मदद- 150000000, खर्च- 16.5000000

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सरकार ईमानदार हो तो सब कुछ हो सकता है।’ अरविंद केजरीवाल दिल्ली में घूम-घूम कर यही कह रहे हैं। जरिया होर्डिंग को बनाया है। हर मेट्रो और चौराहे पर टंगी तख्ती में ‘ईमानदार’ सरकार का बखान गाया गया है।

उसमें दावा किया गया है कि केजरीवाल सरकार ने जनता के लिए ईमानदारी से काम किया है। पर सवाल यह है कि क्या वास्तव में ऐसा हुआ है? जब इसकी पड़ताल निर्माण मजदूरों को केन्द्र में रख कर की गई तो सरकारी दावों को पोल खुल गई।

‘ईमानदार’ सरकार कह रही है कि उसने रिकार्ड निर्माण मजदूरों का पंजीकरण किया है। उसकी मानें तो इन मजदूरों के कल्याण के लिए सरकार ने दिन-रात एक कर दिया।

मगर दस्तावेज ‘स्वघोषित ईमानदार’ मख्यमंत्री अरिवंद केजरीवाल के दावों को नकारते हैं। उनके मुताबिक केजरीवाल सरकार ने निर्माण मजदूरों के हित के लिए बस बयानबाजी की है। धरातल पर कोई काम नहीं हुआ।

निर्माण मजदूरों के लिए बने ‘दिल्ली भवन और अन्य निर्माण कामगार कल्याण बोर्ड’  के दस्तावेज यही बोलते हैं। सरकारी आंकड़ों की मानें तो पांच लाख से ज्यादा निर्माण मजदूर बोर्ड में पंजीकृत हैं।

उनको विभिन्न प्रकार की सहायता मुहैया कराने के लिए ही बोर्ड बना है। उनके लिए ही बोर्ड के खजाने में 2500 करोड़ रुपये की व्यवस्था की गई। पर विडंबना यह है कि उनके हितों के लिए केजरीवाल सरकार ने कुछ किया नहीं है

कामगारों को विभिन्न योजनाओं के तहत तकरीबन 15 करोड़ रुपये की सरकारी सहायता दी गई। इस राशि को हकदार लोगों तक पहुंचाने में केजरीवाल सरकार ने  लगभग 16.50 करोड़ रुपये खर्च किये।

पिछले तीन साल में पांच लाख निर्माण मजदूरों में से महज 184 लोगों को ही पेंशन मिली है। इनमें से भी सात मृतक आश्रित हैं। इसी तरह केलव चार निर्माण कामगारों को औजार खरीदने के लिए बोर्ड ने सहायता मुहैया कराई है।

चिकित्सा सहायता 14 कामगारों को मिली है। कुल मिलाकार 6,139 निर्माण मजदूरों को विभिन्न तरह की सरकारी सहायता मिली है। वह भी तब जबकि बोर्ड में पंजीकृत निर्माण मजदूरों का आंकड़ा पांच लाख से पार जा चुका है।

बावजूद इसके मजदूर हितैषी केजरीवाल सरकार को मुफलिसी में जी रहे, निर्माण मजदूर नहीं मिले। सीधा सा मतलब है कि निर्माण मजदूर के नाम पर केजरीवाल सरकार शोर ज्यादा मचा रही है, धरातल पर काम नहीं कर रही है।

अगर वह मजदूर हित को लेकर चिंतित होती तो पंजीकरण के अलावा उनके कल्याण का भी ख्याल रखती। लेकिन उसकी कुल योजना में मजदूर कल्याण नदारद है।

यदि किसी का बोर्ड कल्याण कर रहा है तो वह केजरीवाल सरकार का संगठन। उसी संगठन के लिए बोर्ड के धन का व्यय हो रहा है।  यह सब ‘ईमानदार’ सरकार के ‘ईमानदार’ मुखिया की निगरानी में हो रहा है। कैसे ? इसे जानना दिलचस्प होगा।

पहले केजरीवाल सरकार ने मजदूर हितैषी होने का आडंबर रचा। जोर-शोर से निर्माण मजदूरों का पंजीकरण कराया। इससे यह भ्रम फैलाने में केजरीवाल सफल हुए कि उनकी सरकार निर्माण कामगारों को लेकर फिक्रमंद है। पर, असल कहानी इससे अलग है। वे मजदूर कल्याण की आड़ में बोर्ड का पैसा संगठन पर खर्च करने लगे। लेकिन उसका तानाबाना इस तरह बुना गया कि वह प्रशासनिक खर्च बन गया।

सरकार ने संगठन के लोगों को फायदा पहुंचाने के लिए बोर्ड में पदों का सृजन किया। कई लोगों का पैसा भी बोर्ड ने बढ़ा दिया। कायदे से इसके लिए पहले दिल्ली सरकार को उप-राज्यपाल से अनुमति लेनी चाहिए थी। पर केरजीवाल सरकार ने यह जरूरी नहीं समझा। वे मनमाने तरीके से काम करते रहे। उन्हें न तो निर्माण कामगारों की चिंता है और न ही उनके हित के बने बोर्ड की।  उनकी सरकार को अगर किसी बात की फ्रिक है तो वह है संगठन की।

उसके लिए वे अपने हिसाब से संस्थान को चला रहे हैं। इसका परिणाम यह हुआ है कि कामगारों का हित हाशिए पर चला गया।  वे अनाथ हो गए और लोक कल्याण का दावा करने वाली केजरीवाल की सरकार उनके पैसे से तिजोरियां भर रही है।

इसकी बानगी 6,139 कामगारों तक उनका पैसा पहुंचाने में हुआ प्रशासनिक खर्च है। इन कामगारों को विभिन्न योजनाओं के तहत तकरीबन 15 करोड़ सरकारी सहायता दी गई। चौंकाने वाली बात यह है कि इस राशि को हकदार लोगों तक पहुंचाने में केजरीवाल सरकार ने  लगभग 16.50 करोड़ रुपये खर्च किये। सूत्रों के मुताबिक सरकार इसी का खर्च कर रही है जो किसी न तरीके से संगठन के खाते में जा रहा है।

यही वजह है केजरीवाल सरकार का संगठन मनमानी कर रहा है। सरकार ने उसे छूट जो दे रखी है। वह किस कदर की है उसे श्रमिक विकास संगठन के कामकाज से समझा जा सकता है। सूत्रों के मुताबिक पिछले दिनों श्रम मंत्री गोपाल राय ने एक बैठक बुलाई।

उसमें यह फरमान जारी किया कि कोई भी निर्माण यूनियन कामगारों का पंजीकरण उनके कार्य स्थल पर जा कर करेगी। कारण यह बताया कि इससे गैर-भवन निर्माण कामगारों के पंजीकरण पर लगाम लगेगी। लेकिन इस फरमान को न मानने की छूट केजरीवाल सरकार ने कृष्ण कुमार यादव को दे रखी है।

सरकार ने संगठन के लोगों को फायदा पहुंचाने के लिए बोर्ड में
पदों का सृजन किया। कई लोगों का पैसा भी बोर्ड ने बढ़ा दिया।

वे श्रमिक विकास संगठन के महासचिव है। उन्होंने श्रम विभाग से अनुमति लिए बिना पंजीकरण शुरू कर दिया है। कहने के लिए विभाग को सूचित कर दिया है कि वे फला-फला तारीख को निर्माण मजदूरों का पंजीकरण करने के लिए कैम्प लगाएंगे।

विभाग के अधिकारियों की माने तो नियमानुसार कैम्प लगाने सूचना नही दी जाती बल्कि लगाने के लिए पहले अनुमति मांगी जाती है। जब विभाग अनुमति देता है तब कैम्प लगाने की तिथि और जगह के बारे में सूचना दी जाती है।

पर श्रमिक विकास संगठन ने इस नियम का पालन नहीं किया। यही नहीं इन लोगों ने पंजीकरण कैम्प भी आदेशानुसार नहीं लगाया।  विभाग के अधिकारियों का दावा है कि पंजीकरण कैम्प निर्माण कामगारों के कार्यस्थल के बजाय रिहाइशी इलाकों में लगाए गए।

अधिकारियों का कहना है कि यह सरकारी आदेश का खुला उल्लघंन है।  बावजूद इसके केजरीवाल की ईमानदार सरकार खामोश है और फर्जी पंजीकरण को संरक्षरण दे रही हैं। मनसा बस एक ही है दिल्ली भवन और अन्य निर्माण कामगार कल्याण बोर्ड के कोष को ऐन केन प्रकार खाली करने की।

निर्माण मजदूरों के लिए बने ‘दिल्ली भवन और अन्य निर्माण कामगार कल्याण बोर्ड’  के दस्तावेज यही बोलते हैं। सरकारी आंकड़ों की मानें तो पांच लाख से ज्यादा निर्माण मजदूर बोर्ड में पंजीकृत हैं।

उनको विभिन्न प्रकार की सहायता मुहैया कराने के लिए ही बोर्ड बना है। उनके लिए ही बोर्ड के खजाने में 2500 करोड़ रुपये की व्यवस्था की गई। पर विडंबना यह है कि उनके हितों के लिए केजरीवाल सरकार ने कुछ किया नहीं है।

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