मंदिर चाहिए कानून से

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विश्व हिंदू परिषद के कार्याध्यक्ष आलोक कुमार मोदी सरकार को ‘रामभक्तों’ की सरकार कहते हैं। उन्होंने उम्मीद जतायी, ‘देश में करोड़ों हिंदुओं की भावनाओं को स्वीकार किया जायेगा और ‘2018 के सूर्यास्त से पहले’ कानून लाया जायेगा।’ कांग्रेस अध्यक्ष राहुल गांधी का नाम लिये बगैर वह कहते हैं कि ‘जनेऊधारी’ नेताओं को भी उनकी मांग का समर्थन करना चाहिए। माना जा सकता है कि शीर्ष न्यायालय में 29 अक्टूबर से सुनवाई के साथ राम मंदिर का मामला गरमाएगा। न्यायालय का निर्णय आए या न आए, यह प्रकरण लोकसभा चुनाव में मुद्दा बनेगा।

तो क्या यह मान लिया जाए कि राम मंदिर मुद्दे पर मोदी सरकार से संतोषजनक समाधान न मिलने पर विश्व हिंदू परिषद और संत विरोध करेंगे? कतई नहीं। विश्व हिंदू परिषद के एक वरिष्ठ पदाधिकारी ने साफ शब्दों में कहा। इस पदाधिकारी ने साथ ही जोड़ा, ‘विहिप और संत समाज केवल इतना चाहता है कि केंद्र सरकार राम मंदिर के प्रति ईमानदारी से प्रयास करे।’ इसका मतलब? इस पदाधिकारी ने कहा,‘उच्चतम न्यायालय से उम्मीद टूट चुकी है। वहां से फैसला समय पर नहीं आना है, लिहाजा केंद्र सरकार राम मंदिर की बाधा दूर करने के लिए संसद में विधेयक लाए। विधेयक नहीं पारित होगा तो कम से कम यह तो पता चल जाएगा कि कौन पक्ष में है, कौन नहीं?’ असल सवाल यही है।

संत समाज और विश्व हिंदू परिषद को उम्मीद थी कि तत्कालीन मुख्य न्यायाधीश दीपक मिश्र के कार्यकाल में मामले पर कोई न कोई फैसला आ ही जाएगा। विहिप सूत्रों की मानें तो भाजपा ने भी संतों को यह कहकर आश्वस्त किया था कि न्यायालय से फैसला आने के बाद ही केंद्र सरकार की भूमिका शुरू होगी। तब मोदी सरकार को राम मंदिर पर अपना रुख तय करने में सहूलियत होगी। लेकिन ऐसा नहीं हुआ। परिषद के कार्याध्यक्ष आलोक कुमार तो साफ कहते हैं कि ‘मायावी शक्तियों’ की साजिश के कारण फैसला नहीं आ पाया। उनका संकेत कपिल सिब्बल, राजीव धवन जैसे बड़े वकीलों और कांग्रेस की ओर था। कांग्रेस के बड़े नेता सिब्बल ने तो शीर्ष न्यायालय में कहा था कि मामले पर अक्टूबर में कोई भी निर्णय न दिया जाए। उससे 2019 का लोकसभा चुनाव प्रभावित होगा।

राम मंदिर आंदोलन से शुरू से जुड़े रहे पूर्व गृहराज्यमंत्री स्वामी चिन्मयानंद का तो यही आरोप है कि इस्माइल फारुकी मामले को उठाकर मामले को लंबित कराने की साजिश की गयी। नमाज के लिए मस्जिद इस्लाम का अभिन्न हिस्सा है कि नहीं? इस सवाल पर हालांकि सप्रीम कोर्ट ने दखल देने से इनकार कर दिया। चिन्मयानंद कहते हैं कि इससे फैसले में देरी तो हुई। बहरहाल भाजपा पर दबाव तो बढ़ ही गया है। शीर्ष कोर्ट में मामले की सुनवाई 29 अक्टूबर से होगी। सुनवाई नियमित हो तो फैसला जल्द आने की उम्मीद है लेकिन यह तय नहीं है कि सुनवाई नियमित होगी ही। विहिप और संतों का धैर्य टूटने का यही कारण है। इसीलिए वे चाहते हैं कि सरकार संसद में कानून लाकर उसकी बाधा दूर करे।

बहरहाल भाजपा पर दबाव तो बढ़ ही गया है। शीर्ष कोर्ट में मामले की सुनवाई 29 अक्टूबर से होगी। सुनवाई नियमित हो तो फैसला जल्द आने की उम्मीद है लेकिन यह तय नहीं है कि सुनवाई नियमित होगी ही। विहिप और संतों का धैर्य टूटने का यही कारण है।

आलोक कुमार कहते भी हैं कि भाजपा ने हिमाचल के पालमपुर में 1989 में राम मंदिर की बाधा दूर करने का प्रस्ताव पारित किया था। लोकसभा और उत्तर प्रदेश विधानसभा चुनाव के हर घोषणा पत्र में वह मंदिर के प्रति अपनी प्रतिबद्धता दोहराती आयी है। अब समय आ गया है कि वह अपना वादा पूरा करे। संत चाहते हैं कि राम मंदिर की बाधा दूर करने के लिए संसद में कानून लाये। हालांकि विहिप और मंदिर आंदोलन से जुड़े संतों ने मोदी सरकार को कोई चेतावनी नहीं दी है। पांच अक्टूबर को संतों की उच्चाधिकार समिति की दिल्ली में हुई बैठक में भी ऐसा कोई प्रस्ताव पारित नहीं किया गया। राष्ट्रपति से मिलने गए प्रतिनिधिमंडल ने उन्हें जो ज्ञापन दिया, उसमें भी केवल यह मांग की गयी है कि वह सरकार से इस बारे में कानून बनाने को कहें। यह भी प्रस्ताव पारित किया कि अगर संसद में काननू नहीं बना तो अगले साल 31 जनवरी और एक फरवरी को प्रयाग के कुंभ में धर्म संसद की बैठक में अगली रणनीति बनाएगाी।

इससे पहले विहिप अलग- अलग समूहों में राज्यों के राज्यपालों को ज्ञापन देगी। उनसे आग्रह करेगी कि वे उसकी भावना से केंद्र सरकार को अवगत कराएं। विहिप का सबसे बड़ा अभियान सांसदों से मिलने का है। मौजूदा मोदी सरकार को इस कार्यकाल में संसद का एक सत्र (शीत सत्र) मिलेगा जिसमें वह कोई कानून पारित कर सकती हैे। विहिप की कोशिश होगी कि शीत सत्र से पहले सभी सांसदों से मिलकर संसद में कानून में मदद का आग्रह करे। आलोक कुमार कहते हैं कि इससे राम मंदिर के पक्ष और विपक्ष में उनका अभिमत भी मिल सकेगा। आलोक कुमार नरेन्द्र मोदी सरकार को ‘रामभक्तों’ की सरकार कहते हैं। उन्होंने उम्मीद जतायी कि देश में करोड़ों हिंदुओं की भावनाओं को स्वीकार किया जायेगा और ‘2018 के सूर्यास्त से पहले’ कानून लाया जायेगा। कांग्रेस अध्यक्ष राहुल गांधी का नाम लिये बगैर वह कहते हैं कि ‘जनेऊधारी’ नेताओं को भी उनकी मांग का समर्थन करना चाहिए। माना जा सकता है कि शीर्ष न्यायालय में 29 अक्टूबर से सुनवाई के साथ राम मंदिर का मामला सतह पर गरमाएगा। कोर्ट का निर्णय आए या न आए, यह प्रकरण लोकसभा चुनाव में मुद्दा बनेगा।

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