मुंबई की सड़कों पर प्रेरणा के सुलेख

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बिल्होरे अपनी मेहनत-मजदूरी के बीच किसी तरह समय निकालकर गड्ढों को भरने के लिए मलबा और सीमेंट
यहां-वहां से जुटाते हैं। उनका यह सद्प्रयास गड्ढे में गिरकर मौत के मुंह में जा चुके पुत्र के शोक से निपटने का एक
सकारात्मक तरीका है, जो समाज और सरकार दोनों के लिए प्रेरणा की एक बड़ी लीकर खींच रहा है। उनका संकल्प
मुंबई में एक अभियान बनकर उभरा है। उससे जुड़ने वालों की संख्या बढ़ती ही जा रही है।

तुर्की कवि नाजिम हिकमत अपनी एक कविता में कहते हैं, ‘जब से मुझे इस गड्ढे में फेंका गया, पृथ्वी सूरज के गिर्द दस चक्कर काट चुकी है।’ हिकमत की इस कविता में गड्ढा एक ऐसे रूपात्मक बिंब को गढ़ता है, जिसमें जीवन अचानक शोक में बदल जाता है, न सिर्फ जिंदगी में बल्कि जिंदगी के आसपास भी अचानक कई बार सब कुछ तबाहो-बर्बाद हो जाता है। हिकमत अपनी बात जीवन और विडंबना के बड़े कैनवास पर कहते हैं। पर जिंदगी की इस विडंबना को थोड़ी अभिधा में देखे-समझें तो हमें सड़कों पर खुदे-बने वे गड्ढो  दिखेंगे, जो देखते-देखते किसी व्यक्ति के जीवन को लील लेता है। बड़ी दुर्घटनाएं होती हैं इन गड्ढो  की वजह से। अभिनंदन के पात्र हैं वे लोग, जो शोक की इस बड़ी वजह का रोना रोने के बजाय इन्हें दूर करने में जुट जाते हैं। ऐसे ही एक शख्स हैं दादाराव बिल्होरे। बिल्होरे मुंबई में रहते हैं। उन्होंने जिंदगी को दुर्घटना और बड़े शोक में बदल देने वाले सड़क के गड्ढो  को अपने बूते पाटने का अभियान छेड़ रखा है। वे इन गड्ढो  को भरने के लिए दूसरे लोगों की तरह सरकार या स्थानीय प्रशासन की मुंहजोही करने में नहीं लगे। बल्कि खुद से इसके लिए अभियान छेड़ दिया। उनके इस अभियान के पीछे वही जज्बा है, जो दशरथ मांझी (बिहार)ने खुद छेनी- हथौड़ा उठाकर पहाड़ काटकर रास्ता बनाने के लिए दिखाया था। 28 जुलाई 2015 से पहले तक 48 वर्षीय दादाराव बिल्होरे के जीवन में सब कुछ ठीक चल रहा था। पर इस मनहूस दिन को उनके 16 वर्षीय बेटे प्रकाश की सड़क के एक गड्ढे के कारण हुई दुर्घटना में मौत हो गई। एक खुशहाल परिवार अचानक गहरे शोक में डूब गया। अपने बेटे को खोने के बाद बिल्होरे को लगने लगा कि सड़कों पर गड्ढो  का होना दुर्घटना को आमंत्रण है। उन्होंने यह भी देखा कि जिस के कारण उनका बेटा चल बसा, वह अब भी सड़क पर बना हुआ है। उसे भरने के लिए न समाज सामने आया, न स्थानीय प्रशासन को ही इस बारे में कोई चिंता थी। फिर यह तो हुई एक गड्ढो  की बात, ऐसे गड्ढो  तो सड़कों पर और भी हैं। लिहाजा जो उनके साथ हुआ है, वह औरों के साथ न हो, इसके लिए जरूरी है कि ये गड्ढो  भरे जाएं। फिर क्या था बिल्होरे खुद जुट गए सड़कों पर पड़े गड्ढो  को भरने में। अपने अभियान की शुरुआत उन्होंनेअपनी फल-सब्जी की दुकान के पास से की। वह रोज दोपहर में और अपनी साप्ताहिक छुट्टी के दिन सड़कों के गड्ढे भरते हैं। गड्ढों को भरने के लिए वह किसी भी निर्माण स्थल पर जाकर वहां से मलबा और थोड़ा सीमेंट ले आते हैं। देखते-देखते बिल्होरे का यह एकल प्रयास एक अनूठा सामाजिक अभियान बन चुका है। इस वर्ष अपने बेटी की तीसरी बरसी पर दादाराव बिल्होरे जब अपने अभियान पर निकले तो वे अकेले नहीं थे। उस दिन सौ से ज्यादा लोगों ने उनके जुहू-विक्रोली लिंक रोड के 100 गड्ढे भरे। आज बिल्होरे को लगता है कि यह अभियान अगर यूं ही जोर पकड़ता गया तो अगले कुछेक वर्षों में शायद मुंबई की सड़कों पर एक भी गड्ढा देखने को मिले। फिर न कोई दुर्घटना होगी, न कोई घायल होगा और न ही अपने किसी प्रियजन को खोने का शोक उनकी तरह किसी और को होगा। दादाराव बिल्होरे की आर्थिक स्थिति बहुत अच्छी नहीं है। फल-सब्जी की दुकानदारी से किसी तरह उनके परिवार का गुजारा होता है। पर अपनी इस स्थिति की छाया उन्होंने अपने संकल्प पर नहीं पड़ने दी। जिस तरह दशरथ मांझी ने गांव से शहर के अस्पताल तक पहुंचने में देरी की वजह से अपनी पत्नी को खोया और उन्हें लगा कि गांव से शहर के बीच अगर पहाड़ नहीं होता तो उनकी पत्नी उन्हें छोड़कर दुनिया से नहीं जाती। उसी तरह बिल्होरे को भी लगता है कि सड़क के गड्ढो  ने उनसे उनका बेटा छीन लिया। बिल्होरे अपनी मेहनत-मजदूरी के बीच से किसी तरह समय निकालकर गड्ढो  को भरने के लिए मलबा और सीमेंट यहां-वहां से जुटाते हैं। यह समस्या और शोक से निपटने का एक सकारात्मक तरीका है, जो समाज और सरकार दोनों के लिए प्रेरणा की एक बड़ी लीकर खींच जाता है। ऐसी ही एक बड़ी लकीर खींचने में जुटे बिल्होरे को इस बात का श्रेय जाता है कि उन्होंने खुद आगे बढ़कर सड़कों पर खुदे गड्ढो  को भरने का बीड़ा उठाया। आज उनका संकल्प मुंबई में एक अभियान का नाम है और इस अभियान के साथ जुड़ने वालों की संख्या लगातार बढ़ती जा रही है।

 

 

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