बात बनी, बेचैनी बरकरार

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राजस्थान में ‘राजनीतिक ड्रामें’ की पटकथा लिखने में कांग्रेस के महारथी पूरी तरह सक्रिय थे। इस प्रतिस्पर्धी दंगल ने राजनीतिक हलकों में जबरदस्त उत्सुकता पैदा कर दी थी।

राजस्थान में चुनावी जीत की आतिशबाजी से कहीं ज्यादा अटकलों का बाजार गर्म था कि मुख्यमंत्री पद पर ताजपोशी का हकदार कौन होगा? अशोक गहलोत या सचिन पायलट! दिल्ली में कांग्रेस के राष्ट्रीय अध्यक्ष राहुल गांधी के आवास पर तीन दिन तक चले ‘राजनीतिक ड्रामें’ की पटकथा लिखने में पार्टी के महारथी पूरी तरह सक्रिय थे। इस प्रतिस्पर्धी दंगल ने राजनीतिक हलकों में जबरदस्त उत्सुकता पैदा कर दी थी। सूत्रों का कहना है कि चूंकि कांग्रेस नए संकल्पों के सथ सत्ता में आई है, उसे अपने फैसलों से सभी क्षेत्रों में नई बयार का प्रतीक बनना है। साथ ही लोकसभा चुनावों के मद्देनजर चुस्त और चपल टीम भी गढ़ना है। सोनिया गांधी और प्रियंका गांधी के मशविरे के बाद इस कसौटी पर गहलोत को ही खरा पाया गया।

सूत्र यह भी बताते हैं कि राहुल गांधी ने जब सचिन पायलट को अपना फैसला सुनाया तो उनका गला भर आया। उन्होंने भरे गले से अपने संबंधों, समर्पण और निष्ठा का हवाला देते हुए कहा कि ‘यह उनके साथ अन्याय है।’ गहलोत को लेकर उनका शिकायती लहजा परनाले की तरह फूट पड़ा। उनका कहना था, पार्टी के भीतर मेरे पैर खींचने की कोशिशें क्यों हुई ? दिल्ली में पार्टी महासचिव बनने के बाद भी गहलोत राजस्थान में क्यों सक्रिय रहे? किस तरह गहलोत ने टिकट बंटवारे में अड़ंगा लगाया? पायलट ने यहां तक कहा,‘क्या मैं धर्म और जाति की राजनीति करता हूं ? उन्होंने तर्क रखते हुए कहा कि,‘आखिर इस बात को किसने प्रचारित किया कि,‘मैं गुर्जर संप्रदाय से आता हूं? हालांकि विश्लेषक पायलट के इस तर्क को यह कह कर खारिज कर देते हैं कि,‘कांग्रेस ने किसके कहने पर सात गुर्जर प्रत्याशियों को टिकट दिए ? अलबत्ता इस मुद्दे पर गहलोत शुरू से ही आत्मविश्वास से भरे हुए थे। गहलोत का तर्क था,‘जब देश में मोदी लहर थी उस समय उन्होंने संगठन महासचिव रहते हुए मोदी के गृह राज्य पहुंचकर भाजपा के खिलाफ माहौल बनाया।

क्या उनकी भूमिका को कम करके आंका जा सकता है? गहलोत का यह तर्क उनकी ताजपोशी को लेकर सबसे ज्यादा वजनदार रहा कि,‘अगर उन्हें मुख्यमंत्री नहीं बनाया गया तो लोकसभा चुनावों में जातीय समीकरण बिगड़ सकते हैं। गहलोत को मुख्यमंत्री बनाने की पटकथा लिखने में कांग्रेस के कोषाध्यक्ष अहमद पटेल के अलावा आनंद शर्मा और मुकुल वासनिक का संदेश भी काफी मददगार रहा कि,‘लोकसभा चुनावों में गहलोत ज्यादा असरदार होंगे। बावजूद इसके सचिन का तर्क वितर्क जारी रहा कि ‘जब मध्य प्रदेश में अध्यक्ष कमलनाथ को मुख्यमंत्री बनाया जा सकता है तो राजस्थान में मुझे क्यों नहीं ?
सूत्रों के मुताबिक मुख्यमंत्री पद को लेकर पार्टी में तनाव चरम पर पहुंच चुका था। मुख्यमंत्री से कमतर न तो अशोक गहलोत मानने को तैयार थे और न ही पायलट। विवाद था कि खत्म होने का नाम ही नहीं ले रहा था। आखिरकार संकट मोचक की भूमिका का निर्वाह पूर्व केन्द्रीय मंत्री जितेन्द्र सिंह ने किया ।
जितेन्द्र सिंह ने पार्टी की साख और आइंदा आने वाली जोखिम भरी चुनौतियों का हवाला देते हुए पायलट से पूछा,‘क्या आपका राजनीतिक अनुभव इनसे निपट पाएगा?’ सूत्र कहते हैं कि,‘इस एक ही सवाल ने पायलट को निरुत्तर कर दिया। नतीजतन उन्होंने उप मुख्यमंत्री के प्रस्ताव पर अपनी सहमति दे दी। गहलोत को मुख्यमंत्री बनाने के साथ सचिन पायलट ने उपमुख्यमंत्री पद के लिए अपनी सहमति दे दी। लेकिन क्या यह ‘फिμटी-फिμटी’ का खेल खत्म हो गया ? फिलहाल तो सत्ता के दो केन्द्रों की यह पहेली अंदेशों में ही झूल रही है ।
बहरहाल अभी असहमतियों का करवट लेने का सिलसिला थमा नहीं है। तेईस सदस्यीय मंत्रीमंडल में गहलोत धड़े के 14 और पायलट धड़े के 7 मंत्री शामिल किए गए हैं। सरकार तो बन गई, लेकिन पायलट की नाराजगी के तेवर बरकरार हंै। गहलोत ने अलबत्ता प्रशासन में बड़ा फेरबदल कर यह संदेश दे दिया है कि वे अपने हिसाब से ही चलेंगे। किन्तु सत्ता के दो केन्द्रों को लेकर चलना क्या आसान होगा? दोनों नेताओं के चेहरों की भाव भंगिमाएं बताती हैं कि बेचैनी दोनों तरफ है…।

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