योगी की साख पर पानी फेरा

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विवेक तिवारी हत्याकाण्ड में आरोपित दोनों पुलिसकर्मी प्रशान्त चौधरी व संदीप कुमार अपने कारनामों के लिए चर्चित थे। प्रशान्त अपने दोस्तों के बीच ‘पीके डॉन’ के नाम से जाना जाता था। उसने अपने फेसबुक प्रोफाइल पर भी अपने नाम के आगे ‘पीके दि रायल जाट’ लिख रखा था। प्रशान्त ने 2014 में पुलिस भर्ती स्थगित किये जाने के विरोध में हुए प्रदर्शन में भी बढ़-चढ़ कर हिस्सा लिया था।

उत्तर प्रदेश की राजधानी लखनऊ में बीते दिनों एप्पल कम्पनी के प्रबंधक विवेक तिवारी की हत्या कर दी गयी। हत्या दो पुलिसवालों ने की। इससे मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ की अच्छे शासक की साख को चोट पहुंची। इसकी भरपाई में समय लगेगा। हालांकि दोनों पुलिसकर्मियों को बर्खास्त कर जेल भेज दिया गया। मुख्यमंत्री ने विवेक की पत्नी कल्पना तिवारी को सरकारी नौकरी और आवास के प्रस्ताव मंजूरी दे दी। 40 लाख रुपये का चेक कल्पना एवं परिजनों को प्रदान किया गया। लेकिन इससे पुलिस की कार्य प्रणाली पर सवालिया निशान खत्म होता नहीं दिख रहा है।

सबसे बड़ा सवाल पुलिस के मुखिया ओम प्रकाश सिंह पर उठाया जा रहा है। मुखिया के नाते वह अपनी जिम्मेदारी निभाने में विफल माने जा रहे हैं। कोढ़ में खाज यह है कि इन हत्यारे पुलिस वालों के समर्थन में उनके सहयोगी शहर-शहर, थाने-थाने नाफरमानी पर उतारू हो गये हैं। इसलिए तीन दरोगाओं समेत 11 पुलिसकर्मियों को समर्थन करने पर अलग-अलग सजाएं दी गयीं। फिर भी दुस्साहस का यह क्रम रुकने का नाम नहीं ले रहा है।

विवेक हत्याकाण्ड में आरोपित दोनों पुलिसकर्मी प्रशान्त चौधरी व संदीप कुमार अपने कारनामों के लिए चर्चित थे। प्रशान्त अपने दोस्तों के बीच ‘पीके डॉन’ के नाम से जाना जाता था। उसने अपने फेसबुक प्रोफाइल पर भी अपने नाम के आगे ‘पीके दि रायल जाट’ लिख रखा था। बुलन्दशहर का रहने वाला प्रशान्त वर्ष 2015 में सिपाही के पद पर भर्ती हुआ। उसने वहीं की रहने वाली सिपाही राखी मलिक से शादी की थी। राखी भी प्रशांत के साथ गोमतीनगर थाने में ही तैनात थी। प्रशान्त ने 2014 में पुलिस भर्ती स्थगित किए जाने के विरोध में हुए प्रदर्शन में भी बढ़-चढ़ कर हिस्सा लिया था।
प्रशान्त और संदीप गोमतीनगर थाने में मकदूमपुर पुलिस चौकी के पास रोज रात में राहगीरों से वसूली करते थे। सूत्र बताते हैं कि घटना की रात भी इन आरोपी सिपाहियों ने एक निजी कॉलेज के शिक्षक और उनके चार साथियों को धमकाकर रुपये वसूले थे। शिक्षक का अपराध यह था कि वह और उसके दोस्त एक रेस्त्रां से जन्मदिन की पार्टी करके रात में घर लौट रहे थे।

विवेक तिवारी हत्याकाण्ड में पर्दा डालने और आरोपियों को बचाने के लिए पुलिस ने हर कदम पर एक नया खेल खेला। विवेक को गोली मारे जाने के बाद पुलिस ने परिवारीजनों से तहरीर लेने के बजाय आनन-फानन विवेक की सहकर्मी सना से ही मनमाफिक तहरीर लिखवाकर मुकदमा दर्ज कर लिया। तहरीर लिखते समय पुलिसकर्मियों ने साथियों को बखूबी बचाने का प्रयास किया।

मामले में विपक्ष के साथ ही सत्ता पक्ष के जनप्रतिनिधियों ने प्रदेश पुलिस की भूमिका पर प्रश्न चिन्ह लगाया है। पूर्व केन्द्रीय मंत्री एवं सांसद कलराज मिश्र ने विवेक हत्याकाण्ड में पुलिस की भूमिका पर सवाल खड़ा किया। राज्यसभा सदस्य अमर सिंह ने कहा कि अगर मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ प्रदेश पुलिस के मुखिया ओपी सिंह को कायम रखते हैं तो सरकार की बदमानी होगी। प्रदेश के कानून मंत्री ब्रजेश पाठक ने कहा कि लखनऊ पुलिस ने स्वयं केस खराब कर दिया। पुलिस को सना को कब्जे में नहीं रखना चाहिए था। पुलिस ने एफआईआर को तोड़-मरोड़ कर पूरे केस में लीपापोती की। आरोपी सिपाही की मेजबानी करने से भी जनता में गलत संदेश गया।

पुलिसकर्मियों को नियमों के अनुरूप कार्यवाही व आचरण के लिए संवेदनशील बनाने के लिए मुख्यालय स्तर से लगातार प्रयास किये जाते रहे हैं। लेकिन पुलिस पर इसका कोई प्रभाव नहीं दिख रहा है। पुलिस के मुखिया ओपी सिंह ने 29 सितम्बर को गाजियाबाद व 30 सितम्बर को गौतमबुद्ध नगर में पुलिसकर्मियों से सीधे संवाद का कार्यक्रम रखा था। वह पहले भी कई जिलों में इसे संवाद कार्यक्रम का आयोजन कर पुलिसकर्मियों को आचरण का पाठ पढ़ा चुके हैं। 29 सितम्बर को ही लखनऊ में सिपाही प्रशांत और उसके साथी की करतूत ने प्रदेश पुलिस की कार्यशैली पर सवाल खड़ा किया है।

 

अनुशासनहीनता : काली पट्टी बांध कर विरोध जताते पुलिस वाले

पुलिस में अनुशासन के बिना काम नहीं चल सकता। इस बल में अनुशासन की परम्परा रही। विभाग में संवेदनशीलता रहती है। किसी को विभाग में रहना है तो अनुशासन का पालन करना ही पड़ेगा। पुलिस के मुखिया को विश्वसनीयता कायम करनी पड़ती है।

उत्तर प्रदेश पुलिस कई बड़े मौकों पर अपनों की ही चूक से खुद घिरती नजर आई। अधिकारियों के बीच सामंजस्य की कमी का नतीजा यह रहा कि पुलिस की खूब किरकिरी हुई। विवेक हत्याकाण्ड में आरोपित सिपाही और उसकी सिपाही पत्नी के गोमतीनगर थाने पर पहुंच कर उनकी तहरीर पर रिपोर्ट दर्ज किये जाने की मांग व अपने ही वरिष्ठ अधिकारियों के खिलाफ बयानबाजी ने कई बड़े सवाल खड़े किये। इससे पूर्व उन्नाव काण्ड में भी पुलिस की शुरुआती चूक ही उस पर भारी पड़ गई। इस घटना में पीडि़त किशोरी की सुनवाई न होने पर उसे मुख्यमंत्री आवास का रुख करना पड़ा। इसके बावजूद उन्नाव पुलिस ने पीडि़त किशोरी के पिता को फर्जी तरीके से तमंचे की बरामदगी दिखाकर जेल भेजने का षड़यंत्र रचा था। यही खेल बाद में बहुत भारी पड़ा था।

वर्तमान समय में पुलिस में जो अनुशासनहीनता बढ़ रही है वो चिंताजनक है। अफसरों और जवानों के बीच में फासला बढ़ रहा है। उच्च शिक्षित युवक-युवती आजकल पुलिस बल में भर्ती हो रहे हैं। अधिकारी अपने को सम्मान योग्य बनाएं। काली पट्टी का मतलब अधिकारी की साख का कम होना है। 

प्रकाश सिंह, (पूर्व पुलिस महानिदेशक यूपी)

 

विवेक तिवारी हत्याकाण्ड में बर्खास्त सिपाहियों के पक्ष में खड़े हो कर विरोध करने वाले पुलिसकर्मियों की संख्या दिन-प्रतिदिन बढ़ती जा रही है। पुलिस महानिदेशक ओम प्रकाश सिंह के दांवों के विपरीत लखनऊ, सीतापुर, फैजाबाद, फिरोजाबाद, गाजीपुर, सिपाहियों ने काली पट्टी बांध पर विरोध जताया है। इस विरोध का स्वर कमोवेश प्रदेश के हर जिले में है। 7 अक्टूबर तक एक दरोगा समेत 11 पुलिसकर्मियों को लाइन हाजिर कर दिया गया। राजधानी लखनऊ में ही 5 अक्टूबर को अलीगंज, गुडम्बा एवं नाका थाने पर सिपाहियों ने काली पट्टी बांध कर प्रदर्शन किया। इसके बाद प्रदेश के मुखिया योगी आदित्यनाथ ने देर शाम मुख्य सचिव, पुलिस महानिदेशक और प्रमुख सचिव गृह को बुलाकर इस पर कड़ी नाराजगी जताई। मुख्यमंत्री के सख्त रुख के बाद इन थानों में प्रदर्शन करने वाले तीन सिपाहियों गौरव चौधरी, जीतेन्द्र वर्मा और सिपाही सुमित कुमार को निलम्बित किया गया। गुडम्बा थाने के थानाध्यक्ष डीके शाही, अलीगंज के थानाध्यक्ष अजय कुमार यादव और नाका थाने के प्रभारी परशुराम सिंह को उनके पदों से हटा दिया गया। पुलिस बल में संगठन खड़ा करने की कोशिश करने वाले बर्खास्त सिपाही अविनाश पाठक को मिर्जापुर व बृजेन्द्र यादव को वाराणसी से गिरμतार किया गया।

तारीफ ने बनाया लापरवाह
भाजपा सरकार के डेढ़ वर्ष के कार्यकाल में सार्वजनिक मंचों से हुई तारीफ ने पुलिस को लापरवाह बना दिया। पुलिस को दी गई छूट अब सरकार पर ही भारी पड़ने लगी है। लखनऊ, उन्नाव की घटना हो या अलीगढ़ में मीडि़या को बुलाकर लाइव इंकाउण्टर करने का आइडिया हो, मेरठ में मोरल पुलिसिंग के नाम पर मेडिकल छात्रा और उसके साथी को अपमानित करने का मामला हो, ऐसी घटनाएं सरकार के लिए मुसीबत बनती जा रहीं हैं।

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