत्रों में राजद को भारी बढ़त मिली।

वहां के मतदाताओं ने आक्रामक ढंग से मतदान किया। जोकी हाट में 70 प्रतिशत और अररिया में 59 प्रतिशत मुस्लिम आबादी है। अन्य चार विधान सभा खंडों में भाजपा के उम्मीदवार प्रदीप कमार सिंह को बढ़त मिली थी। सरफराज की खाली की गयी विधान सभा सीट से बाद में राजद जीता। यह स्वाभाविक ही था। मिलीजुली आबादी वाले बिहार में अधिकतर विधान सभा क्षेत्र हैं। मिली जुली आबादी यानी जातीय दृष्टि से भी मिली जुली आबादी वाला चुनाव क्षेत्र। कुल मिला कर दलीय समीकरण बिहार में राजग के अब भी अनुकूल ही है। सर्वे के नतीजों से भी यही बात सामने आई है।
हां, राजद के वोट बैंक यानी एमवाई-मुस्लिम यादव वर्चस्व वाले चुनाव क्षेत्र अररिया और जहानाबाद में राजद उम्मीदवारों के पहले की अपेक्षा बेहतर प्रदर्शन को लेकर तरह -तरह के अनुमान लगाए गए। क्या लालू प्रसाद के जेल जाने से मतदाताओं के एक वर्ग में बढ़ी सहानुभूति के कारण उनके वोट बैंक में एकजुटता और आक्रामकता बढ़ी? लालू प्रसाद एक बार फिर जेल में हैं। चारा घाटाले में लालू प्रसाद को पहली बार सन 2013 में सजा हुई थी। उस सजा से ठीक पहले राजद नेता ने कहा था कि यदि सजा होगी तो राजद बिहार की सभी 40 लोक सभा सीटें जीत जाएगा। पर सजा होने के बावजूद राजद को 2014 में लोक सभा की सिर्फ 4 सीटें ही मिलीं। इसलिए इस बार की सजा से उनके वोट बढेंगे, ऐसी कोई उम्मीद नहीं लगती। हां,यादव-मुस्लिम और अधिक एकजुट होंगे,यह बात पक्की है।

 

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