‘बड़ों’ के विद्रोह ने बिगाड़ा खेल

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टिकट वितरण के बाद भाजपा और कांग्रेस में छिड़ी जबरदस्त बगावत, भयंकर घात-प्रतिघात, बेलगाम परिवारवाद और इन सबके बीच चुनाव में किसी भी तरह की लहर या तूफान की नामौजूदगी ने नतीजों को लेकर राजनीतिक फलक पर असमंजस और ऊहापोह की गहरी धुंध बिखेर दी है। परिदृश्य कितना धूमिल होगा, इसका अंदाजा इसी से लगाया जा सकता है कि अपनी जिंदगी के बेहतरीन चार दशक भाजपा में गुजारने वाले सरताज सिंह जैसे तपे हुए नेता पहली बार कांग्रेस का परचम थामकर होशंगाबाद से मैदान में हैं तो उधर तीन पीढि़यां कांग्रेस में खपा देने वाले बुंदेलखण्ड के बड़े नेता सत्यव्रत चतुर्वेदी ने टिकट न मिलने पर अपने बेटे नितिन चतुर्वेदी को छतरपुर जिले की राजनगर सीट से मैदान में उतार दिया है। सत्यव्रत चतुर्वेदी बरसों से दिल्ली में कांग्रेस के प्रवक्ता रहे। बकौल उन्हीं के ‘छाती ठोंक कर’ इलाके में मातृ संगठन की खुली मुखालफत कर रहे हैं। भाजपा ने अपने धाकड़ कहलाने वाले नेता रामकृष्ण कुसमरिया, कुसुम मेहदेले जैसे आधा दर्जन नेताओं को वानप्रस्थ में भेज दिया है, अब वे तलवार भांज रहे हैं।

मालवा अंचल के बड़े नेताओं में शुमार कैलाश विजयवर्गीय का रंग टिकट नहीं मिलने से इस बार फीका है तो उधर लोकसभा अध्यक्ष सुमित्रा महाजन अपने पुत्र को टिकट न मिलने से किस कदर खिन्न हैं, बता पाना मुश्किल है। सुमित्रा महाजन टिकट वितरण को लेकर नेतृत्व से असहमत हैं। हालत यह हो गई कि उन्हें मनाने के लिए केंद्रीय मंत्री नरेंद्र तोमर और प्रदेश प्रभारी विनय सहस्रबुद्धे को इंदौर जाना पड़ा। इसी तरह प्रदेश की राजनीति में बड़े नेताओं में शामिल कैलाश विजयवर्गीय अपनी बात मनवाने के लिए हाईकमान के समक्ष शीर्षासन करते नज़र आये । हालांकि, कैलाश विजयवर्गीय को साधे रखने के लिए उनके बेटे आकाश विजयवर्गीय को इंदौर जिले की एक सीट से टिकट दे दिया गया। बाबूलाल गौर पर लगाम कसने के लिए आखिरी क्षणों में उनकी परंपरागत गोविंदपुरा सीट से पुत्रवधू कृष्णा गौर को टिकट देकर मैदान में उतार दिया गया।

कांग्रेस में जीवन खपा देने वाले बुंदेलखण्ड के बड़े नेता सत्यव्रत चतुर्वेदी ने टिकट न मिलने पर अपने बेटे नितिन चतुर्वेदी को छतरपुर जिले की राजनगर सीट से मैदान में उतार दिया है। इससे कांग्रेस को बड़ा नुकसान हो सकता है।

राज्य के मालवा, बुंदेलखंड इलाके टिकट वितरण के बाद उपजे असंतोष से बुरी तरह सुलग रहे हैं। इसका नतीजों पर असर पड़ना तय है। मजा इस बात का है कि, यह असंतोष जितना भाजपा को परेशान किए है, उतना ही कांग्रेस भी उससे परेशान है। कांग्रेस ने अंत तक अपने छ: उम्मीदवारों के टिकट बदले थे। भाजपा ने अपने 165 में पांच मंत्रियों सहित 51 विधायकों के टिकट काटे हैं। कांग्रेस ने अपने 57 में से 52 विधायकों को दोहराया किया है। बड़े नेता हालांकि स्वीकार नहीं कर रहे हैं लेकिन जबरदस्त परिवारवाद ने भाजपा और कांगे्रस के सांगठनिक ढांचे को हिलाकर रख दिया है। राज्य की 230 विधानसभा क्षेत्रों के भाजपा और कांगे्रस से 65 नेताओं के परिवारीजन वंशवाद की राजनीतिक अमरबेल को सींचने इस बार चुनाव मैदान में हैं। वंशवाद को लेकर कांग्रेस को कोसने वाली भाजपा ने 43 टिकट अपने नेताओं के परिवारीजनों पर कुर्बान किए हैं। इनमें 30 प्रत्याशी नेता पुत्र या पुत्री हैं, जबकि कांग्रेस द्वारा नेता परिवारों को बांटे गए टिकट में 12 पुत्र या पुत्रियों को दिए गए हैं। भाजपा में गुस्सा बहिरागतों को नवाजे जाने से ज्यादा उभरा। मसलन, कांगे्रस के पुराने नेता प्रेमचंद्र गुड्डू के बेटे अजीत बौरासी के लिए घोषित टिकट बदल दी गई। टिकटों के फेरबदल में सतीश सिकरवार को नवाजने से सिंधिया घराने से जुड़ी ‘मामीजी’ अर्थात माया सिंह का टिकट काट दिया गया। इसका ग्वालियर-चंबल पर क्या असर पड़ेगा, यह नतीजे बताएंगे।

बुंदेलखंड में भी कुसुम मेहदेले का टिकट कटने से लोधी वोट पर पड़ने वाले विपरीत असर की काट के तौर पर उमा भारती के भतीजे को टिकट से नवाजा गया है। इससे न सिर्फ लोधी वोट ही नहीं सधे रहेंगे बल्कि उमा भारती भी सधी रहेंगी। दरअसल, भाजपा ने असंतोष व बगावत को भांपते हुए यथास्थितिवाद पर अधिक जोर दिया और नए चेहरों के नाम पर वंशवाद को बढ़ावा दिया। टिकट वितरण के खेल में कांग्रेस भी बहकी है। उसने फूंक- फूंककर कदम रखे हैं। बुधनी से शिवराज के खिलाफ पार्टी के पूर्व प्रदेश अध्यक्ष को उतारा जाना उसकी इसी सूझबूझ का परिचायक है। अरुण यादव इस सीट से शिवराज को भले पराजित न कर पायें लेकिन वे उन्हें बांध कर तो जरूर रख देंगे।

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