नामदार पर कामदार कुर्बान!

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सचमुच, राजनीति अनंत संभावनाओं का मैदान है। यहां किसी भी क्षण बाजी, किसी भी करवट बदल सकती है। ताजा उदाहरण संजय मसानी का है। कहते हैं, सारी खुदाई एक तरफ जोरू का भाई एक तरफ, लेकिन मुख्यमंत्री शिवराज सिंह की धर्मपत्नी साधना सिंह के सगे भाई संजय मसानी टिकट की खातिर अब जीजाजी का साथ छोड़कर कांग्रेस की डोलती डोंगी में चुनावी चप्पू चलाते नजर आ रहे हैं।

संजय, कल तक विवादास्पद हुआ करते थे। उनकी नीलाक्ष इंफ्रास्ट्रक्चर नामक कंपनी जो मध्य प्रदेश और महाराष्ट्र में कई प्रोजेक्ट चला रही है, कांग्रेस के निशाने पर थी। नेता प्रतिपक्ष अजय सिंह का आरोप था कि संजय मसानी ने फर्जी और कूटरचित दस्तावेजों के सहारे अपनी कंपनी का पंजीयन कराया था। कांग्रेस उन पर बालाघाट जिले में अवैध खनन करने, फिल्मों में बेनामी धन लगाने जैसे आरोप लगाती रही थी। अब उनके सारे दाग-धब्बे कबूल करते हुए कांग्रेस ने उन्हें वारासिवनी से अपना उम्मीदवार बनाया है। इस ‘नामदार’ के लिए कांग्रेस के कई ‘कामदार’ ठिकाने लगाए जा चुके हैं।
उधर, भाजपा से नाराज चल रहे सरताज सिंह को कांग्रेस ने होशंगाबाद से टिकट दिया है। भाजपा से टिकट न मिलने पर सरताज भावुक हो गए थे। सरताज होशंगाबाद संसदीय क्षेत्र से 1989 से 1996 तक लगातार तीन चुनाव जीते। 1998 में उन्होंने चौकाने वाले अंदाज़ में अर्जुन सिंह को हराया । 2004 में फिर लोकसभा के लिए चुने गए। वे अटल बिहारी वाजपेयी की 13 दिन की सरकार में कैबिनेट मंत्री भी रहे। उन्होंने 2008 के विधानसभा चुनाव में सिवनी मालवा से कांग्रेस के धाकड़ नेता हजारी लाल रघुवंशी को हराया था। 2013 में फिर इसी सीट से चुनाव जीता और मंत्री बने थे ।

 

 

शिवराज सिंह की धर्मपत्नी साधना सिंह के सगे भाई संजय मसानी ने फर्जी और कूटरचित दस्तावेजों के सहारे अपनी कंपनी का पंजीयन कराया था। कांग्रेस उन पर बालाघाट जिले में अवैध खनन करने, फिल्मों में बेनामी धन लगाने जैसे आरोप लगाती रही थी। अब उन्हें विधानसभा का टिकट दे दिया है।

 

 

 

भाजपा से नाराज चल रहे सरताज सिंह को कांग्रेस ने होशंगाबाद से टिकट दिया है।  भाजपा से टिकट न मिलने पर सरताज भावुक हो गए थे। वह भाजपा से तीन बार सांसद रहे, विधायक और मंत्री भी रहे।

 

 

 

मध्य प्रदेश की राजनीति में मौका-परस्ती का यह पहला और अकेला उदाहरण नहीं है। वर्ष 2003 में लक्ष्मण सिंह ने अपने ‘दादा भाई’ अर्थात दिग्विजय सिंह का साथ ऐसे समय पर छोड़ा था जब आम जनता ने उन्हें नकार कर सड़क पर ला दिया था। लक्ष्मण सिंह तब भाजपा में शामिल हो गए और राजगढ़ चुनाव लड़ कांग्रेस प्रत्याशी को हराकर सांसद बने थे। बहरहाल, अगले चुनाव तक लक्ष्मण सिंह भाजपा को गरियाकर ‘घर’ लौट आए। कांग्रेस ने उन्हें चाचौड़ा सीट से टिकट देकर नवाजा है। दिग्विजय सिंह के परिवार से उनके बेटे जयवर्धन सिंह और उनके कई नजदीकी रिश्तेदार भी विभिन्न सीटों से चुनाव मैदान में हैं।

एक ही परिवार के सदस्यों का अलग-अलग पार्टियों में रहने का चलन अमूमन पूर्व राजघरानों,जमीदारों में ज्यादा देखा गया। सिंधिया परिवार इसकी मिसाल है। तीन पीढि़यों से सिंधिया घराना सभी पार्टियों को साधे रखने का खेल बखूबी खेल रहा है। राजमाता विजयाराजे सिंधिया जब भाजपा में थीं तब माधवराव सिंधिया कांग्रेस में थे। मध्य प्रदेश में जब भाजपा की सरकारें बनीं तब दीर्घ स्वास लेकर राजमाता अक्सर कहा करती थीं ‘आज अगर भैइया भाजपा में होते तो निश्चित रूप से सीएम बनते’। माधवराव सिंधिया के बाद भी उनकी दोनों बहनें वसुंधरा राजे और यशोधरा राजे भाजपा में बनी रहीं लेकिन ज्योतिरादित्य कांग्रेस में शामिल हुए। यह परिवार कभी एक-दूसरे के खिलाफ चुनाव मैदान में आमने-सामने नहीं होता। इस घराने की तरह अर्जुन सिंह के राजनीतिक घराने में मचे घमासान से सभी वाकिफ हैं। अजय सिंह ‘राहुल’ के खिलाफ उनकी सगी बहन वीना सिंह लंबे समय से विद्रोह का झंडा उठाए हुए हैं। राजनीति में इसके रंग दिखाई देंगे।

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