नेताजी की राजनीतिक विरासत की दौड़ भाजपा सबसे आगे

नेताजी का संपर्क देश-दुनिया की नजर में भले ही कांग्रेस से रहा हो लेकिन पश्चिम बंगाल की नजर में उनका रिश्ता फारवर्ड ब्लॉक से रहा है। फारवर्ड ब्लॉक की राजनीति शुरू से ही नेताजी पर ही केंद्रित रही। यह पार्टी आज प्रदेश की राजनीति में हासिये से भी बाहर चली गई है। नतीजतन नेताजी के अनुयायी या फारवर्ड ब्लॉक के कार्यकर्ता और समर्थक अपने को भाजपा के बेहद करीब पा रहे हैं।

डॉक्टर श्यामा प्रसाद मुखर्जी और विनायक दामोदर सावरकर को नायक मानने वाले लोग क्या नेताजी सुभाष चन्द्र बोस की विरासत के वारिस हो सकते हैं? इस सवाल का जवाब नेताजी के प्रपौत्र और पश्चिम बंगाल भारतीय जनता पार्टी के उपाध्यक्ष चंद्र कुमार बोस के बयान से ही मिल जाएगा। चंद्र कुमार बोस कांग्रेस पार्टी पर करारा हमला करते हैं। उनका आरोप है कि कांग्रेस ने स्वतंत्रता सेनानियों के इतिहास को मिटाने की कोशिश की है। भारत में ‘राजवंश की तानाशाही’ को बढ़ावा दिया। उनका यह भी आरोप है कि कांग्रेस ने स्वतंत्रता सेनानियों के बलिदान को याद नहीं रखा। देश की आजादी के लिए सन 1857 की क्रांति से जो आग भड़की थी, उसके कारण आगे चलकर मंगल पांडे, भगत सिंह, राजगुरु जैसे हजारों क्रांतिकारियों ने आजादी के आंदोलन में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। आजादी के बाद कांग्रेस के शासनकाल में इन स्वतंत्रता सेनानियों के बलिदान को भुलाने और मिटाने का काम हुआ। कांग्रेस पार्टी ने भारत को ‘राजवंश की तानाशाही’ में तब्दील कर दिया।

नेताजी का संपर्क देश-दुनिया की नजर में भले ही कांग्रेस से रहा हो लेकिन पश्चिम बंगाल की नजर में उनका रिश्ता फारवर्ड ब्लॉक से रहा है। फारवर्ड ब्लॉक की राजनीति शुरू से ही नेताजी पर ही केंद्रित रही। उनके इर्द-गिर्द ही रही है। फारवर्ड ब्लॉक आज प्रदेश की राजनीति में हासिये से भी बाहर चला गया है। आज भी ऐसे कई जिले हैं जहां नेताजी व फारवर्ड ब्लॉक का विशेष प्रभाव हुआ करता था। वहां के उनके अनुयायी या फारवर्ड ब्लॉक के कार्यकर्ता और समर्थक अपने को भाजपा के बेहद करीब पा रहे हैं। इसकी मुख्य वजह है प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी का नेताजी के प्रति विशेष सम्मान व लगाव का होना। चंद्र कुमार बोस का बंगाल भाजपा का उपाध्यक्ष होना भी पार्टी को एक बढ़त देता है।

प्रदेश की राजनीति में नेताजी की अहमियत का अंदाजा इसी बात से लगाया जा सकता है कि प्रणब मुखर्जी ने जब अलग पार्टी का गठन किया था तब उन्होंने नेताजी के भतीजे शिशिर चंद्र बोस का न केवल साथ लिया था बल्कि पार्टी में अपने बाद दूसरा स्थान उन्हें ही दिया था। ममता बनर्जी ने भी जब तृणमूल कांग्रेस का गठन किया था तब कृष्णा बोस को साथ लिया था। उन्हें लोकसभा का सदस्य भी बनवाया। शायद बहुत से लोगों को नही मालूम होगा कि ममता सरकार में वित्त मंत्री अमित मित्रा का भी इसी खानदान से नाता है। आज भी पश्चिम बंगाल की राजनीति में नेताजी की प्रासंगिकता ज्यों की त्यों बनी हुई है। भारतीय जनता पार्टी बहुत तेजी से नेताजी की विरासत को लपकने की कोशिश में है। इसमें वह सफल होती दिख रही है।

वैसे भी नेताजी की प्रासंगिकता पर सवाल सिर्फ किसी खास विचारधारा के विरोध के लिए नहीं है। यह इतिहास के एक स्वर्णिम अध्याय के राजनीतिक उपयोग की कोशिश का अर्थ समझने की कुंजी है। 21 अक्टूबर को प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने आजाद हिन्द फौज की आरजी हुकूमत की 75वीं वर्षगांठ बड़े धूमधाम से मनाई। यह बात अलग है कि इस आरजी हुकूमत को उन्होंने अखण्ड भारत की सरकार कहा और उसे आरएसएस के अखण्ड भारत के नारे के साथ जोड़ दिया।
यह पहली बार था जब इस मौके को लाल किले में तिरंगा फहराकर एक उत्सव की तरह मनाया गया। इसके पहले की सरकारों ने ऐसा नहीं किया, यह उनकी अपनी विफलता है। मोदी को इस पहल का श्रेय जरूर दिया जाना चाहिए। मोदी ने यह भी कहा कि आजादी के बाद अगर पटेल और बोस को नेतृत्व मिलता तो स्थितियां अलग होतीं। साफ है कि वह पहले प्रधानमंत्री पंडित जवाहरलाल नेहरू पर निशाना साध रहे थे।

चंद्र कुमार बोस ने भी आजाद हिंद फौज के 75वें स्थापना दिवस के मौके पर कोलकाता के एक कार्यक्रम में कांग्रेस पर हमला बोला। कहा कि एक परिवार को बड़ा बनाने के लिए देश के अनेक सपूतों चाहे सरदार पटेल हों, बाबा साहब अंबेडकर हों, चाहे नेताजी हों, के योगदान को भुलाने की कोशिश हुई। उन्होंने पूर्व प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरू को विभाजित भारत का प्रधानमंत्री करार दिया। कहा है कि नेताजी सुभाष चंद्र बोस अखंड भारत के पहले प्रधानमंत्री थे। जवाहरलाल नेहरू विभाजित भारत के पहले प्रधानमंत्री थे, अखंड भारत के नही। यह सच भारत की युवा पीढ़ी को बताया जाना चाहिए। उन्होंने दावा किया कि यह भी सच है कि जब 1944 में आजाद हिंद फौज दिल्ली में आकर लाल किले पर तिरंगा फहराना चाहती थी, तब पंडित नेहरू और कांग्रेस पार्टी के नेताओं ने इसका विरोध किया था।

साथ ही आरोप लगाया कि कांग्रेस सरकार ने नेताजी से संबंधित बहुत से दस्तावेजों को नष्ट कर दिया है। चूंकि नेताजी आजादी की लड़ाई के सिलसिले में काफी समय देश के बाहर भी रहे, इसलिए विदेशों में उनसे जुड़े बहुत से दस्तावेज अब भी मौजूद हैं, खासकर जापान में। उन्होंने दावा किया कि जापान सरकार के पास भारतीय स्वतंत्रता संग्राम के महानायक नेताजी सुभाष चंद्र बोस से जुड़ीं तीन बेहद महत्वपूर्ण फाइलें हैं। वे सामने आ गईं तो नेताजी के रहस्यमय ढंग से गायब होने के रहस्य से भी पर्दा उठ जाएगा। इसके अलावा रूस की सुरक्षा एजेंसी केजीबी आर्काइव में भी नेताजी से जुड़े कई दस्तेवाज मौजूद हैं। उन्हें सार्वजनिक करने से भी काफी मदद मिलेगी।
चंद्र कुमार बोस के अनुसार नेताजी के गायब होने को लेकर बहुत सी थ्योरी प्रचलित है लेकिन किसी भी थ्योरी को लेकर पुख्ता प्रमाण नहीं है, न तो विमान हादसे में नेताजी की मौत का कोई सबूत है और न ही सन 1968 तक उनके रूस में होने का।

नेताजी के गुमनामी बाबा बनकर रहने और जापान के रेनकोजी मंदिर में उनके भस्मावशेष होने के भी ठोस प्रमाण नहीं हैं। इसलिए वे इनमें से किसी में भी यकीन नहीं करते। देश में नेताजी से जुड़े तथ्यों को मिटाया गया है। आजाद हिंद फौज में 60,000 सैनिक शामिल थे, जिनमें से 26,000 ने अपने प्राणों की आहुति दी थी, लेकिन इतिहास में इस बात का कहीं कोई जिक्र नहीं है। सुभाष चंद्र बोस के रिश्तेदारों ने राष्ट्रीय राजधानी में इंडिया गेट पर उनकी प्रतिमा लगाने और उनके जन्मदिन 23 जनवरी को मुक्ति दिवस घोषित करने की भी मांग की है।

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