पूरे देश की नजर महाराष्ट्र पर

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भाजपा-शिवसेना का गठबंधन 2014 में जीती अपनी सीटों को बरकरार रखता हुआ नजर आ रहा है। अपनी सीटों को बचाने में इस गठबंधन को अधिक मेहनत की शायद जरूरत न पड़े। भाजपा-शिवसेना गठबंधन के लिए सबसे बुरी स्थिति यही हो सकती है कि उसे कांग्रेस-एनसीपी गठबंधन के हाथों अपनी कुछ सीटों को गंवाना पड़े।

हाराष्ट्र के दिग्गज नेता शरद पवार का मानना है कि कांग्रेस और एनसीपी के बीच हुआ गठबंधन ही राज्य में भाजपा-शिवसेना के गठबंधन को हरा पाने के लिए पर्याप्त नहीं है। माना जा रहा है कि लोकसभा चुनाव के लिए कांग्रेस और एनसीपी के बीच सीट बंटवारे की बात को अंतिम रूप देने के लिए कांग्रेस अध्यक्ष राहुल गांधी से हुई मुलाकात के दौरान पवार ने राहुल गांधी को अपने आकलन से अवगत कराया था। वे महाराष्ट्र में कांग्रेस-एनसीपी गठबंधन के साथ राज्य के कुछ अन्य छोटे दलों को भी लेना चाहते थे। किसी वजह से ऐसा नहीं हो सका। मुश्किल यह है कि भाजपा-शिवसेना के बीच सीटों के बंटवारे के बाद भी दोनों में कुछ हद तक असहजता बनी हुई है। इसकी चर्चा आगे करेंगे, पहले हम महाराष्ट्र में कांग्रेस-एनसीपी की चुनावी संभावनाओं की पड़ताल करते हैं।

अस्सी लोकसभा सीटों वाले उत्तर प्रदेश के बाद महाराष्ट्र लोकसभा में सबसे अधिक 48 सांसदों को भेजता है। यहां लोकसभा चुनाव के पहले चरण में राज्य की सात सीटों पर 11 अप्रैल को मतदान होगा। यहां का चुनावी मुकाबला मुख्य रूप से भाजपा-शिवसेना गठबंधन और कांग्रेस-एनसीपी गठबंधन के बीच ही है। चुनावी समर में उतरी अन्य पार्टियों को यहां बड़ी जीत मिलने की उम्मीद नहीं है। इसके बावजूद एनडीए और यूपीए के अलावा चुनाव मैदान में मौजूद अन्य छोटे दलों के पास इतना जनाधार तो जरूर है कि वे चार प्रमुख दलों भाजपा, शिवसेना, कांग्रेस और एनसीपी के उम्मीदवारों की चुनावी संभावनाओं को बिगाड़ने में अहम भूमिका अदा कर सकते हैं।

शरद पवार इस बार चुनाव नहीं लड़ना चाहते हैं। अपने आप में ये बात उनकी अपनी पार्टी एनसीपी के साथ ही कांग्रेस को भी निरुत्साहित करने वाली है। उम्मीद की जा रही थी कि पवार अपने गढ़ बारामती से चुनाव लड़ेंगे, लेकिन इस सीट के लिए उन्होंने अपनी बेटी सुप्रिया सुले को चुना है। बारामती पवार का गढ़ रहा है। इसलिए ये यह कहना गलत होगा वो भाजपा-शिवसेना गठबंधन से हारने के डर से चुनावी मुकाबले से हट गए हैं। महाराष्ट्र में चुनाव की चर्चा करने पर राज्य का दूसरा प्रमुख नाम नितिन गडकरी का है, जो अपने गृह क्षेत्र नागपुर से चुनाव लड़ रहे हैं।

दलित वोट
शरद पवार प्रकाश अंबेडकर की क्षेत्रीय पार्टी को अपने साथ लाना चाहते थे। लेकिन कांग्रेस-एनसीपी के साथ गठबंधन के लिए अंबेडकर की पार्टी वंचित बहुजन अगाड़ी (मोर्चा) ने 12 लोकसभा सीटों की मांग रख दी। अंबेडकर खुद पिछले कई बार से चुनाव हारते रहे हैं और उनकी पार्टी राज्य में दलित वोटरों के बीच मजबूत पकड़ रखने वाली अकेली पार्टी भी नहीं है। ऐसे में राज्य की 12 लोकसभा सीट की उनकी ओर से मांग किया जाना अव्यवहारिक ही था। बताते हैं कि कांग्रेस को इसी दौरान ये भी पता चला कि अंबेडकर भाजपा के साथ भी सीटों की सौदेबाजी करने में लगे हैं। अंतत: अबेडकर की पार्टी से कांग्रेस-एनसीपी गठबंधन और बीजेपी-शिवसेना गठबंधन दोनों ने ही किनारा कर लिया।
महाराष्ट्र की कुल आबादी में दलितों की हिस्सेदारी 12 फीसदी से भी कम है। रामदास अठावले की अगुवाई वाली रिपब्लिकन पार्टी आॅफ इंडिया का जनाधार भी दलित वोटर ही हैं। आरपीआई फिलहाल एनडीए सरकार की घटक पार्टी है, लेकिन भाजपा ने पार्टी नेता अठावले को एक भी सीट नहीं दी है। अठावले खुद राज्यसभा के सदस्य हैं और मोदी सरकार में मंत्री हैं।

एक आश्चर्यचकित करने वाली बात मायावती और अखिलेश यादव द्वारा राज्य की सभी सीटों पर सपा-बसपा गठबंधन के उम्मीदवारों को चुनाव लड़ाने की भी है। उन्होंने राज्य की सभी 48 लोकसभा सीटों पर अपने उम्मीदवारों को उतारने की बात कही है। हालांकि वे भी अच्छी तरह से जानते हैं कि उनके लिए राज्य की एक भी सीट जीत पाना संभव नहीं है। माना जा रहा है कि कांग्रेस के प्रति अपनी नाराजगी दिखाने के लिए मायावती ने अपने उम्मीदवारों को महाराष्ट्र में उतारने की पहल की है, ताकि राज्य में कांग्रेस-एनसीपी की चुनावी संभावनाओं को आघात पहुंचाया जा सके। बसपा को मिलाकर अब राज्य के 12 फीसदी दलित वोटों पर तीन दल अपनी दावेदारी कर रहे हैं।

मुस्लिम वोट
राज्य में मुसलमानों के वोटों की हिस्सेदारी भी लगभग दलितों के बराबर ही है। दलित और मुस्लिम मिलकर राज्य में कुल मतों में 21 प्रतिशत से अधिक की हिस्सेदारी करते हैं। राज्य के चुनाव में असदुद्दीन ओवैसी की पार्टी आॅल इंडिया मजलिस-ए-इत्तेहादुल मुस्लिमीन भी मुकाबला कर रही है। इसके बावजूद माना यही जा रहा है कि मुस्लिम वोटों का एक बड़ा हिस्सा कांग्रेस-एनसीपी गठबंधन के पक्ष में ही जाएगा। महाराष्ट्र की मुस्लिम राजनीति में अबू आजमी को प्रमुख चेहरा माना जाता है। आजमी समाजवादी पार्टी के नेता हैं। लेकिन माना जा रहा है कि राज्य में सपा-बसपा के सभी लोकसभा सीटों पर चुनाव लड़ने के बावजूद, आजमी अपनी पार्टी के गठबंधन की जगह कांग्रेस-एनसीपी उम्मीदवारों की सफलता के लिए काम कर रहे हैं।

बताया जा रहा है कि यदि कांग्रेस-एनसीपी गठबंधन को दलितों और मुस्लिम वोटों का साथ मिल भी जाए, तब भी उसके लिए महाराष्ट्र में बड़ी सफलता पाना आसान नहीं होगा। इसकी एक बड़ी वजह राज्य में कांग्रेस का कमजोर जनाधार होना और कैडर विहीन होना है। एनसीपी का यहां अच्छा जनाधार था, लेकिन 2014 के चुनाव के बाद वो भी कमजोर हुई है। कांग्रेस की ओर से राज्य में पूर्व मुख्यमंत्री अशोक चव्हाण को एक बेहतर राजनीतिज्ञ माना जाता है, लेकिन भाजपा-शिवसेना गठबंधन का मुकाबला करने के लिए जिस आक्रामक नेतृत्व की जरूरत है, उसका चव्हाण में सर्वथा अभाव है।

भाजपा-शिवसेना गठबंधन
जैसा कि पहले ही बताया जा चुका है कि शिवसेना और भाजपा के गठबंधन में अभी भी पूरी तरह सहजता की स्थिति नहीं बन सकी है। दोनों दलों के बीच गठबंधन होने के बावजूद शिवसेना प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और बीजेपी अध्यक्ष अमित शाह को छेड़ने से बाज नहीं आ रही है। राफेल सौदे को लेकर शिवसेना प्रमुख उद्धव ठाकरे प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के लिए राहुल गांधी की भाषा में बोल चुके हैं, तो अमित शाह के लिए भी अपमानजनक संबोधन कर चुके हैं। सूत्र बताते हैं कि भाजपा नेतृत्व राज्य में शिवसेना के साथ गठबंधन करने के पक्ष में नहीं था। लेकिन मुख्यमंत्री देवेंद्र फडणवीस के हस्तक्षेप के बाद इस गठबंधन पर मोहर लगाई गई। फडणवीस पार्टी के केंद्रीय नेतृत्व को ये समझाने में सफल रहे कि इस बार हर सीट की महत्ता को देखते हुए गठबंधन करना जरूरी है। हैरानी की बात तो ये है कि गठबंधन हो जाने के बावजूद शिवसेना का मुखपत्र अब भी भाजपा पर हमला करना जारी रखे हुए है। सामना ने 24 मार्च के अंक में गांधीनगर से भाजपा के वरिष्ठ नेता लालकृष्ण आडवाणी को टिकट नहीं दिए जाने की बात के लिए भाजपा की आलोचना की। इस सीट से पार्टी अध्यक्ष अमित शाह को टिकट दिया गया है।


महाराष्ट्र में चुनावी सफलता पाने कि लिए भाजपा को चुनाव के दौरान शिवसेना की गतिविधि पर कड़ी नजर रखनी होगी। माना जा रहा है कि गठबंधन के बावजूद शिवसेना भाजपा उम्मीदवारों की सफलता के लिए पूरे मन से काम नहीं कर सकती है। इस क्रम में शिवसेना प्रमुख उद्धव ठाकरे की टिप्पणी पर भी ध्यान दिया जाना चाहिए। उन्होंने कहा है कि हम महाराष्ट्र में लोकसभा और विधानसभा की सीटें जीत सकते हैं, लेकिन राष्ट्रीय राजनीति को ध्यान में रखते हुए हमने गठबंधन किया है। ठाकरे ने ये भी कहा कि दोनों दलों के बीच हुआ गठबंधन शिवसेना की शर्तों पर हुआ है और उनकी पार्टी द्वारा की गई मांगों को सरकार ने पूरा करने का वचन दिया है। जहां तक भाजपा की बात है, तो देवेंद्र फडणवीस के मुख्यमंत्री होने का भाजपा को अतिरिक्त फायदा मिल रहा है। फडणवीस 2014 में जीती हुई सीटों को बरकरार रखने के लिए कड़ी मेहनत कर रहे हैं। उस वक्त पार्टी ने 25 लोकसभा सीटों पर चुनाव लड़कर 23 सीटों को जीतने में सफलता पाई थी।

नागपुर में गडकरी
संघ की योजना में नागपुर का एक विशेष स्थान है। आरएसएस का यहीं पर मुख्यालय है और नितिन गडकरी संघ के विश्वस्त माने जाते हैं। वो दूसरी बार नागपुर से जीतने की कोशिश कर रहे हैं। हमेशा मुस्कुराते हुए नजर आने वाले नितिन गडकरी ने अपने काम और प्रदर्शन के बल पर अपने प्रतिद्वंद्वियों को भी अपनी प्रशंसा करने के लिए मजबूर कर दिया है। नागपुर में कांग्रेस ने नाना पटोले को अपना उम्मीदवार बनाया है, जिन्होंने 2014 में भंडारा-गोंदिया निर्वाचन क्षेत्र पर एनसीपी के प्रफुल्ल पटेल को भाजपा उम्मीदवार के रूप में हराया था। पटोले ने भाजपा के केंद्रीय नेतृत्व के विरोध में 2017 में अपनी लोकसभा सीट से इस्तीफा दे दिया था। नागपुर में उन्हें एक कमजोर उम्मीदवार माना जा रहा है। ऐसे में गडकरी को अभी से ही उनकी लोकप्रियता को देखते हुए नागपुर का अगला सांसद माना जाने लगा है।

(अनुवाद- विनय के पाठक)

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